धार्मिक

Today Panchang आज का पंचांग शनिवार, 05 अप्रैल 2025

आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
✦••• जय श्री हरि •••✦
🧾 आज का पंचाग 🧾
शनिवार 05 अप्रैल 2025
शनि देव जी का तांत्रिक मंत्र – ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।।
☄️ दिन (वार) -शनिवार के दिन क्षौरकर्म अर्थात बाल, दाढ़ी काटने या कटाने से आयु का नाश होता है । अत: शनिवार को बाल और दाढ़ी दोनों को ही नहीं कटवाना चाहिए।
शनिवार के दिन प्रात: पीपल के पेड़ में दूध मिश्रित मीठे जल का अर्ध्य देने और सांय पीपल के नीचे तेल का दीपक जलाने से कुंडली की समस्त ग्रह बाधाओं का निवारण होता है ।
शनिवार के दिन पीपल के नीचे हनुमान चालीसा पड़ने और गायत्री मन्त्र की एक माला का जाप करने से किसी भी तरह का भय नहीं रहता है, समस्त बिग़डे कार्य भी बनने लगते है ।
शिवपुराण के अनुसार शनि देव पिप्लाद ऋषि का स्मरण करने वाले, उनके भक्तो को कभी भी पीड़ा नहीं देते है इसलिए जिन के ऊपर शनि की दशा चल रही हो उन्हें अवश्य ही ना केवल शनिवार को वरन नित्य पिप्लाद ऋषि का स्मरण करना चाहिए।
शनिवार के दिन पिप्पलाद श्लोक का या पिप्पलाद ऋषि जी के केवल इन तीन नामों (पिप्पलाद, गाधि, कौशिक) को जपने से शनि देव की कृपा मिलती है, शनि की पीड़ा निश्चय ही शान्त हो जाती है ।
🔮 शुभ हिन्दू नववर्ष 2025 विक्रम संवत : 2082 कालयक्त विक्रम : 1947 नल
🌐 कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082,
✡️ शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), चैत्र
☮️ गुजराती सम्वत : 2081 नल
☸️ काली सम्वत् 5126
🕉️ संवत्सर (उत्तर) क्रोधी
☣️ आयन – उत्तरायण
☂️ ऋतु – सौर ग्रीष्म ऋतु
☀️ मास – चैत्र मास
🌗 पक्ष – शुक्ल पक्ष
📅 तिथि – शनिवार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि 07:26 PM तक उपरांत नवमी
📝 तिथि स्वामी – अष्टमी के देवता हैं रुद्र। इस तिथि को भगवान सदाशिव या रुद्रदेव की पूजा करने से प्रचुर ज्ञान तथा अत्यधिक कांति की प्राप्ति होती है। इससे बंधन से मुक्त भी मिलती है। यह द्वंदवमयी तिथि हैं।
💫 नक्षत्र – नक्षत्र पुनर्वसु 05:32 AM तक उपरांत पुष्य
🪐 नक्षत्र स्वामी – पुनर्वसु नक्षत्र के स्वामी ग्रह बृहस्पति हैं. इस नक्षत्र की देवी अदिति हैं।
⚜️ योग – अतिगण्ड योग 08:03 PM तक, उसके बाद सुकर्मा योग
प्रथम करण : विष्टि – 07:44 ए एम तक
द्वितीय करण – बव – 07:26 पी एम तक बालव
🔥 गुलिक काल : – शनिवार को शुभ गुलिक प्रातः 6: 53 से 8:19 बजे तक ।
⚜️ दिशाशूल – शनिवार को पूर्व दिशा का दिकशूल होता है ।यात्रा, कार्यों में सफलता के लिए घर से अदरक खाकर, घी खाकर जाएँ ।
🤖 राहुकाल -सुबह – 9:44 से 11:09 तक।राहु काल में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए |
🌞 सूर्योदयः- प्रातः 05:50:00
🌅 सूर्यास्तः- सायं 06:10:00
👸🏻 ब्रह्म मुहूर्त : 04:35 ए एम से 05:21 ए एम
🌇 प्रातः सन्ध्या : 04:58 ए एम से 06:07 ए एम
🌟 अभिजित मुहूर्त : 11:59 ए एम से 12:49 पी एम
🔯 विजय मुहूर्त : 02:30 पी एम से 03:20 पी एम
🐃 गोधूलि मुहूर्त : 06:40 पी एम से 07:03 पी एम
🏙️ सायाह्न सन्ध्या : 06:41 पी एम से 07:50 पी एम
💧 अमृत काल : 03:07 ए एम, अप्रैल 06 से 04:43 ए एम, अप्रैल 06
🗣️ निशिता मुहूर्त : 12:01 ए एम, अप्रैल 06 से 12:46 ए एम, अप्रैल 06
