देश विदेशराजनीति

अवसर के आगे विचारधारा नतमस्तक !

हरीश मिश्र, लेखक ( स्वतंत्र पत्रकार)

राजनीति के इस रंगमंच पर किरदार बदलते रहते हैं, खुद के बनाए सिद्धांत भी बदल जाते हैं। आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों का एक साथ भाजपा में प्रवेश, साधारण घटना नहीं है। यह महज दल-बदल नहीं, बल्कि उस भरोसे के क्षरण का संकेत है, जिस पर कभी इस पार्टी की नींव रखी गई थी।अरविंद केजरीवाल ने जब राजनीति में प्रवेश किया था, तब उन्होंने व्यवस्था परिवर्तन का वादा किया था, एक ऐसी राजनीति का, जो न तो अवसरवाद की बैसाखियों पर चले और न ही सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने के लिए सिद्धांतों का गला घोंटेगी। किंतु आज उन्हीं के विश्वस्त साथी, राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल जैसे नाम, जब एक साथ किनारा करते दिखते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि दोष किसका है, व्यक्ति का या व्यवस्था का?राजनीति में यह तर्क पुराना है कि सत्ताधारी दल अपने विरोधियों को तोड़ने के लिए ‘ऑपरेशन कमल’ जैसे उपाय अपनाता है। यह सत्य भी है, किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि कोई भी वृक्ष तभी टूटता है, जब उसकी जड़ें कमजोर हो जाती हैं।यदि प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी ही दल-बदल का एकमात्र कारण होती, तो हर छापे के बाद दलों का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाता।सबसे अधिक विस्मयकारी तो संदीप पाठक का अलग होना है। वे केवल सांसद नहीं थे, बल्कि पार्टी के मस्तिष्क कहे जाते थे, रणनीति के शिल्पकार। जब शिल्पकार ही अपने बनाए घर को छोड़ दे, तो यह मानना कठिन नहीं कि उस घर की दीवारों में दरारें पड़ चुकी हैं।हरभजन सिंह, विक्रमजीत साहनी, स्वाति मालीवाल जैसे नाम अभी औपचारिक रूप से भले ही शेष हों, लेकिन उनकी सहमति यह संकेत दे रही है कि यह प्रवाह अब रुकने वाला नहीं। यह केवल संख्या का खेल नहीं, बल्कि साख का संकट है और राजनीति में साख ही सबसे बड़ी पूंजी होती है।यह पहली बार नहीं है कि केजरीवाल अपने साथियों से इस तरह अलग हुए हों। प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, कुमार विश्वास—ये सभी वे चेहरे हैं, जिन्होंने कभी ‘आप’ की आत्मा को आकार दिया था। जब एक-एक कर ये सभी किनारे होते गए, तब भी सवाल उठा था, और आज जब राज्यसभा के भीतर से ही दरार दिखाई दे रही है, तब यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो गया है।राजनीति में पाप और पुण्य का कोई स्थायी मानदंड नहीं होता—यह वाक्य अब फिर से जीवित होता दिख रहा है। कल तक जो भाजपा के विरोध में थे, आज वही उसके अंग बनने को तैयार हैं। यह भारतीय राजनीति का शाश्वत व्यंग्य है, जहां विचारधारा अक्सर अवसर के आगे नतमस्तक हो जाती है।आम आदमी पार्टी ने कभी स्वच्छ राजनीति का जो दीप जलाया था, वह अब धुंधला पड़ता प्रतीत हो रहा है। दिल्ली और पंजाब की सत्ता ने उसे विस्तार तो दिया, पर शायद उसी विस्तार में उसकी आत्मा कहीं खो गई। राष्ट्रीय दल बनने की आकांक्षा ने उसे भी उसी भीड़ का हिस्सा बना दिया, जिससे अलग होने का उसने दावा किया था।अब प्रश्न भाजपा या ‘ऑपरेशन कमल’ का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या अरविंद केजरीवाल अपने भीतर झांकने का साहस करेंगे ? क्या वे यह स्वीकार करेंगे कि समस्या बाहर नहीं, भीतर है ?क्योंकि राजनीति में सबसे बड़ा संकट विरोधियों से नहीं, अपनों के अविश्वास से जन्म लेता है और जब अपने ही साथ छोड़ दें, तो समझ लेना चाहिए कि कहीं न कहीं दिशा भटक गई है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button