आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला मुख्यालय हरियाणा मो. 9812224501
✦••• जय श्री हरि •••✦
🧾 आज का पंचांग 🧾
रविवार 11 अगस्त 2024
11 अगस्त 2024 दिन रविवार को ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि है। आज मानस रचयिता भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त गोस्वामी तुलसीदास जी की जन्म जयन्ती है। आज जैन लोगे के देवता श्रीपार्श्वनाथजी का निर्वाण दिवस है इसलिए जैन लोग आज की सप्तमी को मुकुट सप्तमी के रूप में मनाते हैं। आज की सप्तमी को भानु सप्तमी भी कहा जाता है। आज भगवान श्रीसूर्य नारायण की पूजा उपासना से सूर्यग्रहण में किये गए स्नान-दानादि के समान फल प्राप्त होता है। आज शीतला सप्तमी भी है। आज माता शीतला देवी की पूजा प्रत्येक घरों में बड़ी ही श्रद्धा भाव से किया जाता है। आप सभी सनातनियों को “तुलसी जयन्ती एवं शीतला सप्तमी के महापावन व्रत” की हार्दिक शुभकामनायें।।
भगवान सूर्य जी का मंत्र : ऊँ घृणि सूर्याय नम: ।।
🌠 रविवार को की गई सूर्य पूजा से व्यक्ति को घर-परिवार और समाज में मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। रविवार के दिन उगते हुए सूर्य को देव को एक ताबें के लोटे में जल, चावल, लाल फूल और रोली डालकर अर्ध्य करें।
इस दिन आदित्य ह्रदय स्रोत्र का पाठ करें एवं यथा संभव मीठा भोजन करें। सूर्य को आत्मा का कारक माना गया है, सूर्य देव को जल देने से पितृ कृपा भी मिलती है।
रविवार के दिन भैरव जी के दर्शन, आराधना से समस्त भय और संकट दूर होते है, साहस एवं बल की प्राप्ति होती है। रविवार के दिन जी के दर्शन अवश्य करें ।
रविवार के दिन भैरव जी के मन्त्र ” ॐ काल भैरवाय नमः “ या ” ॐ श्री भैरवाय नमः “ की एक माला जाप करने से समस्त संकट, भय दूर होते है, रोगो, अकाल मृत्यु से बचाव होता है, मनवांछित लाभ मिलता है।
🌐 शुभ हिन्दू नववर्ष 2024 संवत्सर क्रोधी
📖 संवत्सर (उत्तर) कालयुक्त
🧾 विक्रम संवत 2081 विक्रम संवत
🔮 गुजराती संवत 2080 विक्रम संवत
☸️ शक संवत 1946 शक संवत
☪️ कलि संवत 5125 कलि संवत
🕉️ शिवराज शक 351_
☣️ आयन – दक्षिणायन
☀️ ऋतु – सौर वर्षा ऋतु
🌤️ मास – श्रावण मास
🌓 पक्ष – शुक्ल पक्ष
📆 तिथि – रविवार श्रावण माह के शुक्ल पक्ष सप्तमी पूर्ण रात्रि तक
📝 तिथि स्वामी : सप्तमी तिथि के देवता हैं चित्रभानु। सप्तमी तिथि को चित्रभानु नाम वाले भगवान सूर्यनारायण का पूजन करने से सभी प्रकार से रक्षा होती है।
💫 नक्षत्र – चित्रा – 05:49 ए एम तक
🪐 नक्षत्र स्वामी – स्वाति नक्षत्र का स्वामी राहु यानि अधंकार है। नक्षत्र पर ज्ञान और कला की देवी सरस्वती का प्रभाव होता है।
⚜️ योग – शुभ योग 03:48 PM तक, उसके बाद शुक्ल योग
⚡ प्रथम करण : गर – 06:53 पी एम तक
✨ द्वितीय करण : वणिज – पूर्ण रात्रि तक
🔥 गुलिक काल : रविवार को शुभ गुलिक काल 02:53 पी एम से 04:17 पी एम
🤖 राहुकाल (अशुभ) – सायं 16:34 बजे से 17:56 बजे तक। राहु काल में शुभ कार्य करना वर्जित माना गया है।
⚜️ दिशाशूल – रविवार को पश्चिम दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिये, यदि अत्यावश्यक हो तो पान एवं घी खाकर यात्रा कर सकते है।
🌞 सूर्योदयः- प्रातः 05:30:00
🌅 सूर्यास्तः- सायं 06:30:00
👸🏻 ब्रह्म मुहूर्त : 04:22 ए एम से 05:05 ए एम
🌇 प्रातः सन्ध्या : 04:44 ए एम से 05:48 ए एम
🌟 अभिजित मुहूर्त : 12:00 पी एम से 12:53 पी एम
✡️ विजय मुहूर्त : 02:39 पी एम से 03:32 पी एम
🐃 गोधूलि मुहूर्त : 07:04 पी एम से 07:25 पी एम
🏙️ सायाह्न सन्ध्या : 07:04 पी एम से 08:08 पी एम
💧 अमृत काल : 10:45 पी एम से 12:32 ए एम, अगस्त 12
🗣️ निशिता मुहूर्त : 12:05 ए एम, अगस्त 12 से 12:48 ए एम, अगस्त 12.
