
आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
✦••• जय श्री हरि •••✦
🧾 आज का पंचाग 🧾
सोमवार 24 नवम्बर 2025
24 नवम्बर 2025 दिन सोमवार को मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष कि चतुर्थी तिथि है। आज वैनायकी श्रीगणेश चतुर्थी का पावन व्रत है। इसे सामान्य भाषा में गणेश चौथ के नाम से भी जाना जाता है। सामान्यतया श्री गणेश चतुर्थी का व्रत सनातनी स्त्रियां अपने पुत्रों के दीर्घायु हेतु दिनभर अखंड उपवास रखकर, सायंकाल में भगवान श्रीगणेश की पूजा करने के बाद चंद्र देवता के निकलने (चंद्रोदय:- रात्रि 10.03 PM ) पर उन्हें देखकर ही अध्र्य देकर ही व्रत खोलते हैं। आज रवि योग एवं परयायीजययोग भी है। आप सभी सनातनियों को “वैनायकी श्रीगणेश चतुर्थी के पावन व्रत” की हार्दिक शुभकामनायें।।
*महा मृत्युंजय मंत्र – ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।। ☄️ *दिन (वार) – सोमवार के दिन क्षौरकर्म अर्थात बाल, दाढ़ी काटने या कटाने से पुत्र का अनिष्ट होता है शिवभक्ति को भी हानि पहुँचती है अत: सोमवार को ना तो बाल और ना ही दाढ़ी कटवाएं ।
*सोमवार के दिन भगवान शंकर की आराधना, अभिषेक करने से चन्द्रमा मजबूत होता है, काल सर्प दोष दूर होता है। *सोमवार का व्रत रखने से मनचाहा जीवन साथी मिलता है, वैवाहिक जीवन में लम्बा और सुखमय होता है।
*जीवन में शुभ फलो की प्राप्ति के लिए हर सोमवार को शिवलिंग पर पंचामृत या मीठा कच्चा दूध एवं काले तिल चढ़ाएं, इससे भगवान महादेव की कृपा बनी रहती है परिवार से रोग दूर रहते है। *सोमवार के दिन शिव पुराण के अचूक मन्त्र “श्री शिवाये नमस्तुभ्यम’ का अधिक से अधिक जाप करने से समस्त कष्ट दूर होते है. निश्चित ही मनवाँछित लाभ मिलता है।
🔮 शुभ हिन्दू नववर्ष 2025 विक्रम संवत : 2082 कालयक्त विक्रम : 1947 नल
🌐 कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082,
✡️ शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), चैत्र
👸🏻 शिवराज शक 352 प्रारम्भ
☮️ गुजराती सम्वत : 2081 नल
☸️ काली सम्वत् 5126
🕉️ संवत्सर (उत्तर) क्रोधी
☣️ आयन – दक्षिणायन
🌧️ ऋतु – सौर हेमंत ऋतु
⛈️ मास – मार्गशीर्ष मास
🌘 पक्ष – शुक्ल पक्ष
📆 तिथि – सोमवार मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि 09:22 PM तक उपरांत पंचमी
✏️ तिथि स्वामी – चतुर्थी के देवता हैं शिवपुत्र गणेश। इस तिथि में भगवान गणेश का पूजन से सभी विघ्नों का नाश हो जाता है। यह खला तिथि हैं।
💫 नक्षत्र – नक्षत्र पूर्वाषाढ़ा 09:53 PM तक उपरांत उत्तराषाढ़ा
🪐 नक्षत्र स्वामी – पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र का स्वामी शुक्र है। इस नक्षत्र का वैदिक देवता अपस (जल देवता) है और यह धनु राशि में आता है, जिसका स्वामी बृहस्पति है।
