दूसरों की भलाई करते रहने का भाव जागृत करो : ब्रह्मचारीजी महाराज
रिपोर्टर : राजकुमार रघुवंशी
सिलवानी । मनुष्य को चाहिए कि वह सदैव दूसरों की भलाई करता रहे और, यदि यह भाव मन में जागृत हो जाएगा कि मुझे सदैव दूसरे के लिए ही कार्य करना है। तो व्यक्ति राग मुक्त हो जाएगा ।
उक्त उदगार नगर के समीप के ग्राम नीगरी में उत्तमसिंह रघुवंशी शिक्षक के द्वारा आयोजित श्रीमद् भागवत महापुराण कथा के पंचम दिवस कथा व्यास पूज्य ब्रह्मचारी जी महाराज ने श्रोताओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि प्रायः लोगों की भावना होती है कि सांसारिक वस्तु मुझे मिल जाए अथवा जो मेरा कोई व्यक्ति है उसे प्राप्त हो जाए, तो जब तक हम यह भावना रखते हैं, कि हमें मिल जाए या हमारे लोगों को मिल जाए । तब तक व्यक्ति का आत्म जागरण नहीं हो पाता है। क्योंकि यह संसार हमारा नहीं है। संसार शरीर का है, क्योंकि शरीर संसार से बना है । हम लोग शुद्ध,बुद्ध, चैतन्य परमात्मा के अंश हैं । हमारा कर्तव्य है कि हम परमात्मा को प्राप्त करने का प्रयत्न करते रहें। यह संसार मोह से भरा हुआ है और वही दुख का कारण है ।इसीलिए तो संसार के बिना शरीर नहीं रह सकता। आगे ब्रह्मचारी जी महाराज ने कहा कि जीवन का सत्य मृत्यु है, कालचक्र के प्रभाव में समस्त प्राणी समाहित हैं । इस ब्रह्मांड की जो धुरी है वह परम चैतन्य परमात्मा है। उस ब्रह्मांड की धुरी के सानिध्य में जो लोग अपना जीवन यापन करते हैं। कालचक्र का प्रभाव उनके ऊपर नहीं होता है, व्यक्ति को चाहिए कि वह बहुत पवित्र भाव से संसार में अपना जीवन यापन करता रहे और किसी तरह का मोह, राग, द्वैष मन में उत्पन्न ना होने दे। उन्होंने उदाहरण दिया कि जब मछली पकड़ने वाला व्यक्ति जलाशय में मछली पकड़ने के लिए जाल छोड़ता है, तो उसके जाल में वही मछली फंसती है, जो जाल की सीमा में होती है। जबकि मछुआरे के पैरों के समीप में जो मछली होती है, वह बिल्कुल भी नहीं फंस सकती है। इसी प्रकार हमें चाहिए कि संसार के मोह रूपी जाल में हम ना फंसे । संसार में सर्वत्र मोह व्याप्त हो रहा है। उस मोह से हटके हम परमात्मा की शरण का आश्रय लें, तो हमारे जीवन का उद्धार हो जाएगा। व्यक्ति को चाहिए कि अपने जीवन काल में अपनी मुक्ति के प्रयास को, शरीर जब तक स्वस्थ्य है, पूर्ण कर ले। ब्रह्मचारी जी महाराज ने कहा कि जो श्रीमद्भागवत महापुराण है, वह आत्म चेतना को जागृत करने का एक प्रभावी माध्यम है। इसकी सन्निधि में व्यक्ति को चाहिए कि वह आत्म जागरण के कार्य को परिपूर्ण कर ले।




