
आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
✦••• जय श्री हरि •••✦
🧾 आज का पंचांग 🧾
रविवार 03 मई 2026भगवान सूर्य जी का मंत्र : ऊँ घृणि सूर्याय नम: ।।🌠 रविवार को की गई सूर्य पूजा से व्यक्ति को घर-परिवार और समाज में मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। रविवार के दिन उगते हुए सूर्य को देव को एक ताबें के लोटे में जल, चावल, लाल फूल और रोली डालकर अर्ध्य करें।*इस दिन आदित्य ह्रदय स्रोत्र का पाठ करें एवं यथा संभव मीठा भोजन करें। सूर्य को आत्मा का कारक माना गया है, सूर्य देव को जल देने से पितृ कृपा भी मिलती है। *रविवार के दिन भैरव जी के दर्शन, आराधना से समस्त भय और संकट दूर होते है, साहस एवं बल की प्राप्ति होती है। रविवार के दिन जी के दर्शन अवश्य करें ।रविवार के दिन भैरव जी के मन्त्र ” ॐ काल भैरवाय नमः “ या ” ॐ श्री भैरवाय नमः “ की एक माला जाप करने से समस्त संकट, भय दूर होते है, रोगो, अकाल मृत्यु से बचाव होता है, मनवांछित लाभ मिलता है।🔮 शुभ हिन्दू नववर्ष 2026 विक्रम संवत : 2083 सिद्धार्थी विक्रम : 1969 शर्वरी🌐 रौद्र संवत्सर विक्रम संवत 2083,✡️ शक संवत 1948 (पराभव संवत्सर), चैत्र☮️ गुजराती सम्वत : 2082 पिङ्गल☸️ काली सम्वत् 5127🕉️ संवत्सर (बृहस्पति) पराभव☣️ आयन – उत्तरायण☂️ ऋतु – सौर ग्रीष्म ऋतु☀️ मास – ज्यैष्ठ मास🌖 पक्ष – कृष्ण पक्ष📆 तिथि – रविवार ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष द्वितीया तिथि 03:02 AM तक उपरांत तृतीया✏️ तिथि स्वामी – द्वितीय तिथि (दूज) के स्वामी ब्रह्मा जी हैं, जिन्हें विधाता भी कहा जाता हैं, इसका विशेष नाम ‘सुमंगला’ है। यह भद्रा संज्ञक तिथि है।💫 नक्षत्र- नक्षत्र विशाखा 07:09 AM तक उपरांत अनुराधा🪐 नक्षत्र स्वामी – विशाखा नक्षत्र के स्वामी देवगुरु बृहस्पति (गुरु) हैं। इस नक्षत्र के देवता इंद्र और अग्नि (इंद्राग्नि) हैं।⚜️ योग – वरीयान योग 10:27 PM तक, उसके बाद परिघ योग⚡ प्रथम करण : तैतिल 01:54 PM तक✨ द्वितीय करण : गर 03:02 AM तक, बाद वणिज🔥 गुलिक काल : रविवार को शुभ गुलिक काल 02:53 पी एम से 04:17 पी एम🤖 राहुकाल (अशुभ) – सायं 4:51 बजे से 6:17 बजे तक। राहु काल में शुभ कार्य करना वर्जित माना गया है।⚜️ दिशाशूल – रविवार को पश्चिम दिशा की यात्रा नहीं करनी चाहिये, यदि अत्यावश्यक हो तो पान एवं घी खाकर यात्रा कर सकते है।🌞 सूर्योदयः – प्रातः 05:32:00🌅 सूर्यास्तः – सायं 06:34:00👸🏻 ब्रह्म मुहूर्त : प्रातः 04:13 ए एम से 04:56 ए एम🌇 प्रातः सन्ध्या : प्रातः 04:35 ए एम से 05:39 ए एम🌟 अभिजित मुहूर्त : दोपहर 11:52 ए एम से 12:45 पी एम🔯 विजय मुहूर्त : दोपहर 02:31 पी एम से 03:25 पी एम🐃 गोधूलि मुहूर्त : शाम 06:56 पी एम से 07:18 पी एम🌌 सायाह्न सन्ध्या : शाम 06:57 पी एम से 08:02 पी एम💧 अमृत काल : रात्रि 10:21 पी एम से 12:08 ए एम, मई 04🗣️ निशिता मुहूर्त : रात्रि 11:56 पी एम से 12:39 ए एम, मई 04🌸 त्रिपुष्कर योग : प्रातः 05:39 ए एम से 07:10 ए एम🚓 यात्रा शकुन-इलायची खाकर यात्रा प्रारम्भ करें।👉🏼 आज का मंत्र-ॐ घृणि: सूर्याय नम:।💁🏻♀️ आज का उपाय-विष्णु मंदिर में पिताम्बर चढ़ाएं।🌳 वनस्पति तंत्र उपाय-बेल के वृक्ष में जल चढ़ाएं।⚛️ पर्व एवं त्यौहार – विंछुड़ो/ त्रिपुष्कर योग/ आडल योग/ भारतीय राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जन्म दिवस, राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन पुण्य तिथि, राष्ट्रीय नींबू पानी दिवस, मई संविधान दिवस, विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस, अंतर्राष्ट्रीय सूर्य दिवस, भारतीय रक्षा मंत्री वी.