
आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
✦••• जय श्री हरि •••✦
🧾 आज का पंचाग 🧾
मंगलवार 14 अप्रैल 2026
14 अप्रैल 2026 दिन मंगलवार को बैशाख मास के कृष्ण पक्ष कि वरुथिनी एकादशी के पारण का निर्णय देखते हैं। तो जैसा कि आप जानते हैं, कि 13 अप्रैल 2026 को अर्द्धरात्रि के उपरांत 01.18 पी एम एकादशी तिथि शुरू होकर 14 अप्रैल 2026 को अर्द्धरात्रि 01.09 ए एम तक एकादशी थी। इसलिए 14 अप्रैल 2026 को पारण का समय सुबह 06.25 ए एम से 08.55 ए एम तक है। इस समय के भीतर ही सभी वरुथिनी एकादशी व्रतियों को एकादशी व्रत का पारण कर लेना चाहिए। आज भगवान श्रीसूर्यनारायण मेरी राशि से चलकर 03.45 पी एम तक मेष राशि में चले जाएंगे। इसका पुण्य काल शायद 4:00 बजे होगा। अर्थात आज खरमास की समाप्ति् हो जाएगी। आज हरिद्वार या काशी या फिर प्रयाग के संगम में स्नान सत्तू और जलकुंभ आदि का दान करना सर्वश्रेष्ठ रहेगा। आज डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती भी है। आज यायीजययोग और त्रिपुष्कर योग भी है। आप सभी सनातनियों को “भोम प्रदोष व्रत एवं डॉ भीमराव अंबेडकर जी के जन्म जयन्ती” की हार्दिक शुभकामनायें।।
*हनुमान जी का मंत्र : हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट् । 🌌 दिन (वार) – मंगलवार के दिन क्षौरकर्म अर्थात बाल, दाढ़ी काटने या कटाने से उम्र कम होती है। अत: इस दिन बाल और दाढ़ी नहीं कटवाना चाहिए । *मंगलवार को हनुमान जी की पूजा और व्रत करने से हनुमान जी प्रसन्न होते है। मंगलवार के दिन हनुमान चालीसा एवं सुन्दर काण्ड का पाठ करना चाहिए।
*मंगलवार को यथासंभव मंदिर में हनुमान जी के दर्शन करके उन्हें लाल गुलाब, इत्र अर्पित करके बूंदी / लाल पेड़े या गुड़ चने का प्रशाद चढ़ाएं । हनुमान जी की पूजा से भूत-प्रेत, नज़र की बाधा से बचाव होता है, शत्रु परास्त होते है। 🔮 *शुभ हिन्दू नववर्ष 2026 विक्रम संवत : 2083 सिद्धार्थी विक्रम : 1969 शर्वरी* 🌐 रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083,
✡️ शक संवत 1948 (पराभव संवत्सर), चैत्र
☮️ गुजराती सम्वत : 2082 पिङ्गल
☸️ काली सम्वत् 5127_
🕉️ संवत्सर (बृहस्पति) पराभव
☣️ आयन – उत्तरायण
☂️ ऋतु – सौर बसंत ऋतु
☀️ मास – बैशाख मास
🌒 पक्ष – कृष्ण पक्ष
📅 तिथि – मंगलवार बैशाख माह के कृष्ण पक्ष द्वादशी तिथि 12:12 AM तक उपरांत त्रयोदशी
✏️ तिथि स्वामी – द्वादशी के देवता हैं विष्णु। इस तिथि को भगवान विष्णु की पूजा करने से मनुष्य सदा विजयी होकर समस्त लोक में पूज्य हो जाता है।
💫 नक्षत्र- शतभिषा 04:05 PM तक उपरांत पूर्वभाद्रपदा
🪐 नक्षत्र स्वामी – शतभिषा नक्षत्र के स्वामी राहु हैं। और इसके देवता वरुण देव (जल के देवता) हैं।
⚜️ योग – शुक्ल योग 03:39 PM तक, उसके बाद ब्रह्म योग
⚡ प्रथम करण : कौलव 12:46 PM तक
✨ द्वितीय करण : तैतिल 12:12 AM तक, बाद गर
🔥 गुलिक काल : मंगलवार का गुलिक दोपहर 12:06 से 01:26 बजे तक।
