सकारात्मक सोच से व्यक्ति सफलता के सोपान प्राप्त कर जीवन भर उत्तरोत्तर बृद्वि कर सकता है : पं. धन सिंह ज्ञायक
मंगलाचरण को समझने वाला जीव धन्य हो जाता है
सिलवानी । महान अध्यात्मिक संत श्रीतारण तरण मंडलाचार्य महाराज शून्य स्वभाव के माध्यम से यह सिद्ध कर रहे है कि आत्मा में अनंत गुण है। द्रव्य गुण पर्याय शुद्व है। जबकि मंगलाचरण को समझने वाला जीव धन्य हो जाता है।
यह उद्गार पिडावा (राजस्थान) से आए जैन धर्म के प्रकाण्ड विद्वान पंडित धनसिंह ज्ञायक ने व्यक्त किए । वह नगर के तारण तरण जैन चैत्यालय में शनिवार को सुबह के समय महान अध्यात्मिक संत, श्रीमद जिन तारण तरण मंडलाचार्य महाराज द्वारा विरचित न्यान समुच्चय सार ग्रंथ पर समाजजनो को सहज व सरल भाषा में उपदेष दे रहे थे । प्रवचन सुनने बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद रहे।
उन्होने व्यक्ति को जीवन में सफलता के सोपान तय किए जाने को लेकर 4 सूत्र का उल्लेख करते हुए बताया कि यदि व्यक्ति को सफलता के कीर्तिमान स्थापित करना है तो उसे भूख प्यास लगनी चाहिए। सोच सकारात्मक होनी चाहिए। अथक प्रयास करना चाहिए व असीम ध्येय रखना चाहिए। जिस व्यक्ति में यह 4 गुण विद्मान है तो उसे सफलता के षिखर पर पहुचने से कोई भी ताकत नही रोक सकता हैं । शून्य स्वभाव पर भाव से रहित है। पर से, विकार से, विभाव से रहित है। इसी कारण शून्य स्वभाव है।
पंडित श्री ज्ञायक ने बताया कि द्रव्य का अवलोकन होता है वेदन नही। वंदन पर्याय का होता है अवलंबन नही। उन्होने बताया कि दाने दाने पर लिखा है खाने वालेे का नाम। बूंद बूंद पानी पर लिखा है पीने वाले का नाम। ज्ञान पर लिखा है ज्ञायक का नाम। यह ज्ञान का पर्याय है। पर्याय मेरा ध्यान करे तो करे, में किसका करुं। उपयोग का उपयोग वान में ध्यान केंद्रित हो जाना ज्ञान है।
उन्होने लंकापति रावण के नरक जाने की की चर्चा करते हुए बताया कि वह माता सीता का हरण करने के कारण नरक नही गया था बल्कि अहंकार के कारण उसे नरक जाना पड़ा था। जबकि रावण ने संकल्प लिया था कि पर स़्त्री को उसकी सहमति बगैर छुएगा भी नही। इस संकल्प का उसने जीवन के अंतिम क्षण तक पालन किया । जबकि माता सीता अशोक वाटिका में थी। लेकिन रावण की तरफ सीता ने सिंर उठा कर भी नही देखा था। प्रवचन सुनने बड़ी संख्या में समाजजन पहुंच रहे हैं।


