सरस्वती विद्या मंदिर में बिरसा मुंडा जयंती एवं स्वर्ण प्राशन संस्कार का किया गया आयोजन
ब्यूरो चीफ : शब्बीर अहमद
बेगमगंज । सरस्वती विद्या मंदिर में बिरसा मुंडा जयंती मनाई गई जिसमें सर्वप्रथम भगवान बिरसा मुंडा के चित्र पर तिलक लगाकर पूजा अर्चना की गई तत्पश्चात, विद्यालय की दीदी रेखा शिल्पकार ने भैयाओ को जानकारी देते हुए कहा कि बिरसा मुंडा की जयंती को पूरे देश में केंद्र सरकार जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मना रही है. 15 नवंबर को बिरसा मुंडा की जयंती के साथ झारखंड राज्य का स्थापना दिवस भी मनाया जाता है. इस मौके पर भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू रांची से 70 किलोमीटर दूर उस गांव में पहुंचने वाली हैं, जहां बिरसा मुंडा का जन्म हुआ था।
आदिवासी नेता बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को रांची, झारखंड में हुआ और इनकी मृत्यु 9 जून 1900 में रांची की सेंट्रल जेल में हुई। इस समय भारत में ईसाई धर्म का बहुत ज्यादा बोलबाला था जिसके कारण उनके चाचा दादा समेत उनके ज्यादातर परिवार वालों ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया और उनके पिताजी जर्मन धर्म के समर्थक थे। बिरसा भी स्कूल में जाता तो उनके ईसाई पादरी शिक्षक उनके धर्म का मजाक उड़ाते हैं जिसके कारण बिरसा मुंडा ने भी उनके ईसाई धर्म का मजाक उड़ाया और उनकी इस बात के चलते उन्हें विद्यालय से निकाल दिया गया।
1885 के लगभग आदिवासी लोग बिरसा मुंडा को भगवान मानने लगे उनके बारे में किवदंती थी की वो भगवान है उनको हिंदू धर्म का और महाभारत का ज्ञान स्वामी आनंद पांडेय से हुआ।
मुंडा ने अंग्रेजो के द्वारा चलाए जा रहे पाखंडो का खंडन किया और अहिंसा के साथ शराब आदि नशीली चीजों का सेवन न करने की सलाह दी। जिसके बाद जितने भी मुंडा (आदिवासी हिंदू) ईसाई बने वह वापस अपने धर्म में आने लगे।
साथ ही साथ में स्वर्ण प्राशन संस्कार का आयोजन किया गया जिसमें 1 माह से 12 वर्ष तक के बच्चे इस औषधि का सेवन कर सकते हैं, इस स्वर्ण प्राशन से बालक की भिन्न भिन्न रोगों से रक्षा होती है एवं स्मरण शक्ति बढ़ती है। इस स्वर्ण प्राशन का पुष्प नक्षत्र में, इस औषधि का सेवन करना महत्वपूर्ण बताया गया है।
स्वर्ण प्राशन संस्कार स्वर्ण (गोल्ड) के साथ शहद, ब्रह्माणी, अश्वगंधा, गिलोय, शंखपुष्पी, वचा आदि जड़ी बुटियों से निर्मित एक रसायन है। जिसका सेवन पुष्य नक्षत्र के दौरान किया जाता है। स्वर्णप्राशन संस्कार से बच्चों की शारीरिक एवं मानसिक गति में अच्छा सुधार होता है। यह बहुत ही प्रभावशाली और इम्युनिटी बूस्टर होता है, जो बच्चों में रोगों से लड़ने की क्षमता पैदा करता है।
स्वर्ण प्राशन संस्कार से विभिन्न रोगों से लड़ने की क्षमता बच्चों में पैदा होती है। आयुर्वेद के क्षेत्र से जुड़े हमारे ऋषि मुनियों एवं आचार्यों ने हजारों वर्षों पूर्व वायरस और बैक्टीरिया जनित बीमारियों से लड़ने के लिए एक ऐसा रसायन का निर्माण किया जिसे स्वर्णप्राशन कहा जाता है।
मंत्रौषधि स्वर्णप्राशन का नियमित सेवन खाली पेट करना चाहिए । यदि कुछ खाया है तो 15 मिनट बाद सेवन करें।
इस अवसर पर अभिभावक राजेश कुशवाहा, विद्यालय के प्राचार्य प्रकाश शर्मा, आचार्य राजेन्द्र शर्मा, अंकित कौरव,दीदी रेखा शिल्पकार, पूजा जैन उपस्थित रहीं एवं समस्त विद्यालय परिवार उपस्थित रहे।
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