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मोदी जी के जन्मदिन पर भाजपा से सवाल : सेवा कब बनेगी संस्कार ?

हरीश मिश्र ‘वृक्ष मित्र’, लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार )
2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके जन्मदिन पर भाजपा संगठन ने सेवा गतिविधियों की एक परंपरा विकसित की।
जन्मदिन मनाना गलत नहीं है। रहनुमा के प्रति सम्मान व्यक्त करना भी गलत नहीं। गलत तब शुरू होता है, जब सम्मान विचारों से हटकर व्यक्ति-पूजा में बदल जाए और सेवा दिखावे में।
पंचांग पलटकर देखिए। 2014 में मोदी जी ने अपने जन्मदिन को उत्सव के रूप में मनाने के बजाय देशवासियों से जम्मू-कश्मीर के बाढ़ पीड़ितों के राहत कार्य में तन-मन-धन से सेवा करने की अपील की थी। जन्मदिन को जन-जन की पीड़ा से जोड़ने का वह संदेश उत्सव से बड़ा था।
लेकिन इसके बाद मोदी जी के जन्मदिन के अवसर पर सेवा आयोजनों का स्वरूप लगातार दिखावे की ओर बढ़ता गया। 2015 से शुरू हुई जन्मोत्सव यात्रा विकास दिवस, सेवा दिवस, सेवा सप्ताह, सेवा और समर्पण अभियान, सेवा पखवाड़ा, सेवा परमो धर्मः और अब सेवा संकल्प अभियान तक पहुंच गई।
नाम बदलते गए, अवधि बढ़ती गई।
एक दिन से सप्ताह, सप्ताह से पखवाड़ा और अब एक महीने तक। लेकिन सेवा की अवधि बढ़ने के साथ क्या जनता का दर्द समझने का प्रयास भी बढ़ा?
जिस गरीब के घर चूल्हा नहीं जला, वह यह नहीं देखता कि सेवा पखवाड़ा चल रहा है या नहीं। अस्पताल में भर्ती मरीज पंचांग नहीं देखता। प्यासा पौधा अभियान की अंतिम तारीख नहीं जानता। सड़क पर पड़ा कचरा यह नहीं जानता कि सफाई अभियान समाप्त हो गया।
फिर सेवा की समय-सीमा क्यों?
भाजपा ने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को ही स्वीकार नहीं किया, उसकी कुछ राजनीतिक परंपराओं के कुसंस्कार भी ग्रहण कर लिए, तो यह भाजपा के लिए चिंता का विषय है। रहनुमा के जन्मदिन मनाने की कांग्रेस में परंपरा रही है, जिसमें व्यक्तिगत निष्ठा, परिवार-निष्ठा और चापलूसी की पराकाष्ठा देश ने देखी है।
किसी भी दल का पतन केवल विरोधियों के कारण नहीं होता। कई बार कार्यकर्ताओं की चापलूसी भी पतन का रास्ता तैयार करती है। काम कम और खुशामद अधिक हो जाए तो संगठन विचार का नहीं, व्यक्ति का अनुयायी बनने लगता है।
इसलिए कांग्रेस की राजनीतिक संस्कृति की आलोचना करके सत्ता में आई भाजपा उसकी नकल क्यों कर रही है?
मोदी जी के नाम पर सेवा करनी है तो उनके उस संदेश की आत्मा को क्यों नहीं अपनाया जाता, जिसमें उन्होंने अपने जन्मदिन को बाढ़ पीड़ितों की सेवा के लिए समर्पित करने की अपील की थी?
अस्पताल में मरीज को फल देना अच्छी भावना है। लेकिन एक मरीज को एक केला देने के लिए दर्जनों कार्यकर्ता पहुंच जाएं और अस्पताल की शांति प्रभावित हो, तो सेवा का उद्देश्य पीछे छूट जाता है। मरीज को भीड़ नहीं, उपचार चाहिए। एक केले के लिए भीड़ जुटाने से बेहतर किसी जरूरतमंद की दवा का खर्च उठाना हो सकता है।
सेवा में भीड़ नहीं, संवेदना चाहिए।
‘मां के नाम एक पेड़’ लगाना अच्छी पहल है। लेकिन पौधा लगाते समय तस्वीर खिंच गई, समाचार छप गया और फिर कोई यह देखने नहीं पहुंचा कि पौधा जीवित है या नहीं—तो सवाल उठेगा कि यह पौधारोपण था या कार्यक्रम?
पौधा लगाना पांच मिनट का उत्सव है, उसे पेड़ बनाना जिम्मेदारी।
यही बात सफाई पर भी लागू होती है। एक दिन झाड़ू लेकर सड़क पर उतरना, तालाब या नदी पर श्रमदान करना आसान है। उस सड़क को पूरे वर्ष साफ रखना कठिन।
सेवा की असली परीक्षा कैमरे के सामने नहीं, कैमरे के चले जाने के बाद होती है।
यहीं पंडित दीनदयाल उपाध्याय का अंत्योदय हमें आईना दिखाता है। अंत्योदय केवल भाषण का विषय नहीं था। वह उस अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने की विचारधारा थी, जो विकास की कतार में सबसे पीछे खड़ा है।
सर्किट हाउस में जनप्रतिनिधि और अधिकारी काजू, बादाम, पिस्ता खाकर सेवा संकल्प अभियान की कार्ययोजना बना रहे हैं।
क्या कभी ऐसा भी होगा कि बैठक समाप्त होते ही एसी कक्ष से बाहर निकलकर किसी ऐसे व्यक्ति के आंगन में पहुंचा जाए, जो वर्षों से अपनी समस्या लेकर जनसुनवाई में हर मंगलवार पहुंचता है?
उसकी समस्या फाइल में दर्ज करने से पहले उसके घर जाकर क्यों न पूछी जाए?
उसके आंसुओं का कारण जानना भी तो सेवा है।
सेवा को मंच, माला, कैमरा, बैनर और टेंट की जरूरत नहीं होनी चाहिए। जरूरत होनी चाहिए तो केवल उस संवेदना की, जो किसी दूसरे के दर्द को अपना दर्द समझ सके।
2026 में सेवा संकल्प अभियान एक महीने चलेगा। लाखों दीए जलाए जाएंगे।
अच्छी बात है। लेकिन 17 अक्टूबर के बाद क्या?
यदि सेवा जारी रहनी है तो फिर संकल्प को एक महीने की सीमा में क्यों बांधा जाए?
365 दिन।
24 घंटे।
बिना मंच।
बिना माला।
बिना कैमरे।
बिना जयकारे।
रहनुमा का जन्मदिन मनाना गलत नहीं है। गलत है उसके नाम पर दिखावा करना और उसके बताए अच्छे रास्ते पर न चलना।
किसी नेता के प्रति सबसे बड़ी श्रद्धा उसका जन्मदिन मनाना नहीं, उसके अच्छे विचारों को अपने आचरण में उतारना है।
शौर्यांजलि से सेवा संकल्प तक की यात्रा लंबी हो गई है। अब जरूरत सेवा की अवधि बढ़ाने की नहीं, सेवा को जीवन का संस्कार बनाने की है।
कुंवर बेचैन की पंक्तियां शायद इसी पीड़ा को सबसे सरल ढंग से कहती हैं—
“तुम्हारे दिल की चुभन भी कम होगी,
किसी के पांव से कांटा निकालकर देखो।”
काश, भाजपा का हर कार्यकर्ता इस दर्द को समझे।
किसी दीनदयाल के पांव का कांटा निकालने का संकल्प ले।
प्रधानमंत्री मोदी जी को जन्मदिन की शुभकामनाएं।

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