जमीन मंदिर की, मलाई काट रहा परसेल सरपंच, ग्राम पंचायत परसेल में बने राधा कृष्ण मंदिर का मामला मामला
खुद को घोषित किया है सरबराहकार
मंदिर की 20 एकड़ जमीन का मामला
रिपोर्टर : सतीश चौरसिया
उमरियापान । ढीमरखेड़ा तहसील अंतर्गत आने वाले ग्राम परसेल, राजस्व निरीक्षक मंडल उमरियापान के मौजा परसेल में काफी प्राचीन मंदिर राधा कृष्ण और महादेव मंदिर है जो की ग्रामीणों की आस्था का केन्द्र है लेकिन उक्त मंदिर देखरेख के आभाव में जीर्णक्षीर्ण हो रहा है और जर्जर अवस्था में पहुंच गया है। चूंकि जो व्यक्ति सरबराहकार की भूमिका में काम कर रहा है वह संपूर्ण राशि अपने खर्च में व्यय कर रहा है। ध्यान नहीं देने के कारण उक्त मंदिर के आसपास गंदगी भी फैली हुई है जिस कारण अब ग्रामीण अब वहां कम ही जाते है। चूंकि मंदिर होने के कारण अस्था केन्द्र है इसलिये लोगों मजबूरी में भी वहां पर जा रहे है।
उल्लेखनीय है कि ग्राम परसेल में बहुत ही प्राचीन राधा कृष्ण मंदिर एवं महादेव मंदिर है जिसमें राधा कृष्ण मंदिर के नाम से 16 एकड़ जमीन तथा महादेव मंदिर के नाम से 4 एकड़ जमीन है जिसमें आज भी राजस्व अभिलेखों में उक्त जमीन मंदिर के ना पर दर्ज है। उक्त दोनों मंदिरों की जमीन वर्तमान सरपंच राजेन्द्र खरे के पूर्वजों के द्वारा मंदिर को दान में दी गई थी जिसका उद्देश्य यह था जो कि उक्त जमीन से जो भी आय होगी उससे मंदिर की पूजा पाठ, पूजारी तथा मंदिर में होने वाले अन्य कार्यों में उसका उपयोग उपभोग किया जायेगा। जब तक राजेन्द्र खरे के पूर्वज थे तो उनके द्वारा ऐसा किया जाता था लेकिन जैसे ही उनका निधन हुआ तो विधि विरूद्ध तरीके से सरपंच राजेन्द्र खरे के द्वारा खुद को सरबराहकार घोषित किया गया और मंदिर की संपूर्ण 20 एकड़ जमीन पर अपना मालिकाना हक समझकर संपूर्ण राशि अपने खर्चे में व्यय की जाने लगी। इस संबंध में ग्रामीणों के द्वारा जब हिसाब मांगा जाता है तो उसके द्वारा हिसाब देने से मना कर दिया जाता है और मंदिर की जमीन जो लगभग 20 एकड़ है उससे मिलने वाली राशि न तो मंदिर में लगाई जाती है और न ही वहां पर लगे पुजारी को कोई तरह का कोई मानदेय आदि दिया जाता है। सरपंच राजेन्द्र खरे की मनमानी से ग्रामीण त्रस्त है और उसके द्वारा ऐसा नहीं करने से मंदिर भी जीर्णक्षीर्ण दशा में पहुंच गया है साथ ही आसपास गंदगी के ढ़ेर लगे हुये है जिससे राजेन्द्र खरे को कोई मतलब नहीं है।
दान की जमीन वापिस नहीं ली जा सकती।
म.प्र.भू-राजस्व संहिता 1959 के प्रावधानों के तहत यदि किसी भी जमीन को दान में दिया गया है तो उसे पुन: वापिस प्राप्त करने के कोई प्रावधान नहीं दिये गये है। इस संबंध में न्यायालय राजस्व मंडल ग्वालियर और म.प्र.उच्च न्यायालय जबलपुर के द्वारा कई ऐतिहासिक फैसले दिये गये है। साथ ही यह व्यवस्था भी दी गई है कि ऐसी भूमियों पर ट्रस्ट का अधिपत्य होकर शासन के अधीन रहेगी न की किसी व्यक्ति विशेष के अधीन बावजूद इसके खुद को सरबराहकार घोषित कर दोनों मंदिरों की 20 एकड़ जमीन को अपने अधिपत्य में रखा गया है और उक्त भूमियों को कृषि कार्य के लिये दिया जाता है जिससे जो भी राशि मिलती है उसका उपयोग/उपभोग राजेन्द्र खरे के द्वारा किया जाता है। मंदिर से किसी तरह का कोई सरोकार राजेन्द्र खरे का नहीं है। लिहाजा मंदिर में देखरेख नहीं होने के कारण मंदिर जर्जर अवस्था में पहुंच गया है।
इस संबंध में विंकी सिंहमारे अनुविभागीय अधिकारी, ढीमरखेड़ा का कहना है कि अधिकारियों को भेजकर इस संबंध में जानकारी ली जायेगी। कोई भी व्यक्ति खुद को सरबराहकार घोषित नहीं कर सकता है। मौका मुआयना के बाद आगामी कार्यवाही की जायेगी।