के. कृष्णा मेनन जन्म दिवस, भारतीय राजनीतिज्ञ उमा भारती जन्म दिवस, अर्थशास्त्री डॉ. धनंजय रामचंद्र गाडगिल स्मृति दिवस, भारतीय राजनीतिज्ञ प्रमोद महाजन जन्म दिवस, साहित्यकार राम बालकृष्ण शेवालकर पुण्य तिथि, विश्व श्वसन दिवस✍🏼 *तिथि विशेष – द्वितीय तिथि को कटोरी फल का तथा तृतीया तिथि है नमक का दान और भक्षण दोनों ही त्याज्य है। द्वितीय तिथि सुमंगला और कार्य सिद्धकारी तिथि मानी जाती है। इस द्वितीय तिथि के स्वामी भगवान ब्रह्मा जी को बताया गया है। यह द्वितीय की तिथि भद्रा नाम से विख्यात मानी जाती है। यह द्वितीय तिथि शुक्ल पक्ष में अशुभ तथा कृष्ण पक्ष में शुभ फलदायिनी होती है। 🏘️ *_Vastu tips* 🏚️पूर्व दिशा देती है मानसिक शांति पूर्व दिशा को सकारात्मकता और ज्ञान की दिशा माना जाता है। इस दिशा में सिर रखकर सोने से मन शांत रहता है और तनाव कम होता है। जो लोग अधिक सोचते हैं या मानसिक दबाव में रहते हैं, उनके लिए यह दिशा खासतौर पर फायदेमंद मानी जाती है। इससे फोकस और सोचने की क्षमता भी बेहतर होती है।*उत्तर दिशा से क्यों बचने की सलाह वास्तु शास्त्र के अनुसार, उत्तर दिशा में सिर रखकर सोना उचित नहीं माना जाता। ऐसा कहा जाता है कि इससे शरीर और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के बीच असंतुलन पैदा हो सकता है। इसके कारण नींद में रुकावट, बेचैनी और सिरदर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं। *छोटी आदत से बड़ा बदलाव सही दिशा में सोना सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि एक सकारात्मक आदत भी है। जब व्यक्ति यह मानकर सोता है कि वह सही दिशा में है, तो उसका मन भी शांत रहता है। यह छोटा सा बदलाव लंबे समय में बेहतर नींद, अच्छी सेहत और संतुलित जीवनशैली देने में मदद कर सकता है।🔐 जीवनोपयोगी कुंजियां ⚜️करी पत्ता के फायदे – लीवर शरीर का बहुत महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। कई प्रकार के काम करता है। स्वस्थ रहने के लिए लीवर का निरंतर बिना रुके सही तरीके से काम करना जरुरी होता है। करी पत्ता लीवर को सशक्त बनाता है ।*यह लीवर को बेक्टिरिया तथा वायरल इन्फेक्शन से बचाता है। इसके अलावा यह फ्री रेडिकल्स , हेपेटाइटिस , सिरोसिस आदि कई प्रकार की बीमारियों से लीवर को बचाता है। *आँखे इसमें में पर्याप्त मात्रा में विटामिन A होता है। विटामिन A आँखों को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी कमी से रतोंधी नामक बीमारी हो सकती है , आँखों की रौशनी कम हो सकती है और भी बहुत सी परेशानियां हो सकती है।*कोलेस्ट्रॉल करी पत्ते में LDL कोलेस्ट्रॉल कम करने की प्रकृति होती है। LDL कोलेस्ट्रॉल ह्रदय की बीमारियों का कारण होता है। इस तरह करी पत्ता दिल के लिए लाभदायक होता है। *बालों के लिए करी पत्ता बालों की जड़ को मजबूत बनाता है। करी पत्ता की सूखी पत्तियों का पाउडर तिल के तेल या नारियल के तेल में डालकर उबाल लें। ठंडा होने पर छान लें। इससे रात को सिर की मालिश करें। सुबह शेम्पू कर लें।*नियमित बालों की जड़ों में इस प्रकार मालिश करने से बाल गिरना बंद हो जाते है। इससे बाल मजबूत , लंबे और चमकदार हो जाते है। 