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होली के दहकते अंगारो से निकलते ग्रामीण, सौ साल पुरानी अनोखी परम्परा

अंधविश्वास कहे या आस्था, लोगो का मानना है कि ग्रामीण आपदा और बीमारियों से दूर रहते हैं ।
मृगांचल एक्सप्रेस टीम की खास रिपोर्ट
सिलवानी ।
तहसील के दो ग्रामो में अनोखे तरह से होली मनाई जाती है । यह सौ साल पुरानी परंपरा आज के आधुनिक युग मे भी जारी हैं। होली के दहकते अंगारो में से होकर गुजरते है ग्रामीण । होली का त्योहार मान्यताओं और परंपराओं का समागम है. देश के अलग-अलग हिस्सों में होली हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है.  कहीं फूलों से होली खेली जाती है, तो कहीं पर लोग एक दूसरे पर लट्ठ बरसातें हुए होली खेलते हैं. लेकिन आपने कभी आग के जलते अंगारों पर चलकर होली खेले जाने के बारे में सुना है. इस पर यकीन कर पाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है. लेकिन सिलवानी तहसील के दो गांवो में होली के दिन अंगारों पर चलने की परंपरा है।

आस्था व श्रद्धा के चलते ग्रामीण धधकते हुए अंगारों के बीच से नंगे पैर निकलते है। ग्रामीणो की आस्था का आलम यह है कि नाबालिग बच्चों से लेकर महिलाएं उम्र दराज बुजुर्ग तक अंगारों पर नंगे पैर निकलते है लेकिन जलते हुए होलिका दहन के अंगारों पर निकलने के बाद भी बच्चों और महिलाओं से लेकर बुजुर्ग तक के पैर आग पर चलने के बाद भी किसी भी ग्रामीणों के पैर नहीं जलते और ना ही किसी भी गांव के व्यक्ति को कोई भी परेशानी नहीं होती है। सभी ग्रामीण बारी-बारी से आग पर से निकलते हैं। जानकारी के अनुसार गुरुवार की रात्रि में होलिका दहन के बाद रात्री में सिलवानी तहसील से महज 14 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम पंचायत हथौड़ा के ग्राम महगवा और महज 4 किमी दूर बसे ग्राम पंचायत डुंगरिया कला के ग्राम चंदपुरा का है। ग्राम चंदपुरा में ग्रामीण पिछले दस वर्षों से आग पर से निकलते आ रहे है और ग्राम महगवा में ग्रामीण करीब सौ वर्षों से आग पर चलते आ रहे हैं। ग्राम महगवा में लगभग तीन सौ से ज्यादा मकान है जिनकी आबादी लगभग एक हजार है। यहां प्रत्येक वर्ष होलिका दहन के बाद रात्रि में ही सभी ग्रामीण धधकते हुए अंगारों के बीच से ग्राम के बच्चों से लेकर बड़े बुर्जुग व्यक्ति तक बेधड़क होकर लगभग सौ बरसों से होलिका दहन के बाद होलिका दहन के धधकते हुए अंगारों पर नंगे पैर गुजरते आ रहे है। लेकिन अंगारों केे बीच से निकालने के बाद भी किसी भी व्यक्ति या बच्चें को ना तो पैर जलते है और ना ही किसी भी ग्रामीणों को पैरों में जलन होती है बच्चों महिलाएं जलते हुए अंगारों पर ऐसे चलते हैं मानो जैसे फूलों पर चल रहे हो बेरोकटोक बिना किसी हिचक की ग्रामीण इस आस्था में बारी बारी से भाग लेकर निकलते आ रहे हैं और यह प्रथा कई वर्षों से आज भी निरंतर चालू बनी हुई है। ग्राम महगवा के चौराहे पर विधि विधान के साथ पूजा अर्चना के पश्चात ग्रामीणों के सहयोग से होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन को देखने के लिए ग्राम चीचोली, चौका, धनगवा, नांदपुर, भानपुर, डुंगरिया कला, हथोड़ा सहित कई ग्रामों के ग्रामीण बड़ी संख्या में आयोजन को देखने के लिए एकत्रित होते है।
अनेकों वर्ष से हो रहा है आयोजन
ग्राम में करीब होलिका दहन के धधकते हुए अंगारों पर से नंगे पैर निकालने का सिलसिला करीब सौ वर्षो से चल हैं। क्यों और किसलिए यह जानलेवा आयोजन किया जाता है। इसकी सटीक जानकारी किसी भी ग्रामीण के पास नहीं है। लेकिन आस्था इतनी है कि पर्व के आने के कई दिन पूर्व से ही तैयारियां ग्रामीणों के द्वारा प्रारंभ कर दी जाती है बड़ी संख्या में ग्रामीण इस आयोजन में भाग लेते हैं।
नहीं आती ग्राम पर प्राकृतिक आपदा
हालांकि धधकते अंगारों पर चलने की सही जानकारी को लेकर ग्रामीण स्पष्ट रुप से कुछ भी नहीं जानकारी देते है। लेकिन ग्राम के बुजुर्ग ग्रामीण केशवसिंह, रामेश्वर, नरेन्द्र सिंह, लक्ष्मीनारायण रघुवंशी, बाबूलाल साहू, परसोत्तम रघुवंशी, हरगोविंद पटेल, शिवराज कुशवाहा, नारायण राजपूत, कोमल सिंह रघुवंशी आदि का कहना है ग्राम में कभी भी कोई प्राकृतिक आपदा नहीं आती है। सुख शांति समृद्धि के लिए हमारे बुजुर्गों द्वारा सैकड़ों वर्षों से यह प्रथा चली आ रही है इसी मान्यता के चलते प्रत्येक वर्ष होली दहन के बाद यह आयोजन ग्रामीणों द्वारा किया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले सभी लोग अंगारों पर चलते हैं उसके बाद सभी एक दूसरे को रंग गुलाल लगाते हैं ।

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