🤖 राहुकाल (अशुभ) – दोपहर 15:19 बजे से 16:41 बजे तक। राहु काल में शुभ कार्य करना वर्जित माना गया है।
⚜️ दिशाशूल – मंगलवार को उत्तर दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिये, यदि अत्यावश्यक हो तो कोई गुड़ खाकर यात्रा कर सकते है।
🌞 सूर्योदयः – प्रातः 05:48:00
🌅 सूर्यास्तः – सायं 06:25:00
👸🏻 ब्रह्म मुहूर्त : प्रातः 04:27 ए एम से 05:12 ए एम
🌇 प्रातः सन्ध्या : प्रातः 04:50 ए एम से 05:57 ए एम
🌟 अभिजित मुहूर्त : दोपहर 11:56 ए एम से 12:47 पी एम
🔯 विजय मुहूर्त : दोपहर 02:30 पी एम से 03:21 पी एम
🐃 गोधूलि मुहूर्त : शाम 06:45 पी एम से 07:07 पी एम
🌃 सायाह्न सन्ध्या : शाम 06:46 पी एम से 07:53 पी एम
💧 अमृत काल : प्रातः 08:53 ए एम से 10:29 ए एम
🗣️ निशिता मुहूर्त – रात्रि 11:59 पी एम से 12:43 ए एम, अप्रैल 15
🌸 त्रिपुष्कर योग – शाम 04:06 पी एम से 12:12 ए एम, अप्रैल 15
🚓 यात्रा शकुन- मंगलवार को दलिया का सेवन कर यात्रा पर निकलें।
👉🏼 आज का मंत्र-ॐ अं अंगारकाय नम:।
💁🏻♀️ आज का उपाय-देवी मन्दिर में सवाकिलो अनार चढ़ाएं।
🌴 वनस्पति तंत्र उपाय- खैर के वृक्ष में जल चढ़ाएं।
⚛️ पर्व एवं त्यौहार – वरूथिनी एकादशी (सर्वे स्मार्त)पारण/ कृष्ण वामन द्वादशी/ मेष संक्रान्ति/ सोलर नववर्ष/ पुथन्डू, पञ्चक/ त्रिपुष्कर योग/ बैशाखी (पंजाब)/ डॉ. भीमराव अंबेडकर जयन्ती, महापंडित राहुल सांकृत्यायन स्मृति दिवस, राष्ट्रीय बागवानी दिवस, राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन स्मृति दिवस, राष्ट्रीय पूर्व-जीवनसाथी दिवस, स्वाधीनता सेनानी पूरन चन्द जोशी जन्म दिवस, प्रसिद्ध पार्श्वगायिका शमशाद बेगम जन्म दिवस, बीसवीं सदी के महान् संत रमण महर्षि स्मृति दिवस, अध्यक्ष डॉ. विश्राम रामजी घोले जन्म दिवस, भारतीय संगीतकार अली अकबर खान जयन्ती, गायक राजेश्वरी सचदेवी जन्म दिवस, इतिहासकार केदारनाथ पांडे पुण्य तिथि, उद्योगपति राम प्रसाद गोयनका स्मृति दिवस
✍🏼 *तिथि विशेष – द्वादशी तिथि को मसूर की दाल एवं मसूर से निर्मित कोई भी व्यंजन नहीं खाना न ही दान देना चाहिये। यह मसूर से बना सभी व्यंजन इस द्वादशी तिथि में त्याज्य बताया गया है। द्वादशी तिथि के स्वामी भगवान श्री हरि नारायण भगवान को बताया गया है। आज द्वादशी तिथि के दिन भगवान नारायण का श्रद्धा-भाव से पूजन करना चाहिये। साथ ही भगवान नारायण के नाम एवं स्तोत्रों जैसे विष्णुसहस्रनाम आदि के पाठ अवश्य करने चाहिए। नाम के पाठ एवं जप आदि करने से व्यक्ति के जीवन में धन, यश एवं प्रतिष्ठा की प्राप्ति सहज ही होने लगती है। 🏘️ *_Vastu tips* 🏚️
रात में जूठे बर्तन छोड़ना क्यों गलत आचार्य श्री गोपी राम के अनुसार रात में किचन को गंदा छोड़ना या सिंक में जूठे बर्तन रखना अच्छा नहीं माना जाता। इससे घर में नकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है और मां लक्ष्मी की कृपा कम हो सकती है। इसका असर आर्थिक स्थिति पर भी पड़ सकता है।
