मध्य प्रदेश

गंदे नालों के पानी के कारण प्रदूषित हो रही जीवनदायिनी बीना नदी

ब्यूरो चीफ : शब्बीर अहमद
बेगमगंज । पिछले कुछ दशकों से नदियों में प्रदूषण कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ा है। यह गंभीर चिंता की बात इसलिए भी है कि इसका सीधा असर मनुष्य पर पड़ रहा है। अगर नदियां प्रदूषित हो जाएंगी और बचेंगी ही नहीं तो धरती पर हम रह कैसे पाएंगे। आज जिस तरह के हालात हैं और ज्यादातर नदियां प्रदूषण की मार झेलती हुई अपने दिन गिनती दिख रही हैं, क्षेत्र की जीवनदायिनी कहीं जाने वाली बीना नदी में शहर के करीब 1 दर्जन नालों से बहने वाला गंदा पानी बीना नदी के पानी को प्रदूषित कर रहा है यह बड़ी चेतावनी है।
भारतीय संस्कृति में आदिकाल से ही नदियों का विशेष महत्त्व रहा है। माना जाता है कि प्रात: पवित्र नदियों का स्मरण करने से मनुष्य को जीवन में सफलता मिलती है। यों भी सभ्यता के विकास में नदियों का अप्रतिम योगदान रहा है। भारतीय संस्कृति में तो वैसे भी नदियों को देवी के समकक्ष माना गया है। गंगा सहित अनेक नदियों की उत्पत्ति को देवताओं से जोड़ा गया है। नदियों के प्रवाह को दिव्य शक्तियों के अस्तित्व संबद्ध करने के मूल में मंतव्य कदाचित यही रहा होगा कि हम नदियों की महत्ता को स्वीकार करें।
मानव सभ्यता का विकास भी नदियों के किनारे ही हुआ। कालांतर में भी पानी की सहज उपलब्धता के कारण ही नदियों के किनारे बसी बस्तियों की बनावट घनी होती गई। धीरे-धीरे यही बस्तियां बड़े शहरों का रूप लेती गई। पृथ्वी पर मौजूद समस्त जल स्रोतों में से सनतानवे फीसद से अधिक हिस्सा खारे पानी का है और शेष में से अधिकांश हिमखंड के रूप में जमे हुए हैं।
इन्हीं जमे हुए जल स्रोतों से अधिकांश प्रमुख नदियां निकली हैं। धरती की आबादी का एक बड़ा हिस्सा पीने के पानी की उपलब्धता के लिए नदियों पर ही निर्भर है। यही कारण है कि प्राचीन काल में नदियों के प्रवाह की शुचिता को बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया जाता था। क्या कोई विश्वास करेगा कि ज्योतिष की एक सामान्य मान्यता के अनुसार नदियों के पानी में गंदगी डालने वाले व्यक्ति को मातृऋण का श्राप मिलता है।
इस मान्यता का मनोवैज्ञानिक तथ्य यही है कि लोग नदियों के पानी में गंदगी प्रवाहित नहीं करें। लेकिन हमने पारंपरिक मान्यताओं को नकार दिया और परिणाम यह हुआ कि जिन नदियों को कभी इतना पवित्र माना जाता था कि उनमें स्नान मात्र से ही जन्मों के पाप धुल जाने की मान्यताएं बलवती थीं, उन्हीं नदियों का पानी इतना प्रदूषित हो गया कि उनका पानी पीने लायक भी नहीं बचा।
इस स्थिति के मूल में दो अतिवादी कारण रहे। अत्यधिक तार्किक हो जाने की जिद में हमने परंपराओं को समझने की कोशिश करने के बजाय उनका अंधानुसरण प्रारंभ कर दिया। प्राचीनकाल में नदियों पर बने पुल से गुजरने वाले यात्री नदियों के प्रति अपनी श्रद्वा व्यक्त करने के लिए नदी के जल में कुछ सिक्के डाल दिया करते थे। यह वह दौर था जब सिक्के तांबे या चांदी के बने होते थे। तांबे और चांदी में पानी को शुद्ध करने का स्वाभाविक गुण रहता है।
आज बीना नदी की स्थिति यह है कि उसमें भरा हुआ गंदा पानी मवेशी पीने के लिए मजबूर हैं और बीमार हो रहे हैं। इसके सुधार की तरफ किसी ने आज तक ध्यान नहीं दिया है। शहर से निकलने वाले गंदे पानी को कोई एक जगह चिन्हित कर वहां एकत्रित करने का प्रयास किया जाना चाहिए ताकि शहर की जीवनदायिनी बीना नदी प्रदूषित ना हो पाए।
इस संबंध में क्षेत्रीय विधायक ठाकुर रामपाल सिंह राजपूत का कहना है कि शीघ्र ही इसकी व्यवस्था कराई जाएगी।

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