⚜️ योग – योग 12:36 PM तक, उसके बाद गण्ड योग
⚡ प्रथम करण : वणिज – 08:25 ए एम तक
✨ द्वितीय करण : विष्टि – 09:22 पी एम तक बव
🔥 सोमवार का शुभ गुलिक कालः-शुभ गुलिक काल 01:42:00 P.M से 02:59:00 P.M बजे तक
⚜️ दिशाशूलः- आज के दिन पूर्व दिशा की यात्रा नहीं करना चाहिए यदि यात्रा करना ज्यादा आवश्यक हो तो घर से दर्पण देखकर या दूध पीकर जायें।
🤖 राहुकालः- आज का राहु काल 08:26:00 A.M से 09:39:00 A.M बजे तक
🌞 सूर्योदयः – प्रातः 06:06:00
🌅 सूर्यास्तः – सायं 05:08:00
👸🏻 ब्रह्म मुहूर्त : 05:03 ए एम से 05:57 ए एम
🌆 प्रातः सन्ध्या : 05:30 ए एम से 06:51 ए एम
🌟 अभिजित मुहूर्त : 11:47 ए एम से 12:29 पी एम
✡️ विजय मुहूर्त : 01:53 पी एम से 02:36 पी एम
🐃 गोधूलि मुहूर्त : 05:22 पी एम से 05:49 पी एम
🌌 सायाह्न सन्ध्या : 05:25 पी एम से 06:45 पी एम
💧 अमृत काल : 04:36 पी एम से 06:22 पी एम
🗣️ निशिता मुहूर्त : 11:41 पी एम से 12:35 ए एम, नवम्बर 25
❄️ रवि योग : 06:51 ए एम से 09:53 पी एम
🚓 यात्रा शकुन-मीठा दूध पीकर यात्रा करें।
👉🏼 आज का मंत्र-ॐ सौं सौमाय नम:।
💁🏻 आज का उपाय-शिवजी का दुग्धाभिषेक करें।
🪵 वनस्पति तंत्र उपाय-पलाश के वृक्ष में जल चढ़ाएं।
⚛️ पर्व एवं त्यौहार – रवि योग/ विनायक चतुर्थी/ गुरु तेग बहादुर शहादत दिवस, शहीद दिवस, स्वाधीनता सेनानी सर छोटू राम जयन्ती, हीरा लाल शास्त्री जयन्ती, मोहम्मद शफी कुरैशी जयन्ती, राष्ट्रीय सारडीन दिवस, भारतीय संविधान अपनाने की 75वीं वर्षगांठ स्मरणोत्सव, राजस्थान के मुख्यमंत्री हीरा लाल शास्त्री जन्म दिवस, स्वतंत्रता सेनानी नरसिम्हा रेड्डी जयन्ती, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री मारोतराव कन्नमवार जन्म दिवस, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री मारोतराव कन्नमवार जन्म दिवस, राष्ट्रीय औषधि दिवस, राष्ट्रीय एकता दिवस (सप्ताह)
✍🏼 *तिथि विशेष – चतुर्थी तिथि को मूली एवं पञ्चमी तिथि को बिल्वफल त्याज्य बताया गया है। इस चतुर्थी तिथि में तिल का दान और भक्षण दोनों त्याज्य होता है। इसलिए चतुर्थी तिथि को मूली और तिल एवं पञ्चमी को बिल्वफल नहीं खाना न ही दान करना चाहिए। चतुर्थी तिथि एक खल और हानिप्रद तिथि मानी जाती है। इस चतुर्थी तिथि के स्वामी गणेश जी हैं तथा यह चतुर्थी तिथि रिक्ता नाम से विख्यात मानी जाती है। यह चतुर्थी तिथि शुक्ल पक्ष में अशुभ तथा कृष्ण पक्ष में शुभफलदायिनी मानी गयी है। 🗺️ *_Vastu tips* 🗽
