मध्य प्रदेश

जिला परिवहन कार्यालय में मची अंधेरगर्दी, दफ्तर में बाबूओं के पद खाली दलालों का राज

बगैर सेवाशुल्क दिए बिना कार्य निपटे यह मुमकिन नहीं।
रिपोर्टर : शिवलाल यादव
रायसेन ।
आपने अंधेर नगरी चौपट राजा वाली कहावत ….तो सुनी होगी।इस हकीकत को बयां कर रहा है यहां का जिला परिवहन कार्यालय खरगावली। जहां भर्राशाही का आलम यह है कि आरटीओ किसी भी दिन ऑफिस की कुर्सी पर नहीं बैठते हैं तो वहीं उनके जिम्मेदार कर्मचारी दिनेश वर्मा पूरे विभाग को चला रहे हैं । पता चला है कि उन्हें जिला प्रशासन द्वारा यहां चल रहे जन सेवा अभियान का नोडल अधिकारी बनाया गया है। आरटीओ में आलम यह है कि बाबू दिनेश वर्मा के पास इतने चार्ज हैं कि इनको खुद नहीं मालूम कि मेरे पास कितने चार्ज हैं। या यूँ कहा जाए कि आरटीओ जगदीश भील से मिलने का रास्ता बाबू दिनेश वर्मा से होकर जाता है।
जिला परिवहन कार्यालय का वर्षों पुराना बिगड़ा ढर्रा सुधरने का नाम नहीं ले रहा है। जब आरटीओ कार्यालय में मीडिया कर्मियों की टीम जायजा लेने पहुंची तो एक महिला कर्मचारी और एक पुरुष के अलावा सभी नदारद मिले। हर कमरे में केवल ताला लगा मिला । वहीं पूरे दफ्तर परिसर में आवारा पशुओं का जमावड़ा देखने को मिला। आरटीओ के चहेते बाबू दिनेश वर्मा की बात की जाए तो बाबूजी के पास सभी चार्ज है । उसके बावजूद भी क्लर्क दिनेश वर्मा आफिस से नदारद मिले तो पूछने पर सही जवाब नहीं दे पाए । लेकिन कहा जाता है कि आरटीओ जगदीश सिंह भील के सबसे चहेते बाबू दिनेश वर्मा ही बने हुए हैं। इनके पास कमर्शियल लाइसेंस हो ट्रैक्टर का रजिस्ट्रेशन हो या वाहनों के परमिट के चार्ज भी इन्ही के पास हैं । यहां उनके बिना उनकी अनुमति के आरटीओ खरगावली में पत्ता भी नहीं हिलता है। मनमानी का आलम यह है कि क्लर्क वर्मा को हर काम के बदले मोटा सेवाशुल्क चाहिए।वरना यहां जरूरी कामकाज कराने वाले को दर- दर ठोकरे खाने के लिए ही मजबूर होना पड़ता है। कमोवेश यही स्थिति आरटीओ में दलालों की बनीं हुई है। बाबुओं की कमी के चलते यहां दफ्तर की कुर्सियों पर बैठे हुए हैं ।यह सब आरटीओ की सरपरस्ती में चल रहा है। वह मोटी कमीशनखोरी लिए बगैर कोई काम करना पसंद ही नहीं करते। जब दफ्तर के क्लर्क दिनेश वर्मा से मीडिया कर्मियों ने बातचीत
करने की कोशिश की तो उन्होंने कहा मेरे पास वाइट देने का अधिकार नहीं है।
लेकिन जिम्मेदार अधिकारी आरटीओ जगदीश भील भी कार्यालय से नदारद मिले। बाद में वह नोडल अधिकारी होने का बहाना बनाते नजर आए। आलम यह है कि बाबू दिनेश वर्मा की बिना अनुमति के जिला परिवहन कार्यालय में पत्ता भी नहीं हिलता । भोपाल से गाड़ी का परमिट बनवाने के लिए आरटीओ रायसेन आए सचिन गुर्जर ने बताया कि बाबू दिनेश वर्मा कभी मिलते ही नहीं है । मैं कार्य कराने के लिए भोपाल से दो बार रायसेन आ चुका हूं । लेकिन उसके बाद भी बाबूजी नहीं मिल रहे हैं।

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