❄️ रवि योग : 05:32 ए एम, अप्रैल 06 से 06:05 ए एम, अप्रैल 06
🚓 यात्रा शकुन-शर्करा मिश्रित दही खाकर घर से निकलें।
👉🏼 आज का मंत्र-ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनयै नम:।
💁🏻 आज का उपाय-देवी मंदिर में सवाकिलो तिल का तेल दान करें।
🌳 वनस्पति तंत्र उपाय-शमी के वृक्ष में जल चढ़ाएं।
⚛️ पर्व एवं त्यौहार – भद्रा/ श्री दुर्गाष्टमी/ अशोकाष्टमी/ साईं बाबा उत्सव प्रारंभ (शिर्डी)/ अन्नपूर्णा पूजा (बंगाल)/ समता दिवस (जगजीवन राम का जन्म दिवस), राष्ट्रीय सामुदायिक दिवस, नेशनल मेरीटाइम दिवस, प्रख्यात भारतीय विदुषी महिला पंडिता रमाबाई स्मृति दिवस, सिक्खों के तीसरे गुरु गुरु अमरदास जयन्ती, राष्ट्रीय कार्रवाई दिवस (सभी के लिए प्रजनन स्वतंत्रता दिवस), बाबू जगजीवन राम जयंती, नेशनल हैंडमेड डे, राष्ट्रीय किशमिश दिवस, मसाला बार दिवस, सम्राट अशोक जयंती, सुपरहिट एक्ट्रेस दिव्या भारती पुण्य तिथि, अभिनेत्री रश्मिका मंदाना जन्म दिवस, अंतर्राष्ट्रीय विवेक दिवस, राष्ट्रीय समुद्री दिवस, विश्व हाथ स्वच्छता दिवस (World Hand Hygiene Day)
✍🏼 तिथि विशेष – अष्टमी तिथि को नारियल त्याज्य बताया गया है। अष्टमी तिथि बलवती अर्थात स्ट्रांग तिथि मानी जाती है। इसका मतलब कोई भी विकट कार्य आज आप कर-करवा सकते हैं। इतना ही नहीं अपितु अष्टमी तिथि व्याधि नाशक तिथि भी मानी जाती है। इसका मतलब आज आप कोई भी भयंकर रोगों के इलाज का प्रयत्न भगवान के नाम के साथ करेंगे-करवाएंगे तो निश्चित लाभ होगा। यह अष्टमी तिथि जया नाम से विख्यात मानी जाती है। यह अष्टमी तिथि कृष्ण पक्ष में मध्यम फलदायिनी मानी जाती है।
🏘️ Vastu tips 🏚️
ऐसी भूमि पर न बनाएं मकान अपना मकान या कार्यस्थल ऐसी जगह न बनाएं और न ही खरीदें जिसके उत्तर-पूर्व दिशा में ऊंचे भवन या पर्वत अथवा पीपल का पेड़ हो।
जिस भूखंड पर भवन बनाना हो, वहां कुछ दिनों के लिए गायों और बछड़ों को रखना चाहिए। उनके गोबर और मूत्र से वह भूमि शुद्ध हो जाती है। वास्तु के अनुसार भूमि कितने ही दोषों से परिपूर्ण हों लेकिन इनके प्रभाव से उत्तके सभी दोष नष्ट हो जाते हैं। इस भूमि पर निवास करने वाले जातक के धन, सुखों और सौभाग्य में दिन-प्रतिदिन बढ़ोत्तरी होती है।
भूमि में एक गड्ढ़ा खोदें और उसमें पानी भर दें। वहां से पूर्व दिशा की ओर 100 कदम चलें। यदि गड्ढे का पानी पूरा है, तो भूमि बहुत ही अच्छी है। यदि आधा शेष है तो भूमि मध्यम फल देने वाली है। यदि पानी पूरी तरह से सूख जाए, तो भूमि व्यक्ति के लिए भाग्यशाली नहीं है।
मिट्टी का रंग भी पहचान करने का अच्छा तरीका माना जाता है। भूमि की मिट्टी यदि पीली या सफेद है, तो वह बेहतर मानी जाती है। यदि लाल वर्ण की है, तो मध्यम और काले वर्ण की है, तो इसे दोषपूर्ण माना गया है।
♻️ जीवनोपयोगी कुंजियां ⚜️
नीम और लौंग का धुआं – मच्छरों का दुश्मन
नीम के पत्ते और लौंग जलाने से निकलने वाला धुआं प्राकृतिक रिपेलेंट की तरह काम करता है। मच्छरों को इसकी गंध बिल्कुल पसंद नहीं होती, जिससे वे घर के अंदर आने से बचते हैं। आप शाम को नीम के सूखे पत्तों को जलाकर इसका धुआं पूरे घर में फैला सकते हैं। इससे न सिर्फ मच्छर भागेंगे, बल्कि हवा भी शुद्ध होगी।