🌸 द्विपुष्कर योग : 05:48 ए एम से 05:49 ए एम
❄️ रवि योग : 05:48 ए एम से 05:49 ए एम
🚓 यात्रा शकुन-इलायची खाकर यात्रा प्रारंभ करें।
👉🏽 आज का मंत्र-ॐ घृणि: सूर्याय नम:।
🤷🏻 आज का उपाय-विष्णु मंदिर में बेसन से बनी मिठाई चढ़ाएं।
🪵 वनस्पति तंत्र उपाय-बेल के वृक्ष में जल चढ़ाएं।
⚛️ पर्व एवं त्यौहार – भानु सप्तमी/ शीतला सप्तमी/ गोस्वामी श्री तुलसीदास जयंती/बुधास्त पश्चिमे/ भारतीय स्वतंत्रता सेनानी अमर बलिदानी खुदीराम बोस शहीद दिवस, पर्वत दिवस, रेत में खेलने का दिवस, इंगरसोल दिवस, राष्ट्रीय बेकवेल टार्ट दिवस, राष्ट्रीय राष्ट्रपति मजाक दिवस, राष्ट्रीय पुत्र एवं पुत्री दिवस, राष्ट्रीय रास्पबेरी बॉम्ब दिवस, भारतीय रिज़र्व बैंक गवर्नर डी. सुब्बाराव जन्म दिवस
✍🏼 विशेष – सप्तमी तिथि को आँवला त्याज्य बताया गया है। सप्तमी तिथि मित्रप्रद तिथि मानी जाती है। इतना ही नहीं यह सप्तमी तिथि एक शुभ तिथि भी मानी जाती है। इस सप्तमी तिथि के स्वामी भगवान सूर्य देवता हैं। यह सप्तमी तिथि भद्रा नाम से विख्यात मानी जाती है। यह सप्तमी तिथि कृष्ण पक्ष में मध्यम फलदायीनी मानी जाती है। इस सप्तमी तिथि को सुबह सर्वप्रथम स्नान करके भगवान सूर्य को सूर्यार्घ देकर उनका पूजन करना चाहिये। उसके बाद आदित्यह्रदयस्तोत्रम् का पाठ करना चाहिये। इससे जीवन में सुख, समृद्धि, हर्ष, उल्लास एवं पारिवारिक सुखों कि सतत वृद्धि होती है। सप्तमी तिथि में भगवान सूर्य की पुजा करने से सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
🪴 Vastu tips ☘️
मनी प्लांट को खरीदना या उपहार में लेना शुभ मनी प्लांट को खरीदना या उपहार में लेना वास्तु में सही माना गया है। इससे आपके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि आती है। इसलिए अगर आपको अगली बार कोई ये कहे कि मनी प्लांट जब आप चोरी करेंगे लगाएंगे तभी शुभ परिणाम देगा तो आपको, चोरी करने की गलती नहीं करनी चाहिए।
किस दिशा में रखना चाहिए मनी प्लांट वास्तु शास्त्र में हर दिशा का अपना अलग महत्व बताया गया है। मनी प्लांट को रखने के लिए भी घर में एक निश्चित स्थान आपको बनाना चाहिए। इस पौधे को आप उत्तर या पूर्व दिशा में स्थापित करके शुभ परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। सही दिशा में मनी प्लांट को लगाने से आपके घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
🔑 जीवनोपयोगी कुंजियां ⚜️
मच्छ मणि कोई साधारण रत्न नहीं है बल्कि यह बहुत ही दुर्लभ मणि है। इसे पहनने वाले व्यक्ति को जीवन के हर प्रकार के तनाव से मुक्ति मिलती है और उसका जीवन खुशहाल बनता है।
यह राहु बाधा निवारण के लिए अचूक उपाय है। मछलियों के अंदर कई रंग के पत्थर बनते हैं जो बेशुमार धन और देवताओं का आशीर्वाद देते हैं। मच्छ मणि मछली की आंख की तरह होती है। इस मणि के प्रभाव से काला जादू बेअसर होता है धन एवं स्वास्थ्य में वृद्धि होती है।
मच्छ मणि को धारण करने से आपके जीवन में प्यार और सम्मान आएगा। मच्छ मणि एक आंतरिक प्रकाश, आध्यात्मिक प्रभाव और स्मरण शक्ति के साथ आपके जीवन को प्रकाशमान करता है।
