मध्य प्रदेश

माफिया करोड़पति बन गए, प्राकृतिक धरोहर खतरे में

प्रशासन की मिलीभगत से ढीमरखेड़ा में रेत और शराब की लूट, मचा हाहाकार
रेत माफिया नदियों से खुलेआम निकाल रहे रेत, अवैध शराब का कारोबार भी चरम पर,शिकायतों के बावजूद पुलिस प्रशासन मौन

रिपोर्टर : सतीश चौरसिया
उमरियापान । ढीमरखेड़ा थाना क्षेत्र में इन दिनों रेत और शराब का अवैध कारोबार इस कदर फैल चुका है कि अब यह क्षेत्र अपराध, भ्रष्टाचार और पर्यावरण विनाश का केंद्र बन गया है। नदियों से अवैध रूप से रेत निकालकर माफिया करोड़ों रुपये कमा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गांव-गांव में अवैध देशी शराब का जाल इस कदर फैल चुका है कि समाज की जड़ें तक हिल चुकी हैं। प्रशासन और विभागों की भूमिका इस पूरी स्थिति में सबसे बड़ा सवाल बनकर उभरी है, क्योंकि वही अधिकारी जो इन अवैध धंधों को रोकने के लिए जिम्मेदार हैं, उन्हीं पर अब संरक्षण देने के आरोप लग रहे हैं।
ढीमरखेड़ा की नदियों पर अवैध खनन का बोलबाला इस हद तक बढ़ चुका है कि कई घाटों से रोजाना ट्रैक्टर, डम्पर और ट्रक भर-भरकर रेत निकाली जा रही है। कोई वैध नापजोख नहीं, कोई ठेका नहीं, कोई निगरानी नहीं — बस खुलेआम लूट का कारोबार चल रहा है। स्थानीय सूत्रों का कहना है कि यह सब बिना सरकारी संरक्षण के संभव नहीं। खनन माफिया स्थानीय प्रशासन, पुलिस और खनिज विभाग के अधिकारियों को नियमित रूप से मोटी रकम पहुंचाकर इस काले धंधे को निर्बाध रूप से चलाए हुए हैं।
रेत माफिया अब इतने शक्तिशाली हो चुके हैं कि वे न केवल सरकारी आदेशों को ठेंगा दिखा रहे हैं, बल्कि आम लोगों में भय और आतंक फैलाकर अपने रास्ते की हर रुकावट मिटा रहे हैं। कई ग्रामीणों ने बताया कि जिन्होंने आवाज उठाने की कोशिश की, उन्हें धमकाया गया, मारा-पीटा गया और झूठे मुकदमों में फंसा दिया गया। खनन के खिलाफ बोलना अब जान जोखिम में डालने जैसा बन गया है।
प्रशासन की ओर से कभी-कभार की जाने वाली छापेमारी भी अब मजाक बनकर रह गई है। सूत्र बताते हैं कि जब भी कार्रवाई की योजना बनती है, माफियाओं को पहले ही इसकी जानकारी मिल जाती है। नतीजा यह होता है कि छापे के दौरान खाली घाट या दो-चार ट्रैक्टर पकड़कर दिखावा कर दिया जाता है। इतना ही नहीं, पकड़े गए वाहनों पर इतना मामूली जुर्माना लगाया जाता है कि अगले दिन वही वाहन फिर से रेत लूटने में लग जाते हैं। यह सब दर्शाता है कि प्रशासन अब रक्षक नहीं, बल्कि इस पूरे रेत तंत्र का सहभागी बन चुका है।
इस अंधाधुंध खनन से ढीमरखेड़ा की नदियाँ दिन-प्रतिदिन खोखली होती जा रही हैं। नदी तल नीचे खिसकने से जलस्तर में भारी गिरावट आई है, जिससे कुओं और हैंडपंपों का पानी सूखने लगा है। कई इलाकों में किसानों को सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल पा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि अगर यह अवैध दोहन बंद नहीं हुआ तो आने वाले समय में भयंकर जल संकट की चपेट में आ जाएगा।
रेत के साथ-साथ अब अवैध शराब का व्यापार भी गांव-गांव में फैल चुका है। ढीमरखेड़ा, पिंडरई, पिपरिया, देवरी, शनकुई, मुरवारी, सहित आसपास के इलाकों में ढीमरखेड़ा थाना प्रभारी की सह पर खुलेआम जहरीली देसी शराब बेची जा रही है। ये शराब न केवल लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, बल्कि समाज में अपराध और हिंसा की जड़ बन चुकी है। कई घर तबाह हो गए हैं, कई परिवारों की खुशियाँ नशे में डूब गई हैं।
ग्रामीण बताते हैं कि अवैध शराब के इस कारोबार को रोकने के लिए कई बार जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और ग्रामवासियों ने आबकारी विभाग और ढीमरखेड़ा पुलिस को शिकायतें दीं, ज्ञापन सौंपे, लेकिन हर बार केवल आश्वासन मिला। न तो कोई ठोस कार्रवाई हुई, न ही शराब माफियाओं पर लगाम कसी गई। अब तो हालत यह है कि आबकारी विभाग और पुलिस कर्मियों की मिलीभगत से ही यह कारोबार फल-फूल रहा है। शराब माफियाओं को पहले से पता होता है कि कब जांच होगी, कब छापा पड़ेगा, जिससे वे आसानी से बच निकलते हैं।
इन अवैध धंधों के चलते गांवों में अपराध बढ़ रहे हैं। शराब के नशे में झगड़े, मारपीट, घरेलू हिंसा और आपराधिक वारदातें आम बात हो गई हैं। महिलाएँ सबसे ज्यादा पीड़ित हैं। कई घरों में रोजाना झगड़े और आर्थिक संकट की स्थिति बन चुकी है। लोगों का कहना है कि ढीमरखेड़ा थाना प्रभारी की निष्क्रियता और मिलीभगत ने इन माफियाओं को और बेखौफ बना दिया है।
अब यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर प्रशासन किसका है — जनता का या माफियाओं का? जब सरकारी सिस्टम खुद अपराधियों की ढाल बन जाए, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने वर्षों से इस समस्या को झेला है, लेकिन अब सब्र का बांध टूट रहा है। वे चेतावनी दे रहे हैं कि अगर प्रशासन ने अब भी कदम नहीं उठाए तो वे सड़कों पर उतरकर आंदोलन करेंगे।
ढीमरखेड़ा की धरती आज दोहरी मार झेल रही है। एक तरफ रेत माफियाओं की प्राकृतिक लूट, दूसरी तरफ शराब माफियाओं का सामाजिक जहर। यह केवल कानून व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से खिलवाड़ है। अगर प्रशासन और सरकार ने समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए, तो ढीमरखेड़ा का नाम आने वाले वर्षों में प्राकृतिक और सामाजिक विनाश के प्रतीक के रूप में लिया जाएगा।

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