कृषि

सोयाबीन के भूसे में आग न लगाएं किसान, पशुओं के चारे और खेत की उर्वरता बढ़ाने में करें उपयोग

सिलवानी। कृषि विभाग के आत्मा परियोजना संचालक रवि आम्रवंशी ने जिले के सोयाबीन उत्पादक किसानों से फसल की कटाई और थ्रेसिंग के बाद खेतों में बचे सोयाबीन के भूसे में आग नहीं लगाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि भूसे को जलाने के बजाय पशुओं के चारे के रूप में उपयोग किया जाए या खेत में ही जुताई के माध्यम से मिट्टी में मिला दिया जाए। इससे जहां पशुपालन को लाभ मिलेगा, वहीं भूमि की उर्वरता में भी सुधार होगा।
आम्रवंशी ने बताया कि रायसेन जिले में खरीफ सीजन के दौरान लगभग 75 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की खेती की जा रही है। वर्तमान में सोयाबीन की फसल पककर तैयार हो चुकी है तथा किसान इसकी कटाई और थ्रेसिंग का कार्य कर रहे हैं। थ्रेसिंग के बाद खेतों में बड़ी मात्रा में सोयाबीन का भूसा बच जाता है।
उन्होंने बताया कि अपने भ्रमण के दौरान उन्होंने पाया कि कई किसान थ्रेसिंग के बाद बचे भूसे को खेतों में छोटे-छोटे ढेरों में एकत्र कर शाम के समय उसमें आग लगा रहे हैं। उन्होंने इस प्रक्रिया को अनुचित बताते हुए कहा कि भूसे को जलाने से न केवल उपयोगी कृषि अवशेष नष्ट होते हैं, बल्कि आसपास की फसलों में आग फैलने का खतरा भी बना रहता है।
धान की फसल को हो सकता है नुकसान
आत्मा परियोजना संचालक ने बताया कि सोयाबीन के खेतों के आसपास कई स्थानों पर धान की फसल लगी हुई है। ऐसे में यदि सोयाबीन के भूसे में लगाई गई आग फैलकर धान के खेतों तक पहुंच जाती है, तो किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए किसानों को सावधानी बरतते हुए खेतों में आग लगाने से बचना चाहिए।
पशुओं के लिए पौष्टिक चारा है सोयाबीन का भूसा
उन्होंने कहा कि सोयाबीन एक दलहनी फसल है और इसके भूसे में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है। किसान इस भूसे का उपयोग अपने दुधारू पशुओं के चारे के रूप में कर सकते हैं। इससे पशुओं को पोषण मिलेगा और संतुलित आहार के रूप में उपयोग किए जाने पर दूध उत्पादन में भी लाभ हो सकता है। इस प्रकार भूसे को जलाने के बजाय उसका उपयोग करना किसानों के लिए आर्थिक रूप से भी फायदेमंद है।
खेत में भूसा मिलाने से बढ़ेगी मिट्टी की उर्वरता
रवि आम्रवंशी ने किसानों को सलाह दी कि यदि सोयाबीन के भूसे का उपयोग पशुओं के चारे के रूप में नहीं किया जा रहा है, तो उसे कल्टीवेटर से जुताई कर खेत की मिट्टी में मिला दें। इससे भूसा धीरे-धीरे सड़कर मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ाने में मदद करेगा। साथ ही खेत आगामी फसल की तैयारी के लिए भी उपयुक्त बन सकेगा।
उन्होंने बताया कि मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ने से उसकी भौतिक दशा में सुधार होता है। इससे भूमि की गुणवत्ता बेहतर होती है और रबी सीजन में बोई जाने वाली फसलों की उत्पादकता बढ़ाने में सहायता मिलती है।

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