मनुष्य जीवन का लक्ष्य समझे : कमलेश कृष्ण शास्त्री
रिपोर्टर : शिवकुमार साहू
सिलवानी। ग्राम सियरमऊ में चल रही श्री गणेश पुराण कथा में पं.कमलेश कृष्ण शास्त्री महाराज तिन्सुआ वाले बेगमगंज ने कहा कि शरीर नश्वर और नित्य परिवर्तनशील है, लेकिन यह शरीर उच्च लक्ष्यों को प्राप्त करने का साधन भी है। यह परम सत्य की प्राप्ति का एकमात्र साधन है। इसलिए अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहें। जीवन में प्रगति के लिए सबसे पहले आवश्यक है एक लक्ष्य सुनिश्चित करना। उन्नति के लिए समय का प्रबन्धन जरूरी है। पुस्तकों व स्वाध्याय के लिए समय निकालें, व्यायाम जरूरी करें, गाय की श्वास और सूर्य को अर्घ्य लक्ष्मी प्रदान करने वाले व स्वस्थ तन का द्योतक हैं। उन्होंने कहा कि वेद का अध्ययन व साधु वाणी श्रवण अवश्य करें। वर्तमान में लोग कामना, वासना व अनियमित जीवनशैली के कारण जीवन को कष्टकारी बना रहे हैं। जबकि जीवन दुर्लभ है। उन्होंने कहा कि लोगों की लालसा रहती है कि धन सम्पदा और ऐश्वर्य मिले, लेकिन ये तीनों चीजें त्याग, संयम और सत्य को आत्मसात करने पर ही मिलती हैं। जो मनुष्य धर्म का अनुशीलन करते हैं, यथार्थ में वे ही मनुष्य हैं। और, जो आहार, निद्रा, भय व मैथुन आदि में रत हैं, वे मनुष्य शरीर में पशु हैं। अत: मनुष्य जीवन प्राप्त होने पर धर्मज्ञान प्राप्त करना प्रधान कर्तव्य है। प्रभु ने असीम कृपा कर मानव को वह शक्ति दी है, जिससे उन्नति की चरम सीमा पर पहुँचा जा सकता है। इसी साधना-क्षमता के कारण मनुष्य सृष्टि की श्रेष्ठतम रचना है। जन्म लेना और फिर अपनी शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करते-करते मर जाना जीवन की परिभाषा नहीं है, मनुष्य जीवन की तो कतई नहीं। मनुष्य के रूप में जन्म की शास्त्रों में प्रशंसा ऐसे ही नहीं की गई है। देवता भी मनुष्य जीवन प्राप्त करने को तरसते हैं। इसका कारण है, इस जीवन में छिपी अनन्त संभावनाएँ। स्वयं को सही रूप में जानना इस जीवन की सफलता है। इसे आत्म-साक्षात्कार, ईश्वर दर्शन, मुक्ति, निर्वाण, इष्ट प्राप्ति आदि कई नामों से संबोधित किया जाता है। आत्मोन्नति ही मनुष्य का ध्येय है, लक्ष्य है। इस आत्मोन्नति का मूल साधन ‘धर्म’ है। धर्म के बिना जीवन शून्य है। धर्मत्व जीवन का नियामक है। धर्म ज्ञान होने से ही मनुष्य अन्य सभी प्राणियों से श्रेष्ठ है।



