सियरमऊ में लोक कल्याण शिविर की खुली पोल, एक घंटे में निपटी जनसुनवाई

खाली पड़ी रहीं हितग्राहियों की कुर्सियां ग्रामीणों से ज्यादा नजर आए अधिकारी-कर्मचारी और स्कूली बच्चे 60,70 आवेदन बताने वाले जिला सीईओ के दावे के सामने रजिस्टर में दर्ज मिले सिर्फ 38 आवेदन
बड़े अधिकारियों की मौजूदगी के बावजूद समस्याओं के निराकरण पर सवाल जनकल्याण के नाम पर शिविर महज औपचारिकता बनकर रह जाने के आरोप
सिलवानी। ग्रामीणों की समस्याओं का मौके पर निराकरण करने और शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने के दावों के बीच ग्राम सियरमऊ में आयोजित लोक कल्याण शिविर की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है। शिविर में ग्रामीण अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीद लेकर पहुंचे, लेकिन मौके की तस्वीर सरकारी दावों से अलग नजर आई। हितग्राहियों के लिए लगाई गई कुर्सियां खाली पड़ी रहीं जबकि अधिकारियों कर्मचारियों और स्कूली बच्चों की मौजूदगी अधिक दिखाई दी। दोपहर करीब 12 बजे पहुंचे जिला स्तरीय अधिकारियों का शिविर दोपहर 1 बजे समाप्त हो गया। महज एक घंटे में जनसुनवाई खत्म होने और आवेदनों की संख्या को लेकर सामने आए विरोधाभास ने लोक कल्याण शिविर की उपयोगिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिविर में अपर कलेक्टर जिला पंचायत सीईओ कमल सोलंकी एडिशनल एसपी सहित विभिन्न विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों की मौजूदगी बताई गई। इसके बावजूद ग्रामीणों की समस्याओं के निराकरण की स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब ग्रामीणों को अपनी समस्याएं रखने और उनके समाधान की उम्मीद के साथ शिविर में बुलाया गया था तो क्या प्रशासन ने उनकी समस्याओं को सुनने और कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त समय दिया
*एक घंटे में खत्म शिविर ग्रामीणों को मिला कितना समाधान*
लोक कल्याण शिविर का उद्देश्य ग्रामीणों को सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने से राहत दिलाना और उनकी शिकायतों का मौके पर निराकरण सुनिश्चित करना है। इसके लिए विभिन्न विभागों के अधिकारियों को एक ही स्थान पर उपस्थित रहकर आवेदन लेने समस्याएं सुनने और आवश्यक कार्रवाई करने की जिम्मेदारी दी जाती है।
लेकिन सियरमऊ में दोपहर करीब 12 बजे अधिकारियों के पहुंचने और 1 बजे शिविर समाप्त होने के बीच का सीमित समय सवाल खड़े करता है। आवेदन लेने दस्तावेजों की जांच करने संबंधित अधिकारियों से चर्चा करने और शिकायतों के निराकरण की प्रक्रिया तय करने के लिए समय की जरूरत होती है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि एक घंटे के भीतर कितने मामलों में वास्तविक कार्रवाई हुई और कितने ग्रामीणों को केवल आवेदन देकर वापस लौटना पड़ा।
*खाली पड़ी रहीं हितग्राहियों की कुर्सियां स्कूली बच्चों की मौजूदगी चर्चा में*
शिविर की व्यवस्था पर सवाल केवल इसकी अवधि तक सीमित नहीं रहे। मौके पर हितग्राहियों के लिए लगाई गई कुर्सियां खाली नजर आने और ग्रामीणों की अपेक्षाकृत कम मौजूदगी के बीच अधिकारियों-कर्मचारियों तथा स्कूली बच्चों की उपस्थिति चर्चा का विषय बनी रही।
जिस आयोजन का मुख्य उद्देश्य ग्रामीणों की समस्याएं सुनना और उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाना है वहां हितग्राहियों की भागीदारी और शिकायतों के निराकरण की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण होती है। यदि ग्रामीणों की समस्याओं के समाधान के बजाय आयोजन की औपचारिकताओं पर अधिक जोर दिखाई दे तो ऐसे शिविरों की सफलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
*सीईओ के दावे और रजिस्टर के आंकड़ों में अंतर क्यों*
शिविर में प्राप्त आवेदनों की संख्या को लेकर मामला और गंभीर हो गया। जिला पंचायत सीईओ कमल सोलंकी ने मीडिया के सवाल पर शिविर में 60 से 70 आवेदन प्राप्त होने की जानकारी दी जबकि जनपद कार्यालय के पंजीयन रजिस्टर में केवल 38 आवेदन दर्ज बताए गए।