कपूर का धुआं मच्छरों के लिए सबसे असरदार प्राकृतिक उपायों में से एक है। एक कटोरी में कपूर रखकर उसे जलाएं और कमरे का दरवाजा-खिड़की कुछ देर के लिए बंद कर दें। कुछ ही मिनटों में सारे मच्छर भाग जाएंगे और वातावरण भी सुगंधित हो जाएगा।
🍁 आरोग्य संजीवनी ☘️
श्वसन तंत्र को मजबूत बनाता है
जीवंती का उपयोग अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, सर्दी-खांसी और सांस की तकलीफ जैसी श्वसन संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए किया जाता है। यह फेफड़ों को मजबूत करता है, कफ निकालने में सहायता करता है और स्वस्थ श्वसन तंत्र बनाए रखने में मदद करता है।
नेत्र रोगों में फायदेमंद जीवंती को आयुर्वेद में आंखों की रोशनी बढ़ाने और नेत्र विकारों को दूर करने के लिए बेहद उपयोगी माना जाता है। यह आंखों की सूजन, जलन और थकान को कम करने में सहायक होता है, जिससे दृष्टि में सुधार होता है।
स्त्री रोगों का रामबाण इलाज यह पौधा महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। यह मासिक धर्म की अनियमितताओं, सफेद पानी की समस्या (ल्यूकोरिया), गर्भधारण में कठिनाई और हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याओं के लिए फायदेमंद होता है। इसके सेवन से महिलाओं की प्रजनन क्षमता भी बढ़ती है।
📖 गुरु भक्ति योग_
🕯️
◆पुराणों की मंशा जो भी रही हो, काशी में देह त्याग की जन धारणा का अतीत में काशी के पंडित पण्डों ने बहुत ही दुरुपयोग किया। इसके लिए—
●काशी में मोक्ष दिलाने के नाम पर काशी में करवट लेने की अत्यन्त गुप्त पर क्रूर परम्परा भी अतीत में पंडों ने प्रचलित कर रखी थी।●
अंखियाँ हरि दरसन की प्यासी
देखन चाहत कमल नैनन कों निस दिन रहत उदासी ………
सूरदास प्रभु तुमरे दरस बिन लैहों करबट कासी।।
●बचपन में जब उक्त पद को हारमोनियम पर एक भजन के रूप में सीखा था तब हम संगीत की ताल व लय का आनन्द अधिक लेते थे और किंचित भक्ति रस का भी कुछ लाभ संयोग से मिल जाता होगा, उस भक्ति रस का तब अनुमान ही नहीं था।
पद में आए ‘करबट कासी” से अधिक मतलब नहीं था। बस इतना था कि काशी में देह त्याग की कोई पुरानी परम्परा थी जिसे सोलहवीं सदी के सूरदास जी ने शायद तुक मिलाने के लिए जोड़ दिया होगा।
◆बहुत बाद में पता चला कि काशी में ‘करवट’ एक विधि या प्रक्रिया थी
जिसमें मोक्ष की आकांक्षा वाले भक्त को कुएं के जगत पर किनारे पर लेटा कर करवट लेकर गिरने को कहा जाता था इस आश्वासन के साथ कि ऐसा करने पर भगवान स्वयं आकर उसे मोक्ष देंगे।
जब मुमुक्षु कुएं में गिर जाता था और बुरी तरह घायल होकर तड़फने लगता था तो पंडा उसे तड़फता छोड़ पर ऐसे मोक्ष के आकांक्षी का धन लेकर चल देते थे।
◆इसके अलावा काशी में रह कर मोक्ष के इच्छुक के लिए सलाह के रूप में प्रचलित एक कहावत भी पढ़ी थी:
राँड साँड सीढ़ी संन्यासी ।
इनसे बचे तो सैवे कासी।।
इस में से सीढ़ी से आशय मोक्ष के नाम पर बहला फुसला कर यजमान को अंधे कुएं में धकेलने से ही था। अर्थात इन दोनों पदों में भोले भाले यजमान की दुर्गति कहें या सद्गति का उल्लेख तो है।
◆कबीर ने इस धारणा का, कि काशी में देख त्याग से मोक्ष मिलता है, खण्डन करने के लिए जीवन भर काशी रहने के बाद अपने जीवन के आखिरी समय में काशी ही त्याग दिया।
लोक कथा यह है कि काशी के निकट मगहर ग्राम में एक बार सूखा पड़ा व इस अवर्षा से अकाल की स्थिति बन गई।