*अगर बर्तन धोना संभव न हो तो क्या करें अगर किसी कारण से रात में बर्तन साफ करना संभव न हो, तो कम से कम उनमें पानी डालकर जरूर रखें। ऐसा करने से नकारात्मक प्रभाव कुछ हद तक कम हो जाता है। हालांकि इसे रोज की आदत बनाना ठीक नहीं माना जाता। *रसोई से जुड़े जरूरी वास्तु नियम शास्त्र के अनुसार किचन में पानी और आग से जुड़ी चीजों को पास-पास नहीं रखना चाहिए। सिंक और गैस चूल्हे के बीच दूरी बनाए रखना जरूरी है, क्योंकि इससे घर की सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित होती है।
📖 गुरु भक्ति योग 🕯️
त्रेता युग की बात है जब रावण का अत्याचार अपने चरम पर था और वह इतना शक्तिशाली हो चुका था कि उसने नवग्रहों को भी बंदी बना लिया था ताकि कोई भी उसकी कुंडली में विपत्ति ना डाल सके और उसके अहंकार का कोई अंत ना हो पाए।
*शनिदेव जो कि न्याय और कर्म फल के देवता हैं उन्हें भी रावण ने लंका की एक अंधेरी कोठरी में बंदी बना रखा था और उन्हें उल्टी स्थिति में लटका रखा था ताकि उनकी दृष्टि रावण पर ना पड़ सके क्योंकि रावण को भली-भांति पता था कि यदि शनिदेव की दृष्टि उस पर पड़ी तो उसका विनाश निश्चित है। *शनिदेव को इस हालत में देखकर अन्य नवग्रह भी बेहद दुखी थे। पर वे कुछ कर नहीं सकते थे क्योंकि रावण की शक्ति अपार थी और उसने सभी को अपने वश में कर रखा था। उधर भगवान राम माता सीता की खोज में चिंतित थे। उन्होंने हनुमान जी को लंका जाकर माता सीता का पता लगाने भेजा।
*पवन पुत्र हनुमान जी ने आकाश की ओर देखा और अपनी शक्ति से उड़ते हुए समुद्र को पार कर लिया। रात्रि के अंधेरे में वे सीधे लंका पहुंच गए। लंका में पहुंचकर हनुमान जी ने अपना आकार छोटा कर लिया और वे एक-एक महल में जाकर माता सीता को खोजने लगे। हनुमान जी एक के बाद एक महल देखते जा रहे थे और हर जगह केवल राक्षस और रावण के सैनिक ही दिख रहे थे। *हनुमान जी यूं ही लंका में घूमते-घूमते एक अंधेरे और सुनसान हिस्से में पहुंच गए जहां कुछ पुरानी और टूटी-फूटी इमारतें थी। तभी अचानक उन्हें एक धीमी कराहने की आवाज सुनाई दी जो किसी जेलखाने से आ रही थी। हनुमान जी रुक गए और उन्होंने अपने कान लगाकर ध्यान से सुना तो उन्हें लगा कि कोई बहुत ही कष्ट में है और ओम का जाप कर रहा है।
*हनुमान जी तुरंत उस आवाज की दिशा में चल पड़े और वे एक भारी लोहे के दरवाजे के सामने आकर रुक गए। दरवाजा बंद था और उस पर कई ताले लगे हुए थे। हनुमान जी ने अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए उन सभी तालों को तोड़ दिया और दरवाजा खोल दिया। जैसे ही दरवाजा खुला, हनुमान जी के सामने एक भयानक दृश्य था। एक अंधेरी कोठरी में शनिदेव उल्टे लटके हुए थे। उनके हाथ पैर लोहे की मोटी जंजीरों में जकड़े हुए थे और उनके चेहरे पर असहनीय पीड़ा थी। लेकिन फिर भी वे ओम का जाप कर रहे थे। *हनुमान जी यह दृश्य देखकर अत्यंत दुखी हुए और उन्होंने तुरंत पहचान लिया कि यह तो स्वयं शनिदेव हैं। हनुमान जी ने विनम्रता से कहा, हे प्रभु आप तो शनिदेव हैं। आप यहां इस हालत में कैसे?
