धार्मिकमध्य प्रदेश

सदी भर पुरानी परंपरा का प्रतीक: प्रतापगढ़ में मढ़ई मेले की धूम 24 अक्टूबर को

दीपावली के बाद आदिवासी संस्कृति की झलक, हजारों की संख्या में उमड़ेंगे ग्रामीण
सिलवानी। 24 अक्टूबर शुक्रवार को आदिवासी अंचल के ग्राम पंचायत प्रतापगढ़ में मढ़ई मेले की धूम रहेगी।
बदलते समय के साथ बहुत कुछ बदला है, लेकिन प्रतापगढ़ गांव की मढ़ई मेले की परंपरा आज भी वैसी ही जीवंत है जैसी सौ वर्ष पहले थी। दीपावली के बाद शुरू होने वाला यह भव्य आयोजन न केवल आदिवासी संस्कृति का उत्सव है, बल्कि सामूहिक एकता, लोक आस्था और समृद्ध परंपरा का जीवंत प्रतीक भी है।
सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व
मढ़ई मेले को देवताओं के मिलन का पर्व माना जाता है। यह आयोजन तब होता है जब खेतों में कृषि कार्य पूर्ण हो चुका होता है और नई फसल की बुआई की तैयारी होती है। आदिवासी समुदाय इसे खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक मानते हैं। ग्रामीणजन पारंपरिक वेशभूषा में सजकर, ढोल, मादल, टिमकी और थाली की थाप पर लोकनृत्य प्रस्तुत करते हैं। इन नृत्यों की शुरुआत गांव के बुजुर्गों या पारंपरिक नायकों की अनुमति से की जाती है।
सामूहिकता और लोक उत्सव की भावना
यह मेला सिर्फ एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि आदिवासी समुदाय की सामाजिक एकता, प्रेम और सहयोग का भी संदेश देता है। देवी-देवताओं की पूजा के साथ शुरू होने वाला यह आयोजन कई हफ्तों तक चलता है, जिसमें गांव-गांव से लोग शामिल होते हैं। उत्सव के दौरान आदिवासी गीतों की गूंज पूरे अंचल में सुनाई देती है।
राजनीतिक और सामाजिक उपस्थिति
आदिवासी अंचल के ग्राम
प्रतापगढ़ का मढ़ई मेला सिलवानी क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध आयोजनों में गिना जाता है। मेले में सिर्फ ग्रामीणजन ही नहीं, बल्कि क्षेत्र के प्रमुख जनप्रतिनिधि और नेता भी बड़ी संख्या में भाग लेते हैं। हजारों की संख्या में श्रद्धालु और दर्शक प्रतापगढ़ पहुंचकर इस ऐतिहासिक परंपरा को जीवंत बनाए रखते हैं।
लोकजीवन की जड़ों से जुड़ी परंपरा
मढ़ई मेला मनोरंजन से कहीं बढ़कर, एक ऐसी परंपरा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी संस्कृति, आस्था और लोकजीवन की विरासत को सहेज रही है। यह आयोजन आने वाली पीढ़ियों के लिए संस्कृति का एक अमूल्य दस्तावेज बन चुका है।

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