बुवाई से पहले मिट्टी परीक्षण जरूरी, उन्नत तकनीक से बढ़ेगा उत्पादन
चने की बुवाई का समय और तकनीक
सिलवानी । क्षेत्र में रबी की मुख्य फसलों में गेहूं और चना का उत्पादन सबसे अधिक है। अधिकांश किसान इन दोनों फसलों की बुवाई करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बुवाई से पहले मिट्टी का परीक्षण कराने से उत्पादन में वृद्धि की संभावना बढ़ जाती है। मिट्टी में पोषक तत्वों की मात्रा जानकर ही उचित फसल और उर्वरक का चुनाव किया जा सकता है, जिससे पैदावार अधिक होती है और मिट्टी की उर्वरक क्षमता बनी रहती है।
मिट्टी परीक्षण से पता चलता है कि मिट्टी में किस तत्व की कमी है और कौन सा तत्व पर्याप्त मात्रा में मौजूद है। इसके अनुसार ही फसल बोने और उर्वरक का चयन करने से फसल अधिक उपज देती है। उर्वरक उपयोग क्षमता का मतलब है कि प्रयोग किए गए उर्वरक से फसल अधिकतम लाभ दे और पोषक तत्वों की हानि न्यूनतम हो। इसका प्रभाव मिट्टी की किस्म, नमी, जलवायु (तापमान व वर्षा), फसल की किस्म और कृषि क्रियाओं पर निर्भर करता है।
खाद और उर्वरक का चयन: मृदा परीक्षण के बाद भूमि में जिस तत्व की कमी हो, उसी तत्व युक्त उर्वरकों का प्रयोग करें। सिलवानी क्षेत्र की मिट्टी कली होने के कारण नाइट्रोजन वाले उर्वरक उपयुक्त हैं। घुलनशील फास्फेटिक उर्वरक लाभकारी होते हैं। खेत में पिछली फसल और खाद का प्रयोग ध्यान में रखते हुए उर्वरकों का चुनाव करें।
वरिष्ठ कृषि विभाग अधिकारी सुनील मालवीय ने बताया कि मिट्टी परीक्षण, बीजोपचार, उर्वरक चयन और समय पर बुवाई से ही रबी की फसलों में अधिक उत्पादन संभव है।
विशेषज्ञों के अनुसार, चने की बुवाई के लिए 25 अक्टूबर से 5 नवंबर का समय सबसे उपयुक्त है। यदि बुवाई पिछड़ रही है, तो 25 नवंबर तक भी कर सकते हैं। उन्नत किस्म का बीज 30 किलो प्रति एकड़ चने की दर और 40 प्रति एकड़ गेहूं दर से बोना चाहिए। जड़गलन और उखेड़ा रोकने हेतु बीज को 10 ग्राम ट्राईकोडरमा हरजेनियम या 1.5 ग्राम कार्बेन्डाजिम (50 डब्ल्यूपी) प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें। दीमक प्रभावित खेतों में बीज को 2 मिली इमिडाक्लोप्रिड (17.8 एसएल) को 50 मिली पानी में घोलकर प्रति किलो बीज प्रयोग करें। पीएसबी और राइजोबियम कल्चर के स्ट्रेन एसजीएन 94 से बीजोपचार करने से उपज बढ़ती है।



