पर्यावरणमध्य प्रदेश

प्रदूषण की वजह से ग्रीन पटाखों की बढ़ी मांग, दशहरा मैदान में लगेंगी आतिशबाजी की दुकानें

जिले में 2 करोड़ से अधिक का व्यापार, इस बार 40 प्रतिशत महंगी हुई आतिशबाजी, महंगाई बढ़ने के ये भी कारण…..
रिपोर्टर : शिबलाल यादव
रायसेन।
आतिशबाजी निर्माण और विक्रय के व्यवसाय में लगे पप्पू सिंह मुरली छुग्गानी लखन चक्रवर्ती  आतिशबाज ने बताया कि पटाखे महंगे होने की नई-नई वजह जुड़ती जा रही हैं। सबसे पहले तो पटाखा बनने में जो सामग्री लगती है, वह आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रही है। रद्दी काफी महंगी हो गई है। पटाखे के अंदर जो रोगन मसाला भरा जाता है वह मुंबई, दिल्ली, आगरा से आता है। यहां तक पहुंचने में कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में मसाला भी बहुत महंगा हो गया है।
रायसेन। दो साल कोरोना ने त्योहारों को काफी फीका बना दिया था। लेकिन अब फिर से त्योहारों की रंगत लौट आई है। यही कारण है कि इस बार रायसेन जिले में  दिवाली पर 2 करोड़ से अधिक की आतिशबाजी विक्रय होने की उम्मीद है। अभी तक की स्थिति में रायसेन शहर सहित जिले की अलग-अलग तहसीलों से ऑनलाइन कुल 462 आवेदन आ चुके हैं। जिन्हें लाइसेंस देने की प्रक्रिया जारी है। जिला मुख्यालय पर आतिशबाजी की दुकानें दशहरा मैदान में लगाई जाएंगी जिसके लिए राजस्व वसूलने राजस्व विभाग तैयारी कर रहा है।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक, पिछले साल नगर पालिका ने दशहरा मैदान में करीब 95 से ज्यादा दुकानें आतिशबाजी विक्रताओं को आवंटित की थी। खास बात यह है कि सुरक्षा की दृष्टि से जिला बप्रशासन ने आतिशबाजी के कारोबार पर काफी सख्ती बढ़ा दी है। जिसका असर आतिशबाजी की कीमतों पर पडऩे लगा है। इस व्यवसाय में लंबे समय से काम कर रहे आतिशबाज के मुताबिक वैसे तो हर साल आतिशबाजी की रेट में इजाफा होता है। लेकिन पिछले दो सालों में काफी ज्यादा बदलाव आया है। पिछले साल की तुलना में इस बार आतिशबाजी 40 प्रतिशत महंगी हो गई है। यानी कि जो पटाखा बीते साल 50 रुपए का था वह इस बार 70 से 80 रुपए का मिल रहा है। इसके अलावा अन्य आइटमों की रेट भी बढ़ी है। इसके बावजूद लोग आतिशबाजी खरीदने में कोई कंजूसी नहीं करते। क्योंकि खुशी और उल्लास का यह दिवाली का त्योहार साल में एक बार आता है। जिसे सभी पूरी मन से मनाना चाहता हैं।
मृगांचल एक्सप्रेस टीम के पड़ताल में सामने आया है कि स्थानीय स्तर पर आतिशबाजी निर्माण करने वालों की संख्या लगातार घटती जा रही है। इस व्यवसाय से जुड़े व्यापारियों ने बताया कि वर्तमान में सांचेत में जो आतिशबाजी निर्माण का काम कर रहे हैं।वह वर्षों पुराने हैं। कुछ का निधन हो चुका है। नया व्यक्ति इस काम को नहीं सीखना चाहता। इसलिए आतिशबाजी बनाने वालों की संख्या कम हो रही है। आतिशबाजी के शौकीन लोग ज्यादातर ऐसे पटाखों पसंद करते हैं, जिसकी आवाज बहुत तेज हो। इसी को ध्यान में रखते हुए आतिशबाजी बनाने वाले करीगर पटाखों तैयार करते हैं। रवि ठाकुर विक्रम ठाकुर आतिशबाज के मुताबिक इस बार मार्केट में सबसे तेज धमाका करने वाला पटाखा मुर्गा छाप सुतली बम है इसकी कीमत 20 रुपए है इसके अलावा छोटे बच्चों को ध्यान में रखकर भी कम आवाज वाली आतिशबाजी तैयार की गई है।
कंपनियों ने भी ग्रीन पटाखों की सप्लाई बढ़ा दी….
50 सालों से आतिशबाजी विक्रय का काम करने वाले  आतिशबाज नन्नू नामदेव का कहना है कि अभी तक जो परंपरागत आतिशबाजी आती थी उससे वायु और ध्वनि प्रदूषण ज्यादा   होता है। जिसे लेकर अब शासन प्रशासन सहित आम जनता भी सचेत हो गई है। जिसकी वजह से ग्रीन पटाखों की मांग और निर्माण दोनों ही बढ़े हैं। गुना जिले में कुल आतिशबाजी में ग्रीन पटाखों की मात्रा 20 प्रतिशत बढ़ी है। यह ग्रीन पटाखे 30 प्रतिशत तक प्रदूषण को कम करते हैं। इसकी वजह से पटाखा बनाने वाली कंपनियों ने भी अब ग्रीन पटाखों की सप्लाई बढ़ा दी है। इन ग्रीन पटाखों के पैकेट पर लोगो और क्यूआर कोड दिया गया है।ताकि लोग इनकी असलियत का भी पता लगा सकें। वहीं आतिशबाजी निर्माण और विक्रय में एक और तब्दील हुई है। जिसके अनुसार अब देवी-देवताओं के चित्र वाले पटाखे या आतिशबाजी बाजार में आना बंद हो गई है।
इस संबंध में आदित्य रिछारिया, एडीएम रायसेन का कहना है कि लाइसेंस जारी करने की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन है। अब तक अलग-अलग तहसीलों से जो आवेदन आए हैं। उनकी कुल संख्या 462 हो चुकी है। लाइसेंस देने की कार्रवाई एसडीएम स्तर से पूरी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद की जा रही है।

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