तब मगहर के नवाब साहब ने कबीर से विनती की कि आप जैसे संत के मगहर में आकर रहने मात्र से मगहर में पड़ रहा सूखा दूर हो जाएगा।
कबीर ने जब नवाब की बात मान ली तो उनके भक्तों ने कबीर के काशी छोड़ने का बहुत विरोध किया, बहुत अनुनय विनय भी की कि काशी नहीं छोड़िए।
यह भी कहा कि काशी में तो मोक्ष भी मिल जाएगा जबकि मगहर में तो आपको कष्ट कलेश ही रहेगा।
इस पर कबीर ने जो कहा वह उनके साहित्य में दर्ज है:
का कासी का ऊसर , राम हॄदय बस मोरा।
जो कासी तन तजै कबीरा, रामै कोन निहोरा।
●यदि काशी में ही तन तजूँगा तो राम के प्रति मेरे विश्वास का क्या होगा ?आशय यह कि राम नाम में आस्था विश्वास रखने से ही मोक्ष मिलेगा चाहे कहीं भी रहे व्यक्ति।आस्था होगी तो शिव जी वहीं आकर राम नाम का तारक मन्त्र कान में फूँक देंगे।
★★’काशी’ शरीर में ही एक स्थित नाड़ी केन्द्र
लिखा है कि शरीर स्थित वरणा और असी नामक दो सूक्ष्म नाड़ियों के संगम स्थल को ही वाराणसी कहा गया है।इन नाड़ियों के संगम में ध्यानस्थ होने पर ही मोक्ष मिलता है। हम जानते हैं कि काशी का एक नाम वाराणसी भी है।
★★ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविकहै कि: तो क्या पुराण मान्यता निराधार है?
◆मेरे विनम्र विचार से पुराण मान्यता निराधार नहीं है क्योंकि स्थान विशेष के गुरुत्वाकर्षण का और उस स्थान के सूक्ष्म जगत का कुछ न कुछ प्रभाव तो होता है जो मन को शांति देता है।
●ऐसे स्थान पर साधक की इच्छा वासनाएं शमित हो जाती हैं, भजन में मन लगता है और ‘अन्त मति सो गति’ गीता के इस कथन के अनुसार अगला जन्म सुधरता है।
●तीर्थ स्थली होने के कारण काशी में मन को सुधारने और इस प्रकार से परलोक सुधारने का संपूर्ण वातावरण मौजूद पहले भी था और आज भी मौजूद है यद्यपि आज इस वताववरण और सत संगति को खोज पाना निरन्तर कठिन से कठिनतर होता जा रहा है।
●यह सब होने पर भी इतना काफी नहीं मोक्ष पाने के लिए।
क्योंकि सभी शास्त्रों व गीता में भी कहा गया है कि
● जब तक पूर्वजन्मों के कर्म का खाता पूरी तरह शून्य नहीं हो जाता अर्थात कर्मों का निरसन, कर्मफल भोग कर नहीं हो जाता,
●अथवा संचित कर्म बीज, योगअग्नि से दग्ध नहीं हो जाते या
●भक्ति की अजस्र धारा में बह नहीं जाते या
●जब तक दुख सुख के प्रति समत्व का भाव स्थायी नहीं हो जाता और कर्तापन का अहंकार नष्ट नहीं हो जाता
★ तब तक तो काशी में भी मोक्ष की प्रतीक्षा ही करना होगी । ━━━━━━━ꕥ❈ꕥ❈ꕥ━━━━━━
⚜️ अष्टमी तिथि के देवता भगवान शिव भोलेनाथ जी माने जाते हैं। इसलिये इस अष्टमी तिथि को भगवान शिव का दर्शन एवं पूजन अवश्य करना चाहिए। आज अष्टमी तिथि में कच्चा दूध, शहद, काला तिल, बिल्वपत्र एवं पञ्चामृत शिवलिंग पर चढ़ाने से भगवान शिव की कृपा सदैव बनी रहती है। घर में कोई रोगी नहीं होता एवं सभी मनोकामनाओं की सिद्धि तत्काल होती है।।
मंगलवार को छोड़कर बाकि अन्य किसी भी दिन की अष्टमी तिथि शुभ मानी गयी है। परन्तु मंगलवार की अष्टमी शुभ नहीं होती। इसलिये इस अष्टमी तिथि में भगवान शिव के पूजन से हर प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती है। इस अष्टमी तिथि को अधिकांशतः विष्णु और वैष्णवों का प्राकट्य हुआ है। इसलिये आज अष्टमी तिथि में भगवान शिव और भगवान नारायण दोनों का पूजन एक साथ करके आप अपनी सम्पूर्ण मनोकामनायें पूर्ण कर सकते हैं।।

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