मच्छ मणि पहनने से जीवन में आने वाली परेशानियां जल्द ही दूर हो जाती है समाज में मान सम्मान बढ़ता है कार्य में रूकावटे नही आती है जीवन हर प्रकार से सुखमय हो जाता है
मच्छ मणि पहनने से राहु के बुरे प्रभाव से मुक्ति मिलती है जिस व्यक्ति पर राहू की अंतर दशा या महादशा चल रही हो ऐसे व्यक्ती को मच्छ मणि जरूर धारण करना चाहिए ।
मच्छ मणि पहनने से जिन लोगो का व्यापार ना चल रहा हो या नौकरी नहीं लग रही हो ऐसे व्यक्ति की नौकरी जल्द ही लग जाती है और व्यापार में भी लाभ होता है इस प्रकार से मच्छ मणि हर प्रकार से आपके लिए लाभकारी है
🥝 आरोग्य संजीवनी 🍓
👉 आपको इंफेक्शन से दूर रखती है : अगर आप मानसून के मौसम में नीम की निंबोली का सेवन करती हैं या फिर नीम के पत्तों से नहाती हैं तो आपके शरीर में बैक्टेरिया या इन्फेक्शन आदि के प्रवेश करने का रिस्क काफी कम हो जाता है। नीम के हर पदार्थ में एंटी बैक्टेरियल गुण होते हैं जो आपकी स्किन में बैक्टीरिया की ग्रोथ होने से बचाता है।
👉 आपको सोरायसिस से मुक्ति मिलेगी : अगर आपको एक्जिमा और सोरायसिस जैसी स्किन स्थितियां हैं, तो इसमें भी निंबोली का सेवन करना आपके लिए काफी लाभदायक हो सकता है। यह आपकी स्किन को अंदर से पोषण देती हैं और खून साफ करती हैं। जिससे स्किन पर होने वाली इस तरह की समस्याओं से निजात मिलती है।
👉 घाव भरने में मददगार : अगर आपको कहीं चोट लग गई है तो उस छेद से बैक्टीरिया आपकी स्किन के अंदर प्रवेश कर सकते हैं। जिस कारण आप इंफेक्शन का शिकार हो सकती हैं। लेकिन अगर आप वहां पर निंबोली का लेप लगा लेती हैं और साथ ही सेवन भी करती हैं, तो बैक्टीरिया को अंदर घुसने का रास्ता नहीं मिल पाता। नीम में वाउंड हीलिंग गुण भी होते हैं जो आपके घाव को जल्द से जल्द ठीक होने में मदद करते हैं।
🌹 गुरु भक्ति योग_ 🌸
कल का शेष
देवता और असुर दोनों के प्रिय शिव : – भगवान शिव को देवों के साथ असुर, दानव, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, यक्ष आदि सभी पूजते हैं। वे रावण को भी वरदान देते हैं और राम को भी। उन्होंने भस्मासुर, शुक्राचार्य आदि कई असुरों को वरदान दिया था। शिव, सभी आदिवासी, वनवासी जाति, वर्ण, धर्म और समाज के सर्वोच्च देवता हैं।
शिव चिह्न : – वनवासी से लेकर सभी साधारण व्यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्थर के ढेले, बटिया को शिव का चिह्न माना जाता है। इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिव का चिह्न माना गया है। कुछ लोग डमरू और अर्द्ध चन्द्र को भी शिव का चिह्न मानते हैं, हालांकि ज्यादातर लोग शिवलिंग अर्थात शिव की ज्योति का पूजन करते हैं।
शिव की गुफा : – शिव ने भस्मासुर से बचने के लिए एक पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गए। वह गुफा जम्मू से 150 किलोमीटर दूर त्रिकूटा की पहाड़ियों पर है। दूसरी ओर भगवान शिव ने जहां पार्वती को अमृत ज्ञान दिया था वह गुफा ‘अमरनाथ गुफा’ के नाम से प्रसिद्ध है।
शिव के पैरों के निशान : – श्रीपद- श्रीलंका में रतन द्वीप पहाड़ की चोटी पर स्थित श्रीपद नामक मंदिर में शिव के पैरों के निशान हैं। ये पदचिह्न 5 फुट 7 इंच लंबे और 2 फुट 6 इंच चौड़े हैं। इस स्थान को सिवानोलीपदम कहते हैं। कुछ लोग इसे आदम पीक कहते हैं।
