मध्य प्रदेश

​टीईटी अनिवार्यता पर शिक्षक संघ सख्त : 2010 से पहले नियुक्त शिक्षकों के लिए नियम को बताया ‘प्राकृतिक न्याय’ के खिलाफ, देशव्यापी आंदोलन का ऐलान

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद असमंजस में 20 लाख शिक्षक; 18 जून को मध्य प्रदेश के सभी जिलों में कलेक्टर के माध्यम से पीएम मोदी और शिक्षा मंत्री को सौंपा जाएगा ज्ञापन
​भोपाल। मध्यप्रदेश शिक्षक संघ ने कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) अनिवार्य किए जाने के मुद्दे पर सख्त रुख अपना लिया है। शिक्षक संघ ने साफ कहा है कि वर्ष 2010 से पहले नियुक्त हो चुके शिक्षकों पर बाद में बनाए गए नियमों को थोपना न केवल पूरी तरह से अव्यावहारिक है, बल्कि यह प्राकृतिक न्याय और कानूनी निश्चितता के सिद्धांतों के भी पूर्णतः विपरीत है। ​शिक्षक संघ के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. क्षत्रवीर सिंह राठौर और प्रदेश महामंत्री राकेश गुप्ता ने संयुक्त रूप से बताया कि बीती 29 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाए गए एक निर्णय के बाद न सिर्फ मध्यप्रदेश, बल्कि पूरे देश के लाखों शिक्षकों के बीच असमंजस और चिंता की स्थिति निर्मित हो गई है। सर्वोच्च न्यायालय के इस हालिया फैसले के अनुसार, अब कक्षा 1 से 8 तक अध्यापन कार्य कराने वाले सभी शिक्षकों के लिए टीईटी उत्तीर्ण करना अनिवार्य माना गया है, जिससे सालों से सेवा दे रहे वरिष्ठ शिक्षकों के सामने नया संकट खड़ा हो गया है।
​15-20 साल से कार्यरत शिक्षकों के भविष्य पर मंडराया संकट
​संघ के पदाधिकारियों के अनुसार, 23 अगस्त 2010 को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा टीईटी को शिक्षकों के लिए न्यूनतम अर्हता घोषित किया गया था। इस अधिसूचना के जारी होने से पहले देश के विभिन्न राज्यों में लाखों शिक्षकों की नियुक्तियां उस समय लागू वैध नियमों और स्थापित चयन प्रक्रियाओं के तहत पूरी पारदर्शिता से हुई थीं। ये शिक्षक पिछले 15 से 20 सालों से लगातार शिक्षा के क्षेत्र में अपनी अमूल्य सेवाएं दे रहे हैं और सामाजिक चेतना तथा राष्ट्र निर्माण में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं। ऐसे में अब नए मानदंडों को पूर्व प्रभावी रूप से लागू करना उनके सेवाकाल, वरिष्ठता और भविष्य दोनों पर गंभीर प्रतिकूल असर डालेगा।
​18 जून को पूरे प्रदेश में बड़ा आंदोलन
​इस निर्णय और नए मानदंडों के विरोध में मध्य प्रदेश शिक्षक संघ ने आगामी 18 जून 2026 को पूरे प्रदेश में एक बड़े आंदोलन का निर्णय लिया है। इसके तहत राज्य के सभी जिलों में जिला कलेक्टर के माध्यम से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के नाम एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा जाएगा, जिसमें शिक्षकों की मांगों को प्रमुखता से उठाते हुए तत्काल हस्तक्षेप की मांग की जाएगी।
​संसद से समाधान की मांग: विधायी संशोधन ही एकमात्र रास्ता
​शिक्षक संघ ने केंद्र सरकार से पुरजोर मांग की है कि वर्ष 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों की सेवाओं को पूरी तरह वैध मानते हुए आगामी मानसून सत्र में आवश्यक विधायी संशोधन लाया जाए। साथ ही, 23 अगस्त 2010 की एनसीटीई की अधिसूचना में जरूरी संशोधन कर सुप्रीम कोर्ट को भी इससे अवगत कराया जाए, ताकि देश के लाखों शिक्षकों का भविष्य सुरक्षित किया जा सके। संघ ने स्पष्ट किया कि वे न्यायालय के फैसले का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन व्यापक जनहित में नीति-निर्माण का सर्वोच्च अधिकार विधायिका के पास सुरक्षित है, और सरकार को इस दिशा में अविलंब कदम उठाना चाहिए।
​देशभर के 20 लाख शिक्षक प्रभावित
​शिक्षक संघ का दावा है कि इस नए नियम के दायरे में आने से केवल मध्य प्रदेश के ही करीब डेढ़ लाख (1.5 लाख) शिक्षक प्रभावित नहीं हो रहे हैं, बल्कि पूरे देश भर में 20 लाख से अधिक शिक्षकों के करियर पर तलवार लटक गई है। यही कारण है कि यह मुद्दा अब किसी एक राज्य का स्थानीय मामला न रहकर पूरी तरह से एक राष्ट्रीय स्तर का संवेदनशील मुद्दा बन चुका है, जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।

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