श्राद्ध पक्ष में कौवों का इंतजार, लेकिन दिखते नहीं! रेडिएशन और शहरीकरण से घट रही संख्या

सिलवानी। भारतीय संस्कृति में श्राद्ध पक्ष एक ऐसी परंपरा है, जिसमें हम अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज के साथ-साथ एक खास परंपरा है कौवे को भोजन कराना। मान्यता है कि जब तक कौवा श्राद्ध का भोजन नहीं ग्रहण करता, तब तक तर्पण अधूरा माना जाता है। लेकिन बदलते समय और पर्यावरणीय संकटों ने इस परंपरा को संकट में डाल दिया है। अब कौवों का दिखना ही दुर्लभ हो गया है।
रेडिएशन बन रहा कारण :
विशेषज्ञों के अनुसार, मोबाइल टॉवरों से फैलने वाला रेडिएशन न केवल मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, बल्कि पक्षियों की जीवनशैली और उनकी संख्या पर भी बुरा असर डाल रहा है। कौवे, जो कभी हर घर की मुंडेर और पेड़ों पर आसानी से नजर आ जाते थे, अब गिनी-चुनी जगहों पर ही दिखाई देते हैं। सिलवानी जैसे कस्बों में भी यह संकट अब साफ नजर आने लगा है।
कंक्रीट के जंगलों ने छीना बसेरा
तेजी से बढ़ते शहरीकरण और सीमेंट-कांक्रीट के जंगलों ने न सिर्फ इंसानों की सांसें घोंटी हैं, बल्कि पक्षियों से उनके प्राकृतिक बसेरे भी छीन लिए हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और खुली जगहों की कमी ने पक्षियों को शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया है। ऐसे में कौवों जैसे सामाजिक और मानव-सम्वेदनशील पक्षी अब विरले ही नजर आते हैं।
धार्मिक मान्यता और भावनात्मक जुड़ाव
भारतीय धर्मशास्त्रों में कौवों को विशेष स्थान प्राप्त है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम के श्राप के कारण कौवे श्राद्ध कर्म से जुड़े हैं। पौराणिक विश्वास यह है कि श्राद्ध का अन्न कौवे के माध्यम से पितरों तक पहुंचता है। यही कारण है कि श्राद्ध पक्ष में लोग कौवों के इंतजार में कई घंटे तक पत्तलों में अन्न परोसकर बैठते हैं, लेकिन आज स्थिति यह है कि कौवे दिखते ही नहीं।
कभी मेहमान आने का संकेत था कौवा
एक समय था जब कौवे की “कांव-कांव” सुनकर लोग अनुमान लगाते थे कि घर में मेहमान आने वाले हैं। ऐसे में कौवों को भगाने की कोशिश की जाती थी। लेकिन आज वही लोग श्राद्ध के समय इन्हीं कौवों के इंतजार में छतों और आंगनों में अन्न सजाए बैठते हैं, और मन मसोस कर रह जाते हैं।