*शनिदेव ने जवाब दिया, हां पवन पुत्र मैं शनि हूं। रावण ने मुझे और अन्य सभी नवग्रहों को बंदी बना रखा है। उसने मुझे इस तरह उल्टा लटका रखा है ताकि मेरी दृष्टि उस पर ना पड़े क्योंकि वह जानता है कि मेरी दृष्टि उसके विनाश का कारण बन सकती है। *हनुमान जी का हृदय करुणा से भर गया और उनका चेहरा क्रोध से लाल हो गया। उन्होंने कहा यह घोर अन्याय है शनिदेव। मैं आपको अभी इसी क्षण मुक्त करता हूं और हनुमान जी ने बिना समय गवाए उन मोटी लोहे की जंजीरों को अपने हाथों से पकड़ लिया और अपनी पूरी शक्ति लगाकर उन्हें तोड़ना शुरू कर दिया।
*जंजीरें टूटने लगी पर तभी शनिदेव ने हनुमान जी को रोकते हुए कहा रुको हनुमान रुको पहले मेरी बात सुन लो। हनुमान जी रुक गए और उन्होंने शनिदेव की ओर देखा। शनिदेव ने कहा पवन पुत्र मैं जानता हूं कि तुम्हारा हृदय बहुत ही दयालु है और तुम मुझे इस कष्ट से मुक्त करना चाहते हो लेकिन एक बात का ध्यान रखना जैसे ही मैं इन जंजीरों से मुक्त होऊंगा और सीधा खड़ा हो जाऊंगा मेरी आंखें खुलेंगी और मेरी दृष्टि सबसे पहले तुम पर ही पड़ेगी। *हनुमान जी ने कहा तो इसमें क्या समस्या है शनिदेव? शनिदेव ने गंभीर स्वर में कहा हनुमान तुम नहीं जानते मेरी दृष्टि कितनी कठोर और भयंकर होती है। जिस पर भी मेरी दृष्टि पड़ती है उसे साढ़े सात साल का कठिन समय झेलना पड़ता है। उसके जीवन में अनेकों विपत्तियां आती हैं, कष्ट आते हैं और वह व्यक्ति अत्यंत पीड़ा से गुजरता है। मैं नहीं चाहता कि तुम जो मेरी भलाई कर रहे हो, उसी तुम्हें मेरी दृष्टि का कष्ट झेलना पड़े।
*हनुमान जी मुस्कुराए और उन्होंने बड़ी विनम्रता से कहा शनिदेव आप चिंता ना करें। मैं तो केवल भगवान राम का दास हूं। मैं तो बस उनकी सेवा में लगा रहता हूं। जो भी मेरे जीवन में होगा वह प्रभु राम की इच्छा से ही होगा। मुझे किसी भी बात का भय नहीं है। आप निश्चिंत रहें।और यह कहते हुए हनुमान जी ने दोबारा से जंजीरों को तोड़ना शुरू कर दिया। शनिदेव ने एक बार फिर कहा, हनुमान सोच लो यह निर्णय बहुत ही गंभीर है। *पर हनुमान जी ने बिना रुके जंजीरें तोड़ना जारी रखा और आखिरकार सभी जंजीरें टूट गई। शनिदेव धीरे-धीरे नीचे उतरे और फिर धीरे-धीरे शनिदेव खड़े हुए और जैसे ही उनकी आंखें खुली, उनकी आंखों से तेज नीली किरणें निकली और वे किरणें सीधे हनुमान जी पर पड़ी। पूरा वातावरण एक पल के लिए शांत हो गया और एक अजीब सी ऊर्जा का अनुभव हुआ।
*शनिदेव ने गंभीर स्वर में कहा मेरी दृष्टि पड़ गई है तुम पर हनुमान अब तुम्हें मेरी दृष्टि का प्रभाव झेलना पड़ेगा जैसे ही शनिदेव की दृष्टि हनुमान जी पर पड़ी उनके शरीर में एक नई ऊर्जा फैल गई उनकी आंखें तेज हो उठी और उनके चारों ओर प्रकाश फैलने लगा हनुमान जी के भीतर अचानक अपार शक्ति जागृत हो गई उन्होंने ऊंचे स्वर में कहा जय श्री राम और तेजी से वहां से बाहर निकल पड़े *शनिदेव वहीं खड़े रह गए और मन मन ही मन सोचने लगे अब मेरी दृष्टि का हनुमान जी पर क्या प्रभाव होगा? हनुमान जी उस जेलखाने से बाहर निकलकर लंका के महलों की ओर बढ़ने लगे और उनके अंदर एक अजीब सा क्रोध और शक्ति का अनुभव हो रहा था
