मध्य प्रदेश

फ़िदा हुसैन तो चले गए, सोच जिंदा रह गई: सनातन आस्था पर फिर प्रहार..

दिव्य चिंतन : हरीश मिश्र, लेखक स्वतंत्र पत्रकार, 9584815781
*“…कला जब तक संस्कृति की साधना में लीन रहती है, तब कलाकार  सृजन करता है और जब वह आस्था की सीमाओं को लांघती है, तब अतिक्रमण बन जाती है…।”*
   आज के समय में सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि कला क्या कह रही है, संकट यह है कि वह कहाँ और किस दिशा में जा रही है। सनातन संस्कृति की सहनशीलता को कमजोरी समझकर,
मंदिरों को प्रयोगशाला और प्रतिमाओं को वैचारिक प्रयोग का माध्यम बनाया जा रहा है…।”
    यह *दिव्य चिंतन* कलाकार की निम्न स्तर की कला पर प्रश्न खड़ा करता है—
*क्या मंदिर कलाकार की स्वतंत्रता का मंच है  या श्रद्धालु की आत्मा का आश्रय ?*

आजकल कला और कलाकार सनातन संस्कृति और आस्था पर सबसे अधिक प्रहार कर रहे हैं। वे जानते हैं कि सनातनी सहनशील होते हैं, कठोर दंड नहीं मिलेगा।
मलिच्छ कलाकार फ़िदा हुसैन इस धरा से अलविदा हो गए हों, लेकिन वे अपनी कला-प्रवृत्ति के लार्वा छोड़ गए हैं। मंदिर और प्रतिमाएँ ऐसी ही प्रवृत्ति के कलाकारों के लिए प्रयोगशाला बनती जा रही हैं, यह सनातन आस्था से सीधा खिलवाड़ है।
मंदिर साधना-स्थल होते हैं, दृश्य-आनंद, पिकनिक या सेल्फ़ी प्वाइंट नहीं।
केरल के तिरुवनंतपुरम ज़िले में स्थित अजिमाला गुफा शिव मंदिर भगवान शिव-पार्वती को समर्पित है। यह मंदिर अरब सागर के किनारे चट्टानों पर स्थित है। गुफा मंदिर के भीतर शंकर-पार्वती की प्रतिमाओं को आलिंगन की मुद्रा में, नग्न रूप में दर्शाया गया है, जिसे कला कहा जा रहा है।
प्रश्न यह है कि मंदिर कला देखने की जगह है या आत्म-अवलोकन और आत्म-शांति की?
मंदिर संग्रहालय नहीं होते, न ही कला-दीर्घा। वे कलाकार की स्वच्छंदता के केंद्र नहीं, बल्कि श्रद्धालु की चेतना के केंद्र होते हैं।
शंकर-पार्वती भारतीय संस्कृति में दांपत्य के प्रतीक हैं, इसमें कोई विवाद नहीं। पर मंदिर में वे पति-पत्नी नहीं रहते, वे देवत्त्व हैं। मंदिर में शंकर कामेश्वर नहीं, महायोगी होते हैं और पार्वती सहचरी नहीं, आदिशक्ति।
आलिंगन मानवीय भाव है, दैवी तत्त्व नहीं। जब कला मर्यादा भूल जाती है कि वह किस स्थल में प्रवेश कर रही है, तब वह सृजन नहीं करती—वह आस्था पर प्रहार करती है।
यह कहना कि “इससे किसी की भावना आहत नहीं हुई”, सनातन संस्कृति को न समझ पाने की असफलता है।
आस्था कोई सोशल मीडिया प्रतिक्रिया नहीं होती, जिसे लाइक-डिसलाइक से मापा जाए। आस्था जब खंडित होती है, तो वह जन आक्रोश को जन्म देती है।
आज यदि अजिमाला मंदिर को कला की प्रयोगशाला बना दिया गया है, तो कल पूजा भी “व्यक्तिगत व्याख्या” बन जाएगी और यही वह क्षण होगा जब मंदिर तो रहेगा, पर देवत्व नहीं। कहा जा रहा है, यह कला है। पर ऐसी कला सनातन को स्वीकार नहीं, जिससे भावना आहत हो।
असल प्रश्न भावना आहत होने का नहीं है, प्रश्न यह है कि मंदिर किसलिए होता है? मंदिर आत्म-शांति का स्थान है।
मंदिर मोक्ष की ओर ले जाने का मुख्य द्वार है।
मंदिर काम का नहीं, कामना-निवृत्ति का क्षेत्र है। क्या मंदिर कला के नाम पर प्रयोगशाला के मंच बनते जा रहे हैं ?
कला स्वतंत्र है—पर प्रतिमा कला के लिए नहीं होती।
जब स्वतंत्रता मर्यादा से अलग हो जाती है, तो वह सृजन नहीं करती, वह आस्था पर प्रहार है
और यह तर्क कि “किसी ने विरोध नहीं किया”—संस्कृति के लिए सबसे खतरनाक तर्क है।
क्योंकि आस्था जब टूटती है, तो वह हमेशा आवाज़ नहीं करती। कई बार वह चुपचाप आक्रोश को जन्म देती है।
मंदिर प्रयोगशाला नहीं है। वह आत्म-प्रदर्शन का मंच नहीं, आत्म-विसर्जन का स्थान है। यदि कला को मंदिर में प्रवेश करना है, तो कलाकार को नतमस्तक होकर आना होगा। अन्यथा वह कला नहीं, संस्कृति पर किया गया आघात है।
कला को सम्मान चाहिए, पर उसकी भी सीमा है। मंदिर में प्रवेश करने वाली कला नतमस्तक हो—नग्न होकर नहीं। अन्यथा यह कला नहीं कहलाएगी,
यह सनातन संस्कृति पर मलिच्छ प्रवृत्ति का हमला है।
धर्मगुरुओं, सनातन संस्कृति के ध्वजवाहकों और मोदी सरकार को चाहिए कि तथाकथित कलाकेंद्र बने अजिमाला मंदिर पर तत्काल कार्रवाई कर सनातन संस्कृति की रक्षा करें और एक संवैधानिक मर्यादा-मापदंड स्थापित करें। ऐसे कला केंद्र पर बुलडोजर चलाएं ,तभी सनातन संस्कृति का नवजागरण संभव होगा।

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