शिव ने विष का पान समस्त सृष्टि को बचाने हेतु किया इसीलिए वह महादेव कहलाते है : ब्रह्मचारी जी

सिलवानी । पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। समस्त मानव जाति, प्रकृति की सेवा ही हमारा उद्देश्य हो, जब मनुष्य अपने संयुक्त परिवार का हित करता है तो उसका स्वभाव हित करने हेतु विस्तृत होता जाता है, इससे बढ़ते बढ़ते जब मानव स्वभाव सम्पूर्ण जीवों के हित हेतु तत्पर हो जाए तो हमारे जीवन में कभी दुःख नहीं आ सकता एवम धनधान्य स्वतः ही आते रहते हैं। अगर समाज की भलाई करते हुए अपवाद स्वरूप कोई कलंक भी लग जाए तो वह कलंक भी आभूषण बन जाता है।
उक्त उदगार बुधवार को बम्होरी (वर्धा) में श्री विष्णु पुराण कथा में पूज्य ब्रह्मचारी जी महाराज ने व्यक्त किए। कथा प्रारंभ के पूर्व ग्राम में कलश यात्रा निकाली गई। कलश यात्रा में कथाव्यास ब्रह्मचारी जी रथ पर सवार थे एवम रामकांत शुक्ला अपने सिर पर पुराण धारण किए हुए थे।
कलश यात्रा के बाद कथाव्यास जी ने पुराण महिमा बताई। कथा सुनाते हुए समुद्र मंथन कथा कहते हुए शिव जी द्वारा हलाहल पान की कथा में बताया कि शिव ने विष का पान समस्त सृष्टि को बचाने हेतु किया इसीलिए वह महादेव कहलाते हैं।