*और राक्षस जाग गए। राक्षसों ने हनुमान जी को देखा तो वे चिल्लाने लगे। कौन है? यह कैसे यहां आया? पकड़ो इसे पकड़ो। और राक्षस हनुमान जी की ओर दौड़ने लगे। हनुमान जी ने उन राक्षसों को देखा और अपनी गदा से उन पर प्रहार करना शुरू कर दिया। हनुमान जी एक के बाद एक राक्षस को मारते जा रहे थे और लंका में हाहाकार मच गया। हनुमान जी का पराक्रम देखकर राक्षस भयभीत हो गए और वे भागने लगे *पर हनुमान जी रुकने वाले नहीं थे। वे लंका के हर कोने में जाकर तबाही मचा रहे थे। हनुमान जी यूं ही महलों को तोड़ते और राक्षसों को मारते हुए अशोक वाटिका पहुंच गए। जहां माता सीता वृक्ष के नीचे बैठी थी। हनुमान जी ने माता सीता को देखा और उन्हें पहचान लिया। उन्होंने विनम्रता से माता सीता को प्रणाम किया और उन्हें भगवान राम का संदेश दिया।
*माता सीता बहुत प्रसन्न हुई और उन्होंने हनुमान जी को आशीर्वाद दिया। पर हनुमान जी के अंदर अभी भी शनिदेव की दृष्टि का प्रभाव चल रहा था और उनके मन में लंका को नष्ट करने की प्रबल इच्छा थी। माता सीता से मिलने के बाद हनुमान जी ने अशोक वाटिका में तोड़फोड़ करना शुरू कर दिया। उन्होंने एक-एक पेड़ उखाड़ दिया और पूरी वाटिका को उजाड़ दिया। *फिर जब ब्रम्हास्त्र के प्रयोग से हनुमान जी की पूंछ में आग लगा दी। राक्षस खुशी से ताली बजाने लगे और रावण हंसने लगा। पर उधर शनिदेव भी इस सब को देख रहे थे। वे छुपकर रावण के दरबार के पास ही खड़े थे और हनुमान जी को देख रहे थे।
*जैसे ही हनुमान जी की पूंछ में आग लगी, आग की लपटें चारों ओर फैलने लगी और कुछ लपटें शनिदेव की ओर भी आई। शनिदेव को भी उन लपटों से झुलसना पड़ा। शनिदेव को समझ आ गया कि यह उनकी अपनी दृष्टि का ही प्रभाव है जो हनुमान जी पर पड़ा था और अब वही प्रभाव उन पर लौट रहा है। *लंका दहन के पश्चात पंच की की आग बुझा हनुमंन्जी फिर लंका की ओर लौट आए। लंका अभी भी जल रही थी। हनुमान जी ने शनिदेव को ढूंढना शुरू किया और आदर से बोले शनिदेव आप कहां हैं? थोड़ी दूर से शनिदेव की आवाज आई। हनुमान जी उस दिशा में बढ़े और उन्हें शनिदेव को सम्मान से संभाला और उन्हें आग से दूर एक सुरक्षित जगह ले गए।
*हनुमान जी ने विनम्रता से पूछा, देव आप ठीक तो हैं? शनिदेव ने शांत और गंभीर स्वर में कहा पवन पुत्र संसार में कर्म का नियम सब पर समान होता है। जो प्रभाव दूसरों पर पड़ता है उसका अनुभव कभी स्वयं को भी होता है। यह ईश्वर का नियम है। *हनुमान जी ने शनिदेव की बात समझी और हनुमान जी ने कहा शनिदेव आप चिंता ना करें। मैं आपकी सेवा करूंगा और आपको ठीक कर दूंगा। वहां उन्होंने ध्यान से शनिदेव की देखभाल की। हनुमान जी ने उनके शरीर पर ठंडा लेप लगाया और पूरी रात उनकी सेवा करते रहे। धीरे-धीरे शनिदेव को आराम मिलने लगा।
