पत्रकार और उसके भाई पर हमले के आरोपियों पर पुलिस मेहरबान?

आरोपियों की ही गाड़ी से न्यायालय और सब जेल तक पहुंचाया! पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
ब्यूरो चीफ ; शब्बीर अहमद
बेगमगंज। पत्रकार पर हमला करने के आरोपियों को पुलिस की गाड़ी नसीब नहीं हुई या फिर आरोपियों की गाड़ी ही पुलिस को ज्यादा सुरक्षित लगी? बेगमगंज में सामने आए इस घटनाक्रम ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पत्रकार और उनके भाई पर प्राणघातक हमले के मामले में गिरफ्तार आरोपियों को पुलिस द्वारा उनकी ही गाड़ी से न्यायालय ले जाने और फिर सब जेल के गेट तक पहुंचाने का मामला अब चर्चा का विषय बन गया है।
मामला प्रेस संघ अध्यक्ष एवं दैनिक भास्कर संवाददाता कृष्णा यादव और उनके भाई देवेश यादव पर हुए कथित हमले से जुड़ा है। विगत दिनों कवरेज के लिए गए दोनों भाइयों पर आधा दर्जन से अधिक लोगों द्वारा हमला किए जाने का आरोप है। मामले में पुलिस ने कार्रवाई करते हुए छह आरोपियों को हिरासत में लिया और न्यायालय में पेश किया।
लेकिन आरोपियों को न्यायालय ले जाने के लिए उनकी ही गाड़ी का इस्तेमाल किए जाने से पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। इतना ही नहीं, न्यायालय से न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बाद भी आरोपियों को करीब 100 मीटर दूर स्थित सब जेल तक उनकी ही गाड़ी से पहुंचाया गया।
सवाल यह है कि आखिर पुलिस की गाड़ी कहां थी?
जब इस मामले को पुलिस अधिकारियों के संज्ञान में लाया गया, तो सुरक्षा का हवाला दिया गया। लेकिन यहां सवाल उठता है कि सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाली पुलिस आखिर आरोपियों के निजी वाहन का इस्तेमाल करने को मजबूर क्यों हुई? क्या पुलिस के पास पर्याप्त वाहन उपलब्ध नहीं थे, या इसके पीछे कोई अन्य वजह थी? इन सवालों का जवाब संबंधित अधिकारियों को देना चाहिए।
क्या आम आरोपियों के साथ भी ऐसा ही व्यवहार होता है?
पत्रकारों पर हमले के मामलों में पुलिस की भूमिका और कार्रवाई हमेशा चर्चा में रहती है। ऐसे में जब हमले के आरोपियों को उनकी ही गाड़ी से न्यायालय और जेल तक ले जाने का घटनाक्रम सामने आता है, तो लोगों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, केवल इस घटनाक्रम के आधार पर पुलिस और आरोपियों के बीच सांठगांठ का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन पुलिस को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इस व्यवस्था के पीछे क्या कारण था।
यह मामला इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि पत्रकारों को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। यदि कवरेज के दौरान पत्रकारों पर हमले होते हैं और उसके बाद पुलिस की कार्यप्रणाली ही सवालों के घेरे में आ जाए, तो पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्र पत्रकारिता को लेकर चिंताएं बढ़ना लाजिमी है।
सात आरोपी नामजद, छह जेल में और एक फरार
इस मामले में भूपेंद्र सिंह, प्रशांत लोधी, रामकुमार कुशवाहा, प्रतीक जैन, अरविंद आदिवासी और प्रमोद यादव को न्यायिक हिरासत में जेल भेजा गया है, जबकि एक अन्य आरोपी धर्मेंद्र आदिवासी के फरार होने की जानकारी सामने आई है।
अब बड़ा सवाल यह है कि पत्रकार और उनके भाई पर हमले के मामले में पुलिस की कार्रवाई कितनी निष्पक्ष और पारदर्शी रही? आरोपियों को उनकी ही गाड़ी से ले जाने की नौबत क्यों आई? क्या पुलिस प्रशासन इस पूरे घटनाक्रम की समीक्षा कर जवाबदेही तय करेगा?
फिलहाल, इस घटनाक्रम ने पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर बहस छेड़ दी है। अब देखना होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इन सवालों का जवाब देते हैं या फिर यह मामला भी सवालों के बीच ही दबकर रह जाएगा।
वहीं शनिवार को आरोपियों की जमानत के लिए न्यायालय बेगमगंज में व्यवहार न्यायाधीश श्वेता चौहान के न्यायालय में आरोपियों के वकील संतोष बुंदेला द्वारा बहस की गई और तर्क दिए गए लेकिन विद्वान न्यायाधीश श्वेता चौहान ने आरोपियों के वकील के तर्कों को खारिज करते हुए पत्रकार के वकील विनय ठाकुर की ठोस दलीलों को मानते हुए पत्रकार और उनके भाई को आई चोटों के अवलोकन और स्वतंत्र पत्रकारिता को दबाने का प्रयास मानते हुए सभी आरोपियों के जमानत आवेदन को निरस्त कर दिया। आरोपी पूर्व से ही सब जेल बेगमगंज में निरुद्ध है।