शिव के अवतार : -वीरभद्र, पिप्पलाद, नंदी, भैरव, महेश, अश्वत्थामा, शरभावतार, गृहपति, दुर्वासा, हनुमान, वृषभ, यतिनाथ, कृष्णदर्शन, अवधूत, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, किरात, सुनटनर्तक, ब्रह्मचारी, यक्ष, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, द्विज, नतेश्वर आदि हुए हैं। वेदों में रुद्रों का जिक्र है। रुद्र 11 बताए जाते हैं- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शंभू, चण्ड तथा भव।
शिव का विरोधाभासिक परिवार : – शिवपुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है, जबकि शिव के गले में वासुकि नाग है। स्वभाव से मयूर और नाग आपस में दुश्मन हैं। इधर गणपति का वाहन चूहा है, जबकि सांप मूषकभक्षी जीव है। पार्वती का वाहन शेर है, लेकिन शिवजी का वाहन तो नंदी बैल है। इस विरोधाभास या वैचारिक भिन्नता के बावजूद परिवार में एकता है।
तिब्बत स्थित कैलाश पर्वत पर उनका निवास है। जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है जो भगवान विष्णु का स्थान है। शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है।
शिव भक्त : – ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवी-देवताओं सहित भगवान राम और कृष्ण भी शिव भक्त है। हरिवंश पुराण के अनुसार, कैलास पर्वत पर कृष्ण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की थी।
शिव ध्यान : – शिव की भक्ति हेतु शिव का ध्यान-पूजन किया जाता है। शिवलिंग को बिल्वपत्र चढ़ाकर शिवलिंग के समीप मंत्र जाप या ध्यान करने से मोक्ष का मार्ग पुष्ट होता है।
शिव मंत्र : – दो ही शिव के मंत्र हैं पहला- ॐ नम: शिवाय। दूसरा महामृत्युंजय मंत्र- ॐ ह्रौं जू सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जू ह्रौं ॐ ॥ है।
शिव प्रचारक : – भगवान शंकर की परंपरा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया। इसके अलावा वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, बाण, रावण, जय और विजय ने भी शैवपंथ का प्रचार किया। इस परंपरा में सबसे बड़ा नाम आदिगुरु भगवान दत्तात्रेय का आता है। दत्तात्रेय के बाद आदि शंकराचार्य, मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गुरुगोरखनाथ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
शिव महिमा : – शिव ने कालकूट नामक विष पिया था जो अमृत मंथन के दौरान निकला था। शिव ने भस्मासुर जैसे कई असुरों को वरदान दिया था। शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। शिव ने गणेश और राजा दक्ष के सिर को जोड़ दिया था। ब्रह्मा द्वारा छल किए जाने पर शिव ने ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया था।
शैव परम्परा : – दसनामी, शाक्त, सिद्ध, दिगंबर, नाथ, लिंगायत, तमिल शैव, कालमुख शैव, कश्मीरी शैव, वीरशैव, नाग, लकुलीश, पाशुपत, कापालिक, कालदमन और महेश्वर सभी शैव परंपरा से हैं। चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी और नागवंशी भी शिव की परंपरा से ही माने जाते हैं। भारत की असुर, रक्ष और आदिवासी जाति के आराध्य देव शिव ही हैं। शैव धर्म भारत के आदिवासियों का धर्म है।
