धार्मिकमध्य प्रदेश

मोबाइल का अत्यधिक प्रयोग जीवन में ग्रहण, बच्चों को धर्म शिक्षा आवश्यक : पं. कमलेश शास्त्री

ब्यूरो चीफ : शब्बीर अहमद
बेगमगंज । ग्राम मूड़रा चावल में चल रही श्रीमद् भागवत महापुराण कथा के तृतीय दिवस में पं. कमलेश कृष्ण शास्त्री ने कहा की कथा हमे जीवन में संयम सिखाती है, क्योंकि जीवन में सफलता और शांति दोनों के लिए आत्मनियंत्रण आवश्यक है। कथा भक्ति का भाव जगाती है, जिससे मन में नम्रता और करुणा का उदय होता है। जब हम कथा सुनते हैं, तो हमारे भीतर सकारात्मक विचारों का संचार होता है, नकारात्मकता दूर होती है और मन स्थिर होने लगता है। आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचाना नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से समझौता करना है। पर्वत केवल पत्थरों का ढेर नहीं होते; वे वर्षा के स्रोत हैं, नदियों के जनक हैं, वनस्पतियों और जीवों के आश्रय स्थल हैं।
उन्होंने कहाकि संसार में मनुष्य धन, पद और प्रतिष्ठा के पीछे भागता रहता है, परंतु वास्तविक धन वह है जो मृत्यु के बाद भी जीवित रहता है—और वह है यश और कीर्ति। भारत माँ के वीर सपूत महाराणा प्रताप जैसा पौरुष होना चाहिए—जो विपरीत परिस्थितियों में भी कभी झुके नहीं, जिन्होंने कठिनाइयों में भी अपने धर्म और मातृभूमि की रक्षा को सर्वोपरि माना। उन्होंने सुख-सुविधाओं का त्याग कर संघर्ष का मार्ग चुना, क्योंकि उनके लिए सम्मान और धर्म किसी भी समझौते से बड़ा था। यही सच्चा साहस है, यही सच्चा पुरुषार्थ है।
भक्ति यदि करनी है तो वह ऐसी होनी चाहिए जैसी मीराबाई की थी—निष्काम, निडर और पूर्ण समर्पण से भरी हुई। मीरा ने समाज की बाधाओं, राजसी वैभव और आलोचनाओं की परवाह किए बिना केवल श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व माना। उनकी भक्ति में न दिखावा था, न स्वार्थ; केवल प्रेम था, समर्पण था और अटूट विश्वास था।
दान का भाव भामाशाह जैसी होनी चाहिए—जिन्होंने अपना सर्वस्व राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए अर्पित कर दिया। उनका दान केवल धन का दान नहीं था, बल्कि विश्वास और समर्पण का दान था। उन्होंने दिखाया कि सच्चा दानी वही है जो समय आने पर अपने संसाधनों को समाज और धर्म के लिए समर्पित कर दे।
अपने बच्चों को धर्म की शिक्षा अवश्य दें और उन्हें धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करें। जिस बच्चे के जीवन में धर्म का आधार होता है, उसका चरित्र मजबूत होता है। वह सही और गलत का अंतर समझता है, बड़ों का आदर करता है, छोटों से प्रेम करता है और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना सीखता है। धर्म जीवन को दिशा देता है, अनुशासन सिखाता है और कठिन परिस्थितियों में भी सही निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है।
मोबाइल का अत्यधिक प्रयोग बच्चों और युवाओं के लिए के काफी हानिकारक है। इससे पढ़ाई में ध्यान कम होना, एकाग्रता की कमी, चिड़चिड़ापन और सामाजिक दूरी जैसी समस्याएँ बढ़ने लगती हैं। धीरे-धीरे यह आदत लत का रूप ले लेती है, जिससे व्यक्ति वास्तविक जीवन की जिम्मेदारियों से दूर होने लगता है। मोबाइल साधन है, साध्य नहीं। इसका उपयोग सीमित और आवश्यकता के अनुसार ही करना चाहिए।
आज बहुत सारे लोग हमारे धर्माचार्यों के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हैं, हमारे हिंदू देवी- देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करते हैं, हमारे पवित्र ग्रंथों जैसे रामायण और श्रीमद्भगवद्गीता पर कटाक्ष करते हैं। ये सब बंद होना चाहिए। देश में एक कानून बनना चाहिए कि जो भी ऐसे कृत्य करता है उनको कठोर से कठोर सजा मिलनी चाहिए।

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