मड़ई, मेले हमें प्राचीन व लोक संस्कृति से जोड़ते हैं, उनकी इनमें झलक मिलती है

ब्यूरो चीफ : शब्बीर अहमद
बेगमगंज । सुल्तानगंज टप्पा की सबसे चर्चित एवं लोकप्रिय मंडई मेला बारह गांव के समीप माधौरा बाबा देवउठनी ग्यारस से शुरू होकर 3 दिन तक चलता है । यह नगर से करीब 12 किलोमीटर दूर है।
माधोरा का मंदिर पर ढाल का नृत्य होता है जो तांत्रिक लोग ढाल को चलाते हैं एक तांत्रिक ढाल को रोकता है दूसरा तांत्रिक ढाल को आगे बढ़ाता है तीसरा टॉप तांत्रिक ढाल को बैठाने की कोशिश करता है। तांत्रिकों का होता है मुकाबला और यह ग्यारस तक चलता है ग्यारस के दूसरे दिन माधोरा के मेले में श्रद्धालु पहुंचते हैं और ढाल नचाने वाले लोग मतलब तांत्रिक
(पंडा) लोग पहुंचते हैं ढाल वहां पर नाचती है बैठती है रूकती है चलती है ढाल का संचालन तांत्रिकों के द्वारा होता है उसके बाद मंदिर पर 1 साल के लिए ढाल रख दी जाती है ।
मेला में जैसीनगर, केसली, सिलवानी एवं क्षेत्रीय तहसील के हजारों की संख्या में लोग मेला देखने के लिए पहुंचते हैं अनेक लोग अपनी मन्नतें पूरी होने पर माधोरा बाबा के यहां ढाल लेकर पहुंचते हैं कुछ लोग यहां पर खिलौना के रूप में मुर्गी के बच्चे बकरी के बच्चे भी माधोरा बाबा छोड़कर जाते हैं।
मेले में क्षेत्रीय विधायक एवं पूर्व मंत्री ठाकुर रामपाल सिंह राजपूत, पूर्व विधायक वर्तमान जिला कांग्रेस अध्यक्ष देवेंद्र पटेल, प्रदेश कांग्रेस महामंत्री राजेंद्र सिंह तोमर, जिला पंचायत सदस्य राजा दिग्विजय सिंह व अन्य जनप्रतिनिधि भी पहुंचे और यहां से सिध्द स्थान पर पूजा अर्चना की तथा ढाल नृत्य मैं भी शामिल हुए।
जनप्रतिनिधियों ने अपने अपने संबोधन में कहा कि मेले हमें प्राचीन व लोक संस्कृति से जोड़ते हैं, उनकी इनमें झलक मिलती है हमारे बचपन की भी इससे कई स्मृतियां जुड़ी हैं। हालांकि तब से अब मेला कुछ बदल सा गया है, पर उसमें लोगों का उत्साह वैसा ही बना है, विशेषकर आदिवासी समुदाय का। हमारे इलाके में आदिवासी इसमें बढ़ चढ़कर मेले में शामिल होते हैं।
मेले में बड़ी संख्या में स्री पुरूष, युवा और बुजुर्ग जमा थे, नई रंग बिरंगी पोशाकों में। ग्रामीण जीवन में ऐसे मेलों से उत्साह का संचार होता है और लोक संस्कृति से जुड़ाव बनता है। मेला मिलने से बना है, मिलना, देखना, बातें करना और खरीदारी करना, लेकिन अब खरीदारी लोग नहीं करते, बच्चे गुब्बारे, खिलोने और मिठाईयां खरीदते दिखे। मेले में लोक सांस्कृतिक राई नृत्य बहुत ही ऊर्जा दे रहा था, जो भी वहां थे, सब मृदंग की थाप पर झूम रहे थे। उसमें सभी अपनी ताल मिलाते हैं, कोई दर्शक नहीं होता सब गाने व झूमने वाले होते हैं।
बांस की ढाल, जिसके एक सिरे पर मोर पंख की छतरी होती है। त्रिशूल, नारियल, और लाल रंग की पताकाएं, व सोटा, मंडई का आकर्षण थे. पंडे श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दे रहे थे, मोर पंख से झाड़ रहे थे|
ढालों को कमर में कसकर बांधे गठीले लोग नाचते गाते चले आ रहे थे, भीड़ के साथ आते ही माधौरा बाबा की परिक्रमा लगाकर ढाल को बाध देते हैं। गाजे बाजे के साथ कि दर्शक झूम उठे, उनके पैर भी थिरकने लगे।
मंडई हमेशा ही याद दिलाती है बचपन की जब हम हिडोलना में बैठकर झूला करते थे। यह उन पुराने दिनों की याद दिलाते हैं, जिन्हें हमारे पुरखों ने जिया था, इतिहास की झलक इसमें मिलती है। ऐसी लोक संस्कृति ही हमें अच्छी परंपराओं से जोड़े रखती है, भाईचारे व हेल-मेल की संस्कृति हमें नया जीने का उत्साह, हिम्मत व उम्मीद देती है।




