मध्य प्रदेश

23 साल से सिहोरा की आंखों में जिला बनने का सपना, आज के ही दिन 2003 में मिली थी केबिनेट मंजूरी

रिपोर्टर : सतीश चौरसिया

उमरियापान । सिहोरा के लोगों ने आज से एक-दो साल पहले नहीं, बल्कि 23 वर्ष पहले देखा था, वह सपना आज भी अधूरा है। दो दशक से ज्यादा समय बीत गया। सरकारें बदलीं, मुख्यमंत्री बदले, प्रदेश का प्रशासनिक नक्शा बदला, नए जिले बने, लेकिन सिहोरा वहीं खड़ा है—अपनी बारी का इंतजार करता हुआ ।यह इंतजार अब सिर्फ इंतजार नहीं रहा। यह सिहोरा के लोगों के मन में जमा होता जा रहा दर्द और आक्रोश है ।सिहोरा जिला आंदोलन से जुड़े लोगों के अनुसार 11 जुलाई 2003 को मध्यप्रदेश सरकार के राजपत्र में सिहोरा, मझौली, बहोरीबंद और ढीमरखेड़ा को मिलाकर सिहोरा जिला बनाए जाने का प्रस्ताव सामने आया था ।इसके बाद 1 अक्टूबर 2003 को मध्यप्रदेश सरकार की कैबिनेट ने सिहोरा जिला बनाए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी । उस समय मध्यप्रदेश में 48 जिले थे आज 55 है।केबिनेट मंजूरी के बाद 7 नए जिले बने पर सिहोरा नही ।उस समय सिहोरा के लोगों को लगा था कि अब वर्षों की प्रतीक्षा खत्म होने वाली है । लोगों ने उम्मीद की थी कि सरकारी घोषणा अब जमीन पर दिखाई देगी।लेकिन 1 अक्टूबर 2003 से शुरू हुआ इंतजार देखते-देखते 23 वर्ष लंबा हो गया।सरकारें बदलती रहीं, जिले बनते रहे… सिहोरा इंतजार करता रहासबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन वर्षों में सिहोरा अपनी मांग को लेकर संघर्ष करता रहा, उन्हीं वर्षों में मध्यप्रदेश में कई नए जिले अस्तित्व में आए ।2003 के बाद प्रदेश का प्रशासनिक नक्शा कई बार बदला। आज मध्यप्रदेश में 55 जिले हैं। लेकिन सिहोरा के मामले में 2003 की उम्मीद आज भी पूरी नहीं हो सकी ।लक्ष्य जिला सिहोरा आंदोलन समिति का सवाल है जब प्रदेश में नए जिले बनाए जा सकते हैं, तो सिहोरा के मामले में 23 साल से फैसला क्यों नहीं हो पा रहा?क्या सिहोरा के लोगों का इंतजार इतना लंबा होना जरूरी था?आंदोलन खत्म नहीं हुआ, क्योंकि दर्द खत्म नहीं हुआसिहोरा को जिला बनाने की मांग को लेकर समय-समय पर अनेक आंदोलन हुए । धरने हुए, प्रदर्शन हुए, ज्ञापन दिए गए, जनसमर्थन जुटाया गया और सरकार तक आवाज पहुंचाई गई ।लक्ष्य जिला सिहोरा आंदोलन समिति पिछले करीब पांच वर्षों से लगातार इस मांग को लेकर आंदोलनरत है ।आंदोलनकारियों के अनुसार मुख्यमंत्री से दो बार वार्ता भी हो चुकी है । लेकिन वार्ता के बावजूद सिहोरा जिला आज तक अस्तित्व में नहीं आया ।यही कारण है कि आंदोलनकारियों का कहना है कि अब सिर्फ आश्वासन सुनने का धैर्य सिहोरा के लोगों में नहीं बचा है।23 साल का सवाल—आखिर गलती किसकी है?सिहोरा के लोग पूछ रहे हैं—2003 में प्रस्ताव गलत था तो राजपत्र में क्यों आया?कैबिनेट की मंजूरी गलत थी तो उसे वापस क्यों नहीं लिया गया?अगर प्रस्ताव सही था तो 23 साल में उसे लागू क्यों नहीं किया गया?और सबसे बड़ा सवाल—“जब सात नए जिले बन सकते हैं, तो सिहोरा क्यों नहीं?”यह सवाल अब आंदोलनकारियों के साथ- साथ सिहोरा के आम नागरिकों के बीच भी चर्चा का विषय बनता जा रहा है।स्मृति ईरानी की घोषणा भी बनी आंदोलन का मुद्दावर्ष 2023 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सिहोरा पहुंचे भाजपा की राष्ट्रीय महासचिव स्मृति ईरानी द्वारा सिहोरा जिला की मांग को लेकर की गई घोषणा को भी आंदोलन समिति लगातार सरकार को याद दिला रही है।आंदोलन समिति का कहना है कि घोषणा के बाद भी सिहोरा जिला नहीं बना। इसी को लेकर समिति ने अब आंदोलन का दूसरा चरण शुरू किया है।2 अक्टूबर को भाजपा कार्यालय के सामने बजेगा घोषणा का ऑडियोइसी क्रम में 2 अक्टूबर को भाजपा संभागीय कार्यालय, जबलपुर के सामने स्मृति ईरानी की सिहोरा जिला संबंधी घोषणा का ऑडियो बजाया जाएगा ।आंदोलन समिति का कहना है कि यह कार्यक्रम सरकार को यह याद दिलाने के लिए है कि सिहोरा के लोगों की मांग नई नहीं है और इस मांग को लेकर सरकार के सामने वर्षों से दस्तावेज, आंदोलन और संवाद मौजूद हैं ।समिति का कहना है कि 2 अक्टूबर का कार्यक्रम सिहोरा के 23 वर्ष पुराने इंतजार का प्रतीक होगा । अब आश्वासन नहीं, निर्णय चाहिए।सिहोरा के लोगों का कहना है कि 23 साल किसी छोटी अवधि का नाम नहीं है । इस दौरान एक पूरी पीढ़ी बड़ी हो गई । जिन लोगों ने 2003 में सिहोरा जिला बनने की उम्मीद की थी, वे आज भी उसी उम्मीद के साथ सवाल पूछ रहे हैं।कितनी पीढ़ियां और इंतजार करेंगी?आंदोलनकारियों का कहना है कि अब सिहोरा को केवल आश्वासन, बैठक और भविष्य की संभावना नहीं चाहिए। जरूरत है तो स्पष्ट निर्णय और उसके क्रियान्वयन की ।23 साल से सिहोरा की आवाज अलग-अलग मंचों से उठती रही है । अब यह आवाज फिर भाजपा संभागीय कार्यालय के सामने उठेगी ।

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