सत्ता का दबाव और कमीशन का खेल, मंडल अध्यक्ष पर लगें गंभीर आरोप

जिला ब्यूरो चीफ : भगवत सिंह लोधी
तेंदूखेड़ा । दमोह जिले के जनपद तेंदूखेड़ा अंतर्गत आने वाले तारादेही भाजपा मंडल अध्यक्ष को लेकर सरपंचों का गंभीर आरोप क्षेत्र के कई सरपंचों ने उन पर सत्ता का दुरुपयोग, खुलेआम धमकी देने और कमीशन के लिए दबाव बनाने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। तारादेही क्षेत्र के सरपंचों का कहना है कि भाजपा मंडल अध्यक्ष मनोहर सिंह लोधी के हौसले इस कदर बुलंद हैं कि वे पंचायतों के विकास कार्यों में खुलकर हस्तक्षेप कर रहे हैं। आरोप है कि कमीशन न देने पर जान बूझकर कार्य रोके जाते हैं, फाइलें अटकाई जाती हैं और सरपंचों को प्रताड़ित किया जाता है।संरक्षण के आरोप: “ऊपर तक पहुंच” का दावा सरपंचों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि डॉ. मनोहर सिंह लोधी को स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी और जिला अध्यक्ष श्याम शिवहरे जी का संरक्षण प्राप्त है, इसी कारण उनके कार्यकर्ताओं और समर्थकों के हौसले खतरनाक स्तर तक बुलंद हैं। सरपंचों का कहना है कि इसी राजनीतिक संरक्षण के चलते वे खुलेआम धमकी देने से भी नहीं हिचकिचाते।
*कमीशन नहीं तो कार्रवाई की चेतावनी*
पीड़ित सरपंचों के अनुसार, यदि कमीशन नहीं दिया जाता तो मंडल अध्यक्ष अपने लेटर का दुरुपयोग करते हुए कभी वन विभाग से तो कभी जनपद पंचायत अधिकारियों से कार्रवाई कराने की धमकी देते हैं। कई सरपंचों ने यह भी आरोप लगाया कि मीडिया के माध्यम से बदनाम करने का दबाव बनाया जाता है।
*सरपंचों का सवाल: क्या यही पंचायती राज है?*
नाम न छापने की शर्त पर एक सरपंच ने कहा— “अगर कमीशन नहीं दोगे तो काम नहीं होने दिया जाएगा। नोटिस भेजवाने की धमकी दी जाती है। आखिर हम सरपंच किसके लिए बने थे क्या यही जनसेवा और पंचायती राज व्यवस्था है?”
*लोकतंत्र और पंचायत व्यवस्था पर गंभीर सवाल*
यह मामला अब केवल एक व्यक्ति या एक जनपद तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पंचायती राज व्यवस्था की स्वतंत्रता और पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न बन गया है। यदि चुने हुए सरपंच ही डर और दबाव में रहेंगे, तो ग्रामीण विकास और जनहित की योजनाएं कैसे ज़मीन पर उतरेंगी?
*सरकार और संगठन से निष्पक्ष जांच की मांग*
सरपंचों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित पदाधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि सत्ता के संरक्षण में चल रहे इस कथित दबाव और कमीशन तंत्र पर लगाम लग सके।
अब देखना यह है कि
सरकार और पार्टी संगठन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं, या फिर पंचायतों की आवाज़ सत्ता के शोर में दबकर रह जाएगी।