*हनुमान जी की निस्वार्थ सेवा देखकर शनिदेव बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा हनुमान तुम सच्चे भक्त हो। तुमने कभी मुझे दोष नहीं दिया। तुम्हारे मन में कोई अहंकार नहीं है। इसी कारण तुम महान हो। *हनुमान जी ने विनम्रता से कहा, शनिदेव आप न्याय के देवता हैं और आपका कर्तव्य है कर्मों का फल देना। मैं तो बस भगवान राम का दास हूं और मेरा धर्म सेवा करना है। मुझे किसी भी बात का दुख नहीं है क्योंकि जो भी हुआ वह प्रभु की इच्छा से हुआ। जब शनिदेव पूरी तरह से स्वस्थ हो गए तो वे खड़े हुए और शनिदेव ने हनुमान जी के सामने हाथ जोड़े और कहा हनुमान आज मैंने तुम्हारी महानता को देखा है। तुम अहंकार रहित हो और केवल सेवा में लीन हो। तुमने मुझे ना केवल मुक्त किया बल्कि मेरी सेवा भी की। तुम्हें एक वरदान देना चाहता हूं।
*हनुमान जी ने कहा शनिदेव मुझे किसी वरदान की आवश्यकता नहीं है। मैंने तो केवल अपना कर्तव्य निभाया है। पर शनिदेव ने कहा नहीं हनुमान तुमने मुझ पर बड़ा उपकार किया है। मैं तुम्हें अवश्य वरदान दूंगा। शनिदेव के हाथों से दिव्य प्रकाश निकलने लगा और पूरा वातावरण पवित्र हो गया। *तब शनिदेव ने कहा हनुमान मैं तुम्हें यह वरदान देता हूं। पहला जो भी भक्त सच्चे मन से तुम्हारी उपासना करेगा उस पर मेरी कुदृष्टि नहीं पड़ेगी। दूसरा जो हनुमान चालीसा का पाठ करेगा उसे मेरे कष्ट काल में भी सुरक्षा मिलेगी। तीसरा जो तुम्हारी मूर्ति या चित्र धारण करेगा मैं उसे कष्ट नहीं दूंगा। चौथा जो शनिवार के दिन तुम्हारी पूजा करेगा उस पर मेरी विशेष कृपा रहेगी। पांचवा तुम्हारे भक्तों पर मेरा प्रभाव कम और सौम्य रहेगा। आज से यह मेरा वचन है।
*हनुमान जी हाथ जोड़े खड़े रहे और उन्होंने विनम्रता से कहा, शनिदेव, यह आपकी कृपा है। मैं तो केवल राम का दास हूं। शनिदेव ने कहा, इसीलिए तो तुम महान हो। हनुमान, तुम्हारे अंदर अहंकार नाम की कोई चीज नहीं है। तुम्हारा हृदय बिल्कुल पवित्र है और तुम केवल सेवा में विश्वास रखते हो। *तभी से यह मान्यता चली आ रही है कि शनिवार के दिन हनुमान जी की पूजा करने से शनिदेव के कष्ट शांत होते हैं। शनि की साढ़ेसाती या ढैया के समय लोग हनुमान जी की शरण में जाते हैं।
●▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬●
⚜️ द्वादशी तिथि के दिन तुलसी नहीं तोड़ना चाहिये। आज द्वादशी तिथि के दिन भगवान नारायण का पूजन और जप आदि करने से मनुष्य का कोई भी बिगड़ा काम भी बन जाता है। यह द्वादशी तिथि यशोबली अर्थात यश एवं प्रतिष्ठा प्रदान करने वाली तिथि मानी जाती है। यह द्वादशी तिथि सर्वसिद्धिकारी अर्थात अनेकों प्रकार के सिद्धियों को देनेवाली तिथि भी मानी जाती है। यह द्वादशी तिथि भद्रा नाम से विख्यात मानी जाती है। यह द्वादशी तिथि शुक्ल पक्ष में शुभ तथा कृष्ण पक्ष में अशुभ फलदायिनी मानी जाती है।।