*बांस से बनी अगरबत्ती क्यों मानी जाती है अशुभ? यूं तो बांस का उपयोग शादी, जनेऊ और मंडप बनाने में किया जाता है, लेकिन इससे बनी अगरबत्ती का इस्तेमाल पूजन कार्यों में क्यों वर्जित हैं। शास्त्रों में बांस को जलाना निषेध माना गया है और दाह संस्कार में भी बांस को नहीं जलाया जाता है। वहीं, अगरबत्ती जलाकर ही उपयोग की जाती है। ऐसे में बांस से बनी अगरबत्ती जलाना धार्मिक दृष्टि से अनुचित ठहराया गया है। *अगरबत्ती जलाने के नियम अगर आप पूजा के समय अगरबत्ती जलाते हैं, तो हमेशा दो अगरबत्तियां जलानी चाहिए। इससे घर में सुख-शांति बनी रहती है और देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।
*वहीं, चार अगरबत्तियां जलाना शक्ति का प्रतीक माना जाता है, जो विशेष धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोगी होती हैं। *हमेशा पूरी और सुगंधित अगरबत्ती ही जलानी चाहिए।* *टूटी हुई अगरबत्ती अशुभ मानी जाती है। जलाने के बाद उस पर फूंक नहीं मारनी चाहिए।
🎯 *जीवनोपयोगी कुंजियां* ⚜️
♦️Viral Fever.. मौसमी बुखाऱ ♦️* *आजकल मौसमी बुखार (Viral Fever ) फ़ैल रहा है। जो मौसम बदलने के कारण प्रत्येक वर्ष आता रहता है। इसका प्रभाव 5 से 7 दिन तक रहता है। घबराएँ नही।
*♦️लक्षण♦️*
*खांसी, जुकाम, गला खराब होना, हरारत बुखार पैर खाली खाली लगना, सिर दर्द, बदन दर्द। ♦️घरेलू नुस्खे♦️ *_10 तुलसी के पते +2 लोंग+ 2 इलाइची+ 1 काली मिर्च + 20 mm कच्ची हल्दी का टुकडा + 2 इंच लम्बा दालचीनी का टुकडा इन सभी को पानी में उबाल कर काढ़ा बना लें। फिर गर्म – गर्म दिन में 3 बार पी सकते है। ♦️गिलोय का काढ़ा♦️
*गिलोय की बेल 1 फुट लेकर टुकड़े बना कर कूट ले और एक गिलास पानी में तब तक उबले जब वो आधा न रह जाए और ठंडा होने पर पी ले। या रोज 2 पत्ते धोकर खाएं।
*♦️सावधानी♦️*
अगर आपको हाई बीपी या Piles है तो आप अदरक का सेवन न करें। छीकते समय नाक पर रुमाल रखें। साफ़ सफाई का ध्यान रखें। आराम करें।
🫖 आरोग्य संजीवनी 🍶
छाती में बलगम जमना अक्सर ठंड-खांसी, संक्रमण, या एलर्जी के कारण होता है। नीचे कुछ सुरक्षित और प्रभावी घरेलू उपाय दिए हैं जो बलगम को ढीला कर निकालने में मदद करते हैं:
*✅ 1. भाप लेना गर्म पानी की भाप 5–10 मिनट तक लें। चाहें तो पानी में 1–2 बूंदें अजवाइन/यूक्लिप्टस ऑयल डाल सकते हैं। *👉 इससे बलगम पिघलकर आसानी से बाहर निकलता है।
✅ 2. गरम पानी ज्यादा पिएँ दिन में 6–8 गिलास गरम पानी। गर्म पानी का सेवन बलगम को पतला बनाता है। ✅ 3. अदरक-शहद एक चम्मच अदरक का रस + एक चम्मच शहद दिन में 2 बार
👉 सूजन कम होती है और बलगम ढीला होता है।* ✅ 4. हल्दी वाला दूध रात को गरम दूध में ½ चम्मच हल्दी हल्दी एंटी-इन्फ्लेमेटरी होती है।*
✅ 5. खांसी वाली चाय (काढ़ा)* *तुलसी, अदरक, काली मिर्च, लौंग, दालचीनी
*इसे उबालकर पिएँ। *👉 छाती का जकड़न कम करता है।
*✅ 6. गरम सेंक / गर्म पानी की थैली छाती और पीठ पर 10–15 मिनट तक गर्म सेंक दें। *👉 बलगम को loosen करने में मदद मिलती है।_
📖 *गुरु भक्ति योग* 📖
कथा नर और नारायण
*प्रभु श्री कृष्ण जी को अर्जुन सबसे प्रिय इसलिए थे कि वो नर के अवतार थे और श्री कृष्ण स्वयं नारायण थे।
