महान बनने के लिए दूसरे के दोष नहीं गुण देखे : कमलेश कृष्ण शास्त्री

सुल्तानगंज । देहगुआ में चल रही श्रीमद् भागवत महापुराण कथा के तृतीय दिवस में पं. कमलेश शास्त्री ने कहा महानता की सीढ़ी यदि आपको चढ़ना है, तो दूसरों के गुण आप देखें, दोष आपको दिखाई ना दे। जिस मनुष्य के अन्दर पाप बसा हुआ है, वहीं दूसरों के दोष देखता है। परदोष-दर्शन से सावधान रहें; क्योंकि यही ऐसे शत्रु हैं, जो छिपकर वार करते हैं। अपने अज्ञान को दूर करके मन-मन्दिर में ज्ञान का दीपक प्रज्वलित करना भगवान की सच्ची पूजा है। जहाँ लोभ होगा, वहाँ भय भी होगा। हमारी संस्कृति हमें त्याग करना सिखाती है, क्योंकि जहाँ पर त्याग है, वहाँ लोभ नहीं और जहाँ लोभ नहीं, वहाँ भय नहीं। सुख व शान्तिपूर्वक जीवनयापन करने के लिए जीवन में विकास करने के लिए हमें भयमुक्त होना ही होगा। हमारे अधिकतर भय काल्पनिक होते हैं, जो हमारी नकारात्मक सोच का परिणाम होते है। जीवन से बढ़कर और कुछ नहीं। धन-संपत्ति, प्रतिष्ठा ये सब आनी-जानी है। अपने जीवन को निर्मल बनाए रखने के लिए स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें और आशावादी बनें। इसलिए जब समय सही ना हो, तो निराशावादी लोगों से न मिले-जुलें। उनके बीच रहें, जो आशावादी हों और आपको सही मार्ग दिखाएँ। मनुष्य जीवन ईश्वर का अनुपम उपहार है। इससे बड़ा अनुदान उसके पास ऐसा और कोई नहीं है जो प्राणी को दिया जा सके। इसकी विशेषताएँ और सम्भावनायें इतनी अद्भुत हैं, जिनका स्वरूप सामने आने पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। यह उपहार ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति में सहायक बनने की भूमिका निवाहने के लिए मिला है। किन्तु दुर्भाग्यवश हम अपने स्वरूप, ईश्वर के अनुग्रह—जीवन के महत्व एवं लक्ष्य की बात को एक प्रकार से पूरी तरह भुला बैठे हैं। न हमें अपनी सत्ता का ज्ञान है, न ईश्वर का ध्यान और न लक्ष्य का भान। जीवन का लक्ष्य पूर्णता प्राप्त करना है। यह पूर्णता ईश्वरीय स्तर की ही हो सकती है। अतः आत्मा को पुण्यात्मा बनाने के लिये उस लक्ष्य पर ध्यान का एकाग्र करना आवश्यक है।