🥂 *आरोग्य संजीवनी* 🍶 खरल के प्रकार : आयुर्वेद में, खरल को बनाने के लिए उपयोग की जाने वाली सामग्री के आधार पर कई प्रकार होते हैं। प्रत्येक प्रकार का उपयोग उसकी विशिष्टता के अनुसार किया जाता है: *लोहे का खरल: इसका उपयोग कठोर धातु, खनिज और अशुद्धियों को शुद्ध करने के लिए किया जाता है। लोहे के खरल में घुटाई करने से धातु के सूक्ष्म कण भी औषधि में मिल जाते हैं।*पत्थर का खरल: यह सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला खरल है। इसका उपयोग जड़ी-बूटियों, शुष्क फलों और अन्य वनस्पतियों को पीसकर चूर्ण बनाने के लिए किया जाता है। इसे अक्सर प्राकृतिक, घने पत्थरों से बनाया जाता है, जैसे कि मार्बल या सैंडस्टोन। *स्फटिक खरल (क्रिस्टल): यह खरल स्फटिक या क्रिस्टल से बना होता है। इसका उपयोग विशेष रूप से उन औषधियों को बनाने के लिए किया जाता है जो बहुत संवेदनशील होती हैं या जिनमें उच्च ऊर्जा का समावेश करना होता है।*तांबे और कांस्य के खरल: इन धातुओं से बने खरल का उपयोग विशिष्ट औषधियों के लिए किया जाता है, क्योंकि इनमें धातु के कुछ गुण भी औषधि में मिल जाते हैं। 📖 गुरु भक्ति योग 🕯️सूर्य–बुध की युति को ज्योतिष में सामान्यतः बुद्धादित्य योग कहा जाता है, और यह अपने आप में शुभ मानी जाती है। यह धारणा कि “सूर्य के साथ होने पर बुध शून्य हो जाता है” पूर्णतः सही नहीं है। वास्तव में बुध सूर्य के अत्यंत निकट रहने वाला ग्रह है, इसलिए उसका अस्त (combust) होना स्वाभाविक स्थिति है—लेकिन बुध का अस्त होना हमेशा उसे निष्क्रिय या शून्य नहीं बनाता। कई बार यह युति व्यक्ति को तेज बुद्धि, तर्क क्षमता और प्रशासनिक योग्यता भी देती है, विशेषकर यदि यह अच्छे भाव में हो और पाप प्रभाव से मुक्त हो।*हाँ, यदि बुध अत्यधिक अस्त हो, पाप ग्रहों से पीड़ित हो, या नीच/दुर्बल अवस्था में हो, तो उसकी विश्लेषण क्षमता, निर्णय शक्ति और संचार कौशल प्रभावित हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में केवल सूर्य को मजबूत करने से बुध और दब सकता है—क्योंकि सूर्य की तेज ऊर्जा बुध को और अधिक “दग्ध” कर सकती है। इसलिए अंधाधुंध सूर्य को बल देना उचित नहीं होता, खासकर तब जब बुध पहले से ही कमजोर हो।*उपाय के दृष्टिकोण से संतुलन आवश्यक है। यदि कुंडली में बुध कमजोर है, तो बुध के उपाय प्राथमिक रूप से करने चाहिए—जैसे बुधवार का व्रत, हरी वस्तुओं का दान, “ॐ बुं बुधाय नमः” मंत्र जप, या पन्ना धारण (यदि कुंडली अनुमति दे)। सूर्य के लिए भी सामान्य स्तर के उपाय (जैसे आदित्य हृदय स्तोत्र, सूर्य को अर्घ्य) किए जा सकते हैं, लेकिन उसे अत्यधिक बल देने वाले उपाय (जैसे माणिक्य धारण) बिना विश्लेषण के नहीं करने चाहिए। *सार यह है कि सूर्य–बुध युति में “किसे मजबूत करें” यह पूरी कुंडली पर निर्भर करता है, लेकिन यदि बुध स्पष्ट रूप से पीड़ित है, तो पहले बुध को संतुलित और सशक्त करना अधिक उचित रणनीति होती है, न कि केवल सूर्य को बढ़ाना।━━━━━━━⊱✿⊰━━━━━━━─⚜️ प्रजापति व्रत दूज को ही मनाया जाता है तथा किसी भी नए कार्य की शुरुआत से पहले एवं ज्ञान प्राप्ति हेतु ब्रह्मा जी का पूजन आवश्यक करना चाहिए। वैसे तो मूहूर्त चिंतामणि आदि ग्रंथों के अनुसार द्वितीय तिथि अत्यंत शुभ फलदायिनी तिथि मानी जाती है। परंतु श्रावण और भाद्रपद मास में इस द्वितीया तिथि का प्रभाव शून्य हो जाता है। इसलिए श्रावण और भद्रपद की द्वितीया तिथि को कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।