*आपने नर और नारायण का नाम तो सुना ही होगा। *भारत का शिरोमुकुट हिमालय है, जो समस्त पर्वतों का पति होने से गिरिराज कहलाता है उसी के एक उत्तुंग शिखर के प्रांगण में बद्रिकाश्रम या बदरीवन है। वहाँ पर इन चर्म चक्षुओं से न दीखने वाला बदरी का एक विशाल वृक्ष है, इसी प्रकार का प्रयाग में अक्षयवट है। बदरी वृक्ष में लक्ष्मी का वास है, इसीलिये लक्ष्मीपति को यह दिव्य वृक्ष अत्यन्त प्रिय है। उसकी सुखद शीतल छाया में भगवान् ऋषि मुनियों के साथ सदा तपस्या में निरत रहते हैं। बदरी वृक्ष के कारण ही यह क्षेत्र बदरी क्षेत्र कहलाता है और नर-नारायण का निवास स्थान होने से इसे नर-नारायण या नारायणाश्रम भी कहते हैं।
*सृष्टि के आदि में भगवान् ब्रह्मा ने अपने मन से 10 पुत्र उत्पन्न किये। ये संकल्प से ही अयोनिज उत्पन्न हुए थे, इसलिये ब्रह्मा के मानस पुत्र कहाये। उनके नाम मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष और नारद है। इनके द्वारा ही आगे समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई। इसके अतिरिक्त ब्रह्माजी के दायें स्तन से धर्मदेव उत्पन्न हुए और पृष्ठ भाग से अधर्म। अधर्म का भी वंश बढ़ा उसकी स्त्री का नाम मृषा (झूठ) था, उसके दम्भ और माया नाम के पुत्र हुए। उन दोनों से लोभ और निकृति (शठता) ये उत्पन्न हुए, फिर उन दोनों से क्रोध और हिंसा दो लड़की लडके हुए। क्रोध और हिंसा के कलि और दुरक्ति हुए। उनके भय ओर मृत्यु हुए तथा भय मृत्यु से यातना (दुख) और निरय नरक ये हुए। ये सब अधर्म की सन्तति है। ’’दुर्जनं प्रथम बन्दे सज्जनं तदनन्तरम्’’ इस न्याय से अधर्म की वंशावली के बाद अब धर्म की सन्तति *ब्रह्माजी के पुत्र दक्ष प्रजापति का विवाह मनु पुत्री प्रसूती से हुआ। प्रसूति में दक्ष प्रजापति ने 16 कन्यायें उत्पन्न की। उनमें से 13 का विवाह धर्म के साथ किया। एक कन्या अग्नि को दी, एक पितृगण को, एक भगवान् शिव को। जिनका विवाह धर्म के साथ हुआ उनके नाम – श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि मेधा, तितिक्षा, ही और मूर्ति।
*धर्म की ये सब पत्नियाँ पुत्रवती हुई। सबने एक एक पुत्र रत्न उत्पन्न किया। जैसे श्रद्धा ने शुभ को उत्पन्न किया, मैनी ने प्रसाद को, दया ने अभय को, शान्ति ने सुख को, तुष्टि ने मोद को, पुष्टि ने अहंकार को, क्रिया ने योग को उन्नति ने दर्प को, पुद्धि ने अर्थ को, मेधा ने स्मृति को, तितिक्षा ने क्षेम को, और ही (लल्जा) ने प्रश्रय (विनय) को और सबसे छोटी मूर्ति देवी ने भगवान् नर-नारायण को उत्पन्न किया। क्योंकि मूर्ति में ही भगवान् की उत्पत्ति हो सकती है। वह मूर्ति भी धर्म की ही पत्नी है। *नर-नारायण ने अपनी माता मूर्ति की बहुत अधिक बड़ी श्रद्धा से सेवा की। अपने पुत्रों की सेवा से सन्तुष्ट होकर माता ने पुत्रों से वर माँगने को कहा। पुत्रों ने कहा-’’माँ, यदि आप हम पर प्रसन्न हैं तो वरदान दीजिये कि हमारी रूचि सदा तप में रहे और घरबार छोड़कर हम सदा तप में ही निरत रहें।’’ माता को यह अच्छा कैसे लगता कि मेरे प्राणों से भी प्यारे पुत्र घर-बार छोड़कर सदा के लिये वनवासी बन जायँ, किन्तु वे वचन हार चुकी थी। अतः उन्होंने अपने आँखों के तारे आज्ञाकारी पुत्रों को तप करने की आज्ञा दे दी। दोनों भाई बदरिकाश्रम में जाकर तपस्या में निरत हो गये।
*बदरिकाश्रम में जाकर दोनों भाई घोर तपस्या करने लगें इनकी तपस्या के सम्बन्ध में पुराणों में भिन्न-भिन्न प्रकार की कथायें हैं। *श्रीमद्भागवत में कई स्थानों पर भगवान् नर-नारायण का उल्लेख है। देवी भागवत के चतुर्थ स्कन्द में तो नर-नारायण की बड़ी लम्बी कथा है।
*नर और नारायण भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए केदारखंड में उस स्थान पर तपस्या करने लगे जहां पर आज ब्रदीनाथ धाम है। *इनकी तपस्या से इंद्र परेशान होने लगे। इंद्र को लगने लगा कि नर और नारायण इंद्रलोक पर अधिकार न कर लें। इसलिए इंद्र ने अप्सराओं को नर और नारायण के पास तपस्या भंग करने के लिए भेजा।
*उन्होंने जाकर भगवान नर-नारायण को अपनी नाना प्रकार की कलाओं के द्वारा तपस्या भंग करने का प्रयास किया, किंतु उनके ऊपर कामदेव तथा उसके सहयोगियों का कोई प्रभाव न पड़ा। कामदेव, वसंत तथा अप्सराएं शाप के भय से थर-थर कांपने लगे। उनकी यह दशा देखकर भगवान नर और नारायण ने कहा, ‘तुम लोग मत डरो। हम प्रेम और प्रसन्नता से तुम लोगों का स्वागत करते हैं।’ *भगवान नर और नारायण की अभय देने वाली वाणी को सुनकर काम अपने सहयोगियों के साथ अत्यन्त लज्जित हुआ। उसने उनकी स्तुति करते हुए कहा- प्रभो! आप निर्विकार परम तत्व हैं। बड़े बड़े आत्मज्ञानी पुरुष आपके चरण. कमलों की सेवा के प्रभाव से कामविजयी हो जाते हैं। हमारे ऊपर आप अपनी कृपादृष्टि सदैव बनाए रखें। हमारी आपसे यही प्रार्थना है। आप देवाधिदे विष्णु हैं।
*कामदेव की स्तुति सुनकर भगवान नर नारायण प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी योगमाया के द्वारा एक अद्भुत लीला दिखाई। सभी लोगों ने देखा कि 16000 सुंदर-सुंदर नारियां नर और नारायण की सेवा कर रही हैं। फिर नारायण ने इंद्र की अप्सराओं से भी सुंदर अप्सरा को अपनी जंघा से उत्पन्न कर दिया। उर्व से उत्पन्न होने के कारण इस अप्सरा का नाम उर्वशी रखा। नारायण ने इस अप्सरा को इंद्र को भेंट कर दिया। उन 16000 कन्याओं ने नारायण से विवाह की इच्छा जाहिर की,तब नारायण ने उन्हें कहा कि द्वापर में मेरा कृष्ण अवतार होगा।तब तक प्रतीक्षा करने को कहा *उनकी आज्ञा मानकर कामदेव ने अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ अप्सरा उर्वशी को लेकर स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया। उसने देवसभा में जाकर भगवान नर और नारायण की अतुलित महिमा के बारे में सबसे कहा, जिसे सुनकर देवराज इंद्र को काफी पश्चाताप हुआ।