शिव के प्रमुख नाम : – शिव के वैसे तो अनेक नाम हैं जिनमें 108 नामों का उल्लेख पुराणों में मिलता है लेकिन यहां प्रचलित नाम जानें- महेश, नीलकंठ, महादेव, महाकाल, शंकर, पशुपतिनाथ, गंगाधर, नटराज, त्रिनेत्र, भोलेनाथ, आदिदेव, आदिनाथ, त्रियंबक, त्रिलोकेश, जटाशंकर, जगदीश, प्रलयंकर, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, हर, शिवशंभु, भूतनाथ और रुद्र।
अमरनाथ के अमृत वचन : -शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।
शिव ग्रंथ : – वेद और उपनिषद सहित विज्ञान भैरव तंत्र, शिव पुराण और शिव संहिता में शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है।
शिवलिंग : -वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना है।
बारह ज्योतिर्लिंग : सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ॐकारेश्वर, वैद्यनाथ, भीमशंकर, रामेश्वर, नागेश्वर, विश्वनाथजी, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ, घृष्णेश्वर। ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में अनेकों मान्यताएं प्रचलित है। ज्योतिर्लिंग यानी ‘व्यापक ब्रह्मात्मलिंग’ जिसका अर्थ है ‘व्यापक प्रकाश’। जो शिवलिंग के बारह खंड हैं। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।
दूसरी मान्यता अनुसार शिव पुराण के अनुसार प्राचीनकाल में आकाश से ज्योति पिंड पृथ्वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया। इस तरह के अनेकों उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे थे। भारत में गिरे अनेकों पिंडों में से प्रमुख बारह पिंड को ही ज्योतिर्लिंग में शामिल किया गया।
शिव का दर्शन : शिव के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वे सही बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं, क्योंकि शिव का दर्शन कहता है कि यथार्थ में जियो, वर्तमान में जियो, अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिए उपयोग करो। आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
(समाप्ति्)
𖡼•┄•𖣥𖣔𖣥•┄•𖡼 🙏🏻𖡼•┄•𖣥𖣔𖣥•┄•𖡼
⚜️ सोमवार और शुक्रवार कि सप्तमी विशेष रूप से शुभ फलदायी नहीं मानी जाती बाकी दिनों कि सप्तमी सभी कार्यों के लिये शुभ फलदायी मानी जाती है। सप्तमी को भूलकर भी नीला वस्त्र धारण नहीं करना चाहिये तथा ताम्बे के पात्र में भोजन भी नहीं करना चाहिये। सप्तमी को फलाहार अथवा मीठा भोजन विशेष रूप से नमक के परित्याग करने से भगवान सूर्यदेव कि कृपा सदैव बनी रहती है।
शास्त्र के अनुसार जिस व्यक्ति का जन्म सप्तमी तिथि में होता है, वह व्यक्ति बहुत ही भाग्यशाली होता है। इस तिथि में जन्म लेनेवाला जातक गुणवान और प्रतिभाशाली होता है। ये अपने मोहक व्यक्तित्व से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने की योग्यता रखते हैं। इनके बच्चे भी गुणवान और योग्य होते हैं। धन धान्य के मामले में भी यह व्यक्ति काफी भाग्यशाली होते हैं। ये संतोषी स्वभाव के होते हैं और इन्हें जितना मिलता है उतने से ही संतुष्ट रहते हैं।

