देवउठनी एकादशी? जानें सही तिथि, मुहूर्त, पारण समय और महत्व
आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
✦••• जय श्री हरि •••✦
🪙 04 नवम्बर 2022 कब है देवउठनी एकादशी? जानें सही तिथि, मुहूर्त, पारण समय और महत्व
📆 कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी का व्रत रखा जाता है। एकादशी तिथि श्रीहरि विष्णु को समर्पित है। हर एकादशी का अपना अलग महत्व है। इसी तरह से कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन भगवान विष्णु चार माह की लंबी निद्रा से जागते हैं। इसलिए इस एकादशी को देवोत्थान या देवउठनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। आम भाषा में इस देवउठनी ग्यारस और ड्योठान के नाम से जाना जाता है। इस बार देवोत्थान एकादशी 4 नवंबर 2022 दिन, शुक्रवार को पड़ रही है। आइए जानते हैं देव उठनी एकादशी की तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि महत्व और पारण का समय।
📃 देवउठनी एकादशी तिथि
कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि प्रारंभ: 03 नवंबर, गुरुवार, सायं 07:30 मिनट पर
कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का समापन: 04 नवंबर, शुक्रवार, सायं 06: 08 मिनट पर
ऐसे में उदयातिथि के आधार पर देवउठनी एकादशी व्रत 04 नवंबर को रखा जाएगा।
✡️ देवउठनी एकादशी पूजा मुहूर्त
देवउठनी एकादशी का पूजा मुहूर्त: 04 नवंबर, शुक्रवार, प्रातः 06: 35 मिनट से प्रातः 10: 42 मिनट के मध्य
लाभ-उन्नति मुहूर्त: 04 नवंबर, शुक्रवार, प्रातः 07:57 मिनट से प्रातः 09:20 मिनट तक
अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त: 04 नवंबर, शुक्रवार, प्रातः 09:20 मिनट से प्रातः10: 42 मिनट तक
⌛ देवउठनी एकादशी पारण समय
देवउठनी एकादशी व्रत का पारण तिथि : 05 नवंबर, शनिवार
पारण समय: प्रातः 06:36 मिनट से प्रातः 08:47 मिनट के मध्य
द्वादशी तिथि समाप्त: सायं 05:06 मिनट पर
🙏🏼 देवउठनी एकादशी पूजा विधि
देवउठनी एकादशी के दिन ब्रह्म मुहू्र्त में स्नान आदि से निवृत्त होने के बाद भगवान विष्णु जी की पूजा करते हुए व्रत का संकल्प लें।
श्री हरी विष्णु की प्रतिमा के समक्ष उनके जागने का आह्वान करें
सायं काल में पूजा स्थल पर घी के 11 दीये देवी-देवताओं के समक्ष जलाएं।
यदि संभव हो पाए तो गन्ने का मंडप बनाकर बीच में विष्णु जी की मूर्ति रखें।
भगवान हरि को गन्ना, सिंघाड़ा, लड्डू, जैसे मौसमी फल अर्पित करें।
एकादशी की रात एक घी का दीपक जलाएं
अगले दिन हरि वासर समाप्त होने के बाद ही व्रत का पारण करें।
🤷🏻♀️ क्या हैं मान्यताएं
मान्यता है कि चातुर्मास के दौरान जगत के पालनहार भगवान विष्णु आराम करते हैं. देवशयनी एकादशी से भगवान शयन पर चले जाते हैं.
चातुर्मास में किसी भी शुभ या मांगलिक कार्य की मनाहि होती है वहीं, देवउठनी एकादशी के दिन चातुर्मास की समाप्ति होती है, जिसके बाद से सभी मांगलिक कार्य शुरु हो जाते हैं. वहीं, इस दिन तुलसी विवाह का भी आयोजन होता है. शालिग्राम भगवान से तुलसी की शादी की जाती है.
🌳 व्रत का इतिहास और तुलसी विवाह का महत्व
देव उठनी एकादशी के दिन व्रत रखा जाता है। इसके साथ ही भगवान विष्णु की विधिवत पूजा अर्चना की जाती है। इसके अलावा देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह का भी भव्य आयोजन होता है। इस दिन भगवान विष्णु को अति प्रिय तुलसी का विवाह भगवान शालिग्राम जी के साथ किया जाता है। हिंदू धर्म में कन्यादान का विशेष महत्व है। मान्यता है कि जिन लोगाें को कन्या नहीं होती है, वह तुलसी का विवाह करके कन्या दान का पुण्य अवश्य प्राप्त कर सकते हैं। शास्त्रों के अनुसार एकादशी व्रत पापों से मुक्ति दिलाने के साथ सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करता है। साल में 24 एकादशी यानी कि हर माह एक कृष्ण पक्ष में और एक शुक्ल पक्ष में एकादशी होती है। एकादशी व्रत का वर्णन महाभारत की कथा में भी हुआ है।


