कार्यपालिका मजबूत होने की जगह मजबूर क्यों है: अविरल जैन

न्यायालय न होता तो पता नहीं क्या होता?
रिपोर्टर : मनीष यादव
टीकमगढ़ । बिहारी जू मंदिर की जमीन वापस भगवान बिहारी जू के नाम करने की चर्चा आज टीकमगढ़ नगर के हर चौराहे पर हो रही है। जाहिर सी बात है कि इस कृत्य को टीकमगढ़ कलेक्टर के आदेश पर किया गया है। प्रशासन ने बता दिया है कि कार्यवाही करना चाहे तो की जा सकती है। मामला लंबे समय से अटका हुआ था। लेकिन कल दिनांक 24 मई 2025 को टीकमगढ़ कलेक्टर विवेक श्रोती ने अपने आदेश से बिहारी जू मंदिर की जमीन को कुछ लोगों के द्वारा बेच कर इस पर प्लाटिंग कर अवैध कॉलोनी बनाना शुरू कर दिया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार उस कॉलोनी में टीकमगढ़ शहर के लगभग सत्रह लोगों ने उस अवैध कॉलोनी में अपने नाम से प्लॉट भी खरीद लिए थे और नामांतरण की कार्यवाही भी करवा ली थी। लेकिन टीकमगढ़ कलेक्टर के कल के आदेश के बाद सभी के नामांतरण तत्काल प्रभाव से निरस्त हो जायेगे और जमीन का मालिकाना हक वापस से भगवान बिहारी जू के पास चला जाएगा। लोकतंत्र के पहले राजाओं के समय मंदिरों को कुछ जमीनें भी दे दी जाती थी ताकि उन जमीनों से होने वाली आए से भगवान और मंदिर व्यवस्था चलती रहे। लेकिन कालांतर में जब मंदिर और उसकी व्यवस्थाओं में से लोकतंत्र की प्रक्रिया समाप्त हो जाती है और कोई एक व्यक्ति उसे अपनी जागीर समझ बैठता है तब समय के साथ साथ ऐसा होता है कि उस एक व्यक्ति द्वारा भगवान और मंदिर के हितों को दरकिनार कर स्वयं उस जमीन का मालिक बन जाता और उस जमीन के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देता है। ऐसा ही कुछ टीकमगढ़ के बिहारी जू मंदिर की जमीन के साथ हुआ। लेकिन प्रश्न तो ये है कि बिहारी जू मंदिर की जमीन से जो कब्जा समाप्त कर नामांतरण निरस्त किए गए है उसमें इतना समय क्यों लगा? मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस कार्यवाही में पक्षकार रहे व्यक्ति ने सर्वप्रथम कलेक्टर टीकमगढ़ को इस संबंध में आवेदन देकर कार्यवाही की मांग की थी लेकिन उस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। फिर अपने मौलिक अधिकारों की आवाज को लेकर पीड़ित पक्षकार को उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा जिसके बाद ही न्यायालय के आदेश पर कलेक्टर टीकमगढ़ ने इस कार्यवाही को अंजाम दिया है। पर प्रश्न तो वहीं है कि कितने ऐसे पक्षकार होगे जो न्यायालय तक जा सकते है। क्या कलेक्टर साहब से समस्या का निराकरण करवाने के लिए एक अलग माध्यम से पहले न्यायालय के सामने हर बार मौलिक अधिकारों का हनन बताना जरूरी है? भारतीय लोकतंत्र ने तीनों स्तंभों के अलग अलग कार्य विभाजित किए गए है। लेकिन कार्यपालिका से उसके कार्य करवाने के लिए बार बार न्यायपालिका की तरफ ही देखना पड़ता है। इसलिए समझ नहीं आता है कि कार्यपालिका मजबूत होने की जगह मजबूर क्यों है और न्यायपालिका का डर दिखारकर ही कार्य क्यों करवाना पड़ता है। एक नजरिए से कहा जा सकता है कि खुशी की बात है कि कम से कम कार्यवाही तो हुई। लेकिन प्रश्न वहीं है कि कार्यवाही करके कोई एहसान नहीं किया है बल्कि लंबे समय से हो रहे अधिकार के हनन को खत्म कर अधिकार वापस दिया गया है। अब केवल यही आशा है कि कलेक्टर टीकमगढ़ जिले में चल रही अवैध कॉलोनी और उनके कॉलोनाइजर्स पर भी इसी प्रकार से कार्यवाही करेंगे।



