मध्य प्रदेश

शासकीय जमीन पर कब्जे का प्रयास विफल: अपर कलेक्टर ने निरस्त किया 11 एकड़ भूमि का नामांतरण

बम्हौरी की विवादित भूमि फिर शासन के नाम दर्ज, राजस्व रिकॉर्ड में अनियमितताओं की जांच की मांग
रिपोर्टर : सतीश चौरसिया
उमरियापान* ।  ढीमरखेड़ा तहसील के ग्राम बम्हौरी में शासकीय भूमि के नामांतरण से जुड़े बहुचर्चित मामले में अपर कलेक्टर न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायालय ने करीब 11 एकड़ (4.49 हेक्टेयर) भूमि का नामांतरण निरस्त करते हुए उसे पुनः मध्यप्रदेश शासन के नाम दर्ज करने के आदेश दिए हैं। इस निर्णय के बाद राजस्व अभिलेखों में कथित गड़बड़ियों और नामांतरण प्रक्रिया की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
जानकारी के अनुसार खसरा नंबर 143 रकबा 3.02 हेक्टेयर तथा खसरा नंबर 164 रकबा 1.47 हेक्टेयर, कुल 4.49 हेक्टेयर भूमि पहले शासकीय मद एवं पट्टे की श्रेणी में दर्ज थी। आरोप है कि वर्ष 2007 में इस भूमि की रजिस्ट्री और नामांतरण की प्रक्रिया अपनाई गई, जबकि नियमानुसार ऐसी भूमि का हस्तांतरण सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना संभव नहीं है।
*नामांतरण प्रक्रिया में मिली अनियमितताएं*
न्यायालयीन सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि नामांतरण के लिए आवश्यक वैधानिक अनुमति और प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। वर्ष 2024 में तहसील स्तर पर रिकॉर्ड सुधार संबंधी आदेशों के आधार पर विवादित खसरों के कॉलम 12 में संस्था का नाम दर्ज किया गया था, जिसे अपर कलेक्टर न्यायालय ने नियमों के अनुरूप नहीं माना।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में किए गए परिवर्तन विधिसम्मत नहीं थे और उन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता।
*वारिस के बयान से बदला मामला*
सुनवाई के दौरान संबंधित पट्टेदार परिवार के वारिस बसंत कुमार ने न्यायालय में बयान देकर कहा कि परिवार ने उक्त भूमि किसी संस्था अथवा व्यक्ति को नहीं बेची थी। इस बयान के बाद रजिस्ट्री और नामांतरण की पूरी प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ गई।
*संस्था की भूमिका पर भी उठे सवाल*
प्रकरण में यह आरोप भी सामने आया कि संबंधित संस्था ने बिना वैधानिक प्रक्रिया पूरी किए भूमि अपने नाम दर्ज कराने का प्रयास किया। संस्था की ओर से भूमि को विधिवत खरीदे जाने का दावा किया गया, लेकिन सुनवाई के दौरान दस्तावेजों में कई विसंगतियां सामने आने की बात कही गई।
*भूमि फिर शासन के खाते में*
अपर कलेक्टर न्यायालय ने आदेश जारी कर खसरा नंबर 143 और 164 से संस्था का नाम हटाकर भूमि को पुनः शासकीय मद में दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही राजस्व रिकॉर्ड को तत्काल दुरुस्त करने के आदेश भी दिए गए हैं।
*जिम्मेदारों पर कार्रवाई की मांग*
मामले के बाद राजस्व अमले की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है। स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि शासकीय भूमि को गलत तरीके से निजी संस्था के नाम दर्ज किया गया है, तो केवल नामांतरण निरस्त करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों एवं संबंधित पक्षों पर भी कार्रवाई की जानी चाहिए।

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