बिसलेरी पीती सत्ता, ज़हर पीता शहर…

दिव्य चिंतन : हरीश मिश्र ( लेखक, स्वतंत्र पत्रकार ) 9584815781
इस बार इंदौर ने नये वर्ष में जश्न और मातम एक साथ मनाया। ज़श्न उन्होंने मनाया जो संवेदनहीन हैं। जिन्होंने अपनों को खोया है, वह छाती पीट रहे हैं और जिन्होंने लूटा है जश्न मना रहे हैं। मृत देह पर श्रद्धांजलि में समर्पित पुष्प से संवेदनशील नागरिकों का एक ही सवाल है, हे पुष्प ! तुम कैसे मित्र हो !
हर संवेदनशील नागरिक की एक आंख में आंसू और दूसरी में आक्रोश है। आंसू उनके लिए जिन्होंने प्रशासन की लापरवाही के कारण प्राण गंवा दिए और आक्रोश उन जनप्रतिनिधियों के लिए जो चुनाव प्रचार में संघर्षशील, जुझारू होने का दावा करते हैं और जीतने के बाद आम आदमी की पीड़ा से उनको घंटा फर्क नहीं पड़ता।
इंदौर में पाइप से पानी नहीं आया, मौत आई और जब मौत आई, तो जवाब भी चाहिए था, पर जिन पर जवाबदेही है, वे तो बोतलबंद बिसलेरी पीते रहे।
तभी तो प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने वही सवाल किया, जो अक्सर जनप्रतिनिधि सुनना नहीं चाहते। उनके शब्दों मे भड़ास थी, लेकिन भड़ास से ज़्यादा उसमें पछतावे की गंध थी।
उन्होंने साफ़ पूछा, ज़िंदगी की कीमत दो लाख रुपये कैसे हो सकती है ? और फिर वह सवाल, जो बाहरी सत्ता के गलियारे में गूंजना चाहिए,
जब आपकी नहीं चली, तो पद पर बैठे-बैठे बिसलेरी का पानी क्यों पीते रहे ?
उमा भारती का यह हमला किसी एक व्यक्ति पर नहीं, उस मानसिकता पर है जहां कुर्सी बची रहे, भले ही लोग न बचें। उन्होंने महापौर पुष्यमित्र भार्गव को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा, अगर जिम्मेदारी नहीं निभा पा रहे, तो पद छोड़कर जनता के बीच क्यों नहीं आए ?
उनके शब्दों में यह गलती नहीं, पाप है और पाप का विकल्प स्पष्टीकरण नहीं होता या तो प्रायश्चित या फिर दंड।
दूषित पानी से मौत, यह खबर नहीं, यह शासन की असफलता का पोस्टमार्टम है। उमा भारती पहले भी कह चुकी हैं कि ऐसी मौतें पूरे तंत्र के मुंह पर तमाचा हैं। दो लाख का मुआवजा आंकड़ों में ठीक लग सकता है, लेकिन जिन घरों का चूल्हा ठंडा पड़ चुका है, वहां यह रकम सिर्फ़ एक काग़ज़ का टुकड़ा है, संवेदना नहीं।
इस पूरे प्रसंग को उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के लिए “परीक्षा की घड़ी” बताया है।
यह परीक्षा भाषणों की नहीं वरन फैसलों की है।
दोषियों पर कार्रवाई होगी या फाइलें पानी की तरह बहा दी जाएंगी,यही असली सवाल है।
समस्या पाइपलाइन में नहीं, सत्ता की रीढ़ में है।



