मेहनत और परिश्रम की अद्भुत कहानी जिनकी जीवनगाथा किसी हीरो से कम नहीं
रिपोर्टर : सतीश चौरसिया
उमरियापान । मैं इस संसार में आया हूं कुछ ऐसा कर जाऊं कि आने वाली पीढ़ियां मुझे याद करें । शीर्षक पढ़कर दंग मत होना यह कहानी है छोटे से कस्बे में बसे पोड़ी कला बी में जन्मे मधुसूदन (ललन) पाण्डेय की । आर्थिक परिस्थितियाँ कुछ भी रही हों लेकिन मजबूत दृढ़ इच्छाशक्ति और आगे बढ़ने की क्षमता निरंतर जीवन में मधुसूदन (ललन) पाण्डेय के साथ रही। जिनके आगे बढ़ते हुए कदम को आर्थिक परिस्थितियां भी रास्ते का रोड़ा नहीं बन पाई। हर परिस्थितियों में चाहे कितनी भी ठंडी हो या बरसात हो या गर्मी हों निरंतर कर्मपथ पर चलना हैं। चाहे जीवन में कुछ हों या ना हों पर कभी किसी से कुछ मांगने की कोशिश नहीं की है। जीवन में जो संसाधन हमारे पास है जीवनयापन के लिए उनसे ही काम चला लेना किसी रियल लाइफ हीरो से कम नहीं हैं । सिद्धांतवादी, सत्यवादी, स्पष्टवादी, समाज में सबसे लोकप्रिय नाम मधुसूदन (ललन) पाण्डेय का गिना जाता हैं । कहां तो यहां तक जाता हैं कि जिसको जो कह दिया मानों वह समाज के अंदर ब्रह्मस्त्र हैं उसको काटने वाला समाज के अंदर कोई नहीं हैं । मधुसूदन (ललन) पाण्डेय का कहना हैं कि गरीबी में कोई किसी का नहीं होता । व्यक्ति हमेशा अकेले खड़ा रहता हैं । लेकिन गरीबी में व्यक्ति को स्थाई नहीं होना चाहिए बल्कि कर्मपथ पर आगे बढ़ते रहना चाहिए । जहां तक रास्ता दिखता हैं वहां तक चलो आगे का रास्ता वहां पहुंचने के बाद खुद दिखने लगेगा।गरीब पैदा होना पाप नहीं है, परंतु गरीब मरना पाप है ऐसे विचारधारा के हैं मधुसूदन (ललन) पाण्डेय जी। गरीबी को समाज में एक ऐसे हालात के रूप में देखा जाता है जिसमें व्यक्ति के पास जीवन निर्वाह के लिये बुनियादी ज़रूरतें मसलन रोटी, कपड़ा और मकान भी नहीं होते हैं । ऐसी परिस्थितियों में व्यक्ति गरीब माना जाता है। गांवों में बसे लोगों का अगर चूल्हा दोनों समय जल रहा हैं तो बड़े सौभाग्य की बात है, क्यूंकि गांवों में कोई रोजगार नहीं हैं व्यक्ति किसी तरह अपना जीवन निर्वाह कर रहा है। गांवो में आय का साधन केवल कृषि हैं जिसमें भी किसानो को कभी घाटा तो कभी संसाधन का अभाव, किसानों का कृषि से भी मोह-भंग हो रहा है ।लोग ग़रीब इसलिए हैं क्योंकि उन्हें विकल्प चुनने की पूरी आर्थिक आज़ादी नहीं है । हमारे यहाँ ग़रीबी की असल प्रकृति क्या है, इसी की समझ नहीं है । ग़रीबी राजनीति का मुद्दा बनकर रह गई है । कोई भी राजनीतिक पार्टी इस मुद्दे को पूरी तरह ख़त्म नहीं करना चाहती । उदासीन राजनीतिक और सामाजिक ढाँचे मसलन जाति और धर्म के बंधन, संसाधनों का पूरी तरह से दोहन न हो पाना।कृषि में कम उत्पादकता।आय के साधन व्यक्ति के पास अनेको होने चाहिए आज जिस तरह की महंगाई है उसके हिसाब से आय के साधन अगर एक हैं तो जीवन निर्वाह में काफी मशक्कत करनी पड़ेगी इसलिए आय के साधन एक से अधिक होने चाहिए ।