एक ओर अधिकारी 60 से 70 आवेदन आने की बात कह रहे हैं, वहीं दूसरी और सरकारी रिकॉर्ड में 38 आवेदन दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि 60 से 70 आवेदन प्राप्त हुए थे, तो शेष आवेदनों का पंजीयन कहां है? वहीं, यदि कुल 38 आवेदन ही दर्ज हुए तो अधिक संख्या किस आधार पर बताई गई
यह अंतर रिकॉर्ड दर्ज करने में हुई त्रुटि आंकड़ों के संकलन में गड़बड़ी या किसी अन्य कारण से हुआ इसकी पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है। इसलिए प्रशासन को पंजीयन रजिस्टर और विभागवार प्राप्त आवेदनों का मिलान कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए।
*विभागवार आंकड़े 38, फिर निराकरण का हिसाब कहां*
शिविर के विभागवार विवरण में कुल 38 आवेदन दर्ज बताए गए हैं। इनमें राजस्व विभाग के 10, पुलिस विभाग के 5, ग्राम पंचायत के 2, पीएचई के 2, जनपद पंचायत के 6, विद्युत विभाग के 3, खाद्य विभाग का 1, लोक निर्माण विभाग का 1, आबकारी विभाग के 4, शिक्षा विभाग का 1, आदिम जाति कल्याण विभाग के 2 और उच्च शिक्षा विभाग का 1 आवेदन शामिल है।
विभागवार आंकड़ों का कुल योग 38 है, जो पंजीयन रजिस्टर में दर्ज संख्या से मेल खाता है। लेकिन केवल आवेदन दर्ज होना ही ग्रामीणों की समस्या का समाधान नहीं माना जा सकता। प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कितने आवेदन मौके पर निराकृत किए गए, कितने संबंधित विभागों को भेजे गए और कितने आवेदन अब भी लंबित हैं। प्रत्येक आवेदन पर हुई कार्रवाई का विवरण सामने आने के बाद ही यह आकलन किया जा सकेगा कि शिविर ग्रामीणों के लिए कितना उपयोगी साबित हुआ।
*बड़े अधिकारी मौजूद, फिर जवाबदेही किसकी*
शिविर में जिले के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी से ग्रामीणों को उम्मीद थी कि उनकी समस्याओं पर गंभीरता से सुनवाई होगी और संबंधित विभागों को मौके पर ही आवश्यक निर्देश दिए जाएंगे। लेकिन शिविर की सीमित अवधि, हितग्राहियों की मौजूदगी और आवेदनों की संख्या को लेकर सामने आए अंतर ने प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं।यदि लोक कल्याण शिविर में प्राप्त आवेदनों की वास्तविक संख्या और उनके निराकरण की स्थिति स्पष्ट नहीं है, तो संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा जाना चाहिए। प्रशासन को यह भी बताना चाहिए कि लंबित शिकायतों पर कार्रवाई की जिम्मेदारी किस अधिकारी को सौंपी गई है और उनका निराकरण कब तक किया जाऐगा।
*प्रचार नहीं समस्याओं के समाधान पर हो जोर*
शासन की मंशा ग्रामीणों तक प्रशासन की पहुंच बढ़ाने और पात्र हितग्राहियों को जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ दिलाने की है। लेकिन इन उद्देश्यों की पूर्ति तभी संभव है, जब शिविरों में ग्रामीणों की पर्याप्त भागीदारी हो, उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुना जाए और प्रत्येक आवेदन पर समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
सियरमऊ के लोक कल्याण शिविर ने प्रशासन के सामने कई अहम सवाल खड़े किए हैं। क्या जनसुनवाई के लिए पर्याप्त समय निर्धारित किया गया था आवेदनों की संख्या में अंतर क्यों सामने आया कितने मामलों का निराकरण हुआ और कितने आवेदन लंबित हैं हितग्राहियों की कम मौजूदगी के कारणों की समीक्षा किस स्तर पर की जाएगी अब जरूरत है कि प्रशासन इन सवालों पर स्थिति स्पष्ट करे और प्रत्येक आवेदन की समीक्षा कर उसके निराकरण की समय-सीमा तय करे। ग्रामीणों को केवल भाषण और आश्वासन नहीं बल्कि उनकी समस्याओं का ठोस समाधान चाहिए। यदि लोक कल्याण शिविरों में भी उन्हें राहत नहीं मिलती और शिकायतों के लिए बार बार सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, तो ऐसे आयोजनों की उपयोगिता पर सवाल उठना लाजिमी है। सियरमऊ का शिविर प्रशासन के लिए आत्ममंथन का विषय है कि जनकल्याण की योजनाएं जमीनी स्तर पर कितनी प्रभावी हैं और सरकारी आयोजनों को वास्तविक जनसुनवाई में बदलने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए।