केदार और बदरीवन में नर-नारायण नाम ने घोर तपस्या की थी। इसलिए यह स्थान मूलत: इन दो ऋषियों का स्थान है। दोनों ने केदारनाथ में शिवलिंग और बदरीकाश्रम में विष्णु के विग्रहरूप की स्थापना की थी। *केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति*
*भगवान शिव की प्रार्थना करते हुए दोनों कहते हैं कि हे शिव आप हमारी पूजा ग्रहण करें। *नर और नारायण के पूजा आग्रह पर भगवान शिव स्वयं उस पार्थिव लिंग में आते हैं। इस तरह पार्थिव लिंग के पूजन में वक्त गुजरता जाता है। एक दिन भगवान शिव खुश होते हैं और नर व नारायण के सामने प्रकट होकर कहते हैं कि वो उनकी अराधना से बेहद खुश हैं इसलिए वर मांगो।
*नर और नारायण कहते हैं, हे प्रभु अगर आप प्रसन्न हैं तो लोक कल्याण के लिए कुछ कीजिए। भगवान शिव कहते हैं कि कहो क्या कहना चाहते हो। इस पर नर और नारायण कहते हैं कि जिस पार्थिव लिंग में हमने आपकी पूजा की है उस लिंग में आप स्वयं निवास कीजिए ताकि आपके दर्शन मात्र से लोगों का कष्ट दूर हो जाए। *दोनों भाइयों के अनुरोध से भगवान शिव और प्रसन्न हो जाते हैं और केदारनाथ के इस तीर्थ में केदारेश्वर ज्योतिलिंग के रुप में निवास करने लगते हैं। इस तरह केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति होती है।
*महाभारत के अनुसार पाप से मुक्त होने के बाद केदारेश्वर में स्थित ज्योतिर्लिंग के आसपास मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपने हाथ से किया था। बाद में इसका दोबारा निर्माण आदि शंकराचार्य ने करवाया था। इसके बाद राजा भोज ने यहां पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। *यही नर और नारायण द्वापर में अर्जुन और कृष्ण के रूप में अवतरित हुए थे।
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⚜️ चतुर्थी तिथि में तिल का दान और भक्षण दोनों भी त्याज्य है। आज गणपति, गजानन, विघ्नहर्ता श्री गणेशजी की पूजा का विशेष महत्त्व है। आज गणपति की पूजा के उपरान्त मोदक, बेशन के लड्डू एवं विशेष रूप से दूर्वादल का भोग लगाना चाहिये इससे मनोकामना की सिद्धि तत्काल होती है। शास्त्रानुसार जिस व्यक्ति का जन्म चतुर्थी तिथि को होता है वह व्यक्ति बहुत ही भाग्यशाली होता है। चतुर्थी तिथि में जन्म लेने वाला व्यक्ति बुद्धिमान एवं अच्छे संस्कारों वाला होता है। ऐसे लोग अपने मित्रों के प्रति प्रेम भाव रखते हैं तथा इनकी सन्तानें अच्छी होती है। इन्हें धन की कमी का सामना नहीं करना पड़ता है और ये सांसारिक सुखों का पूर्ण उपभोग करते हैं।



