धार्मिक

श्री दादा दरबार, साईंखेडा में नानी बाई के मायरे की कथा प्रारंभ

रिपोर्टर : कमलेश अवधिया
साईखेड़ा । श्री १००८ श्री दादा दरबार, गाडरवारा रोड, साईंखेडा में दिनांक 1 अप्रैल से नानी बाई के मायरे की कथा प्रारंभ हो गई है
विदित हो, साईंखेड़ा क्षेत्र में नानी बाई के मायरे की कथा पहली बार आयोजित हो रही है, दादा दरबार में प्रत्येक वर्ष पुराणों की कथा का आयोजन किया जाता है एवं इस वर्ष दरबार में नवनिर्मित आकर्षक भव्य सत्संग हाल का निर्माण हुआ है जिसमे कथा का आयोजन किया जा रहा है
सोमवार को गुरु महाराज श्री छोटे सरकार जी एवं श्री धाम वृंदावन से कथा वाचक पुज्या कृष्णप्रिया जी का आगमन हुआ एवं दोपहर 3 से सायं 7 बजे तक कथा का प्रवचन हुआ
कथा के साथ साथ साथ पूरे दिन दरबार में वेदपाठ, श्री शंकर भगवान का रुद्राभिषेक, दादाजी महाराज की आरती, भजन सत्संग का दौर चलता रहा।
प्रथम दिवस की कथा में कथावाचक कृष्णप्रिया जी ने नानी बाई का मायरा की कथा का अर्थ बताया नानी बाई का मायरा भक्त नरसी की भगवान कृष्ण की भक्ति पर आधारित कथा है जिसमें ’मायरो’ अर्थात ’भात’ जोकि मामा या नाना द्वारा कन्या को उसकी शादी में दिया जाता है वह भात स्वयं श्री कृष्ण लाते हैं, आगे की कथा में कथावाचक कृष्णप्रिया जी भक्ति एवं प्रभुकृपा का वर्णन करते हुए बताया
मै आपसे कितना भी कहूँ। ये कीजिये, ठाकुरजी ऐसे भक्ति ऐसी, इतना आनंद, आपको कुछ फर्क नही पड़ने वाला। जबतक कि आप उसका रस चख नही लेंगे। अब मैं कहूँ आपने कभी जीवन में रसगुल्ला ही नही खाया हो और मैं आपसे कहूँ कि रसगुल्ला तो इतना मीठा है भईया इतना अच्छा है. इतना अंदर से मुलायम होता है कि जीभ पर डालो और बिल्कुल पिघल जाए ऐसा रसगुल्ला है। अब आप कहेंगे कि हमने तो खाया ही नही है। मैं कहूं शक्कर जैसा मीठा है तो आप कहें शक्कर भी नहीं खाई। मै कहूँ जलेबी जैसा मीठा है तो आप कहेंगे जलेबी भी नहीं खायी। तब तक पता नही चलेगा जब तक रसगुल्ला अपने मुँह में नही डाल लोगे। और वो डाला नही कि आपको उसकी मिठास, स्वाद का अपने आप अनुभव होने लगता है। भक्ति भी यही है। किसी के कहने से वो जीवन मे नही आती। प्रभु कृपा से सुलभ होते हैं। और जब आती है तो फिर जो अनुभव कर रहा होता है वो कहने लायक बचता नही है। वो बता नही सकता कि वो किस आनंद में है। संसार वालों को भले ही वो संसार से दिख रहा हो कि वो दुख में हैl लेकिन वो एक अलग आनंद में होता है जो आनंद बड़े बड़े महलो में, बड़े बड़े साधनो में नही मिलता। पागल नही है वो संत जो दुनिया दारी की सारी चीज़ें छोड़कर के एकांत मे कुटिया बनाकर रहते हैं। जिन चीजों के लिए हम परेशान होते हैं वो हमें घर मे अच्छा नही मिला तो हम छोड़ छाड़ कर चले जाते हैं। होता हैं न माताओ का कभी घर में लड़ाई झगड़ा हो जाये, अगर कुछ चीज मनपसन्द की नही मिली तो कुछ माताएं चली जाती है पीहर। पर होता है कई बार देखने को मिलता है कुछ चीजे नही मिली तो गुस्सा आता है। जो चीज के लिये प्रयास कर रहे हैं। वो चीज अगर हासिल नही हुई। मेहनत करने के बाद भी।। तो भी गुस्सा आता है ये चीज नही मिली। जिन चीजो के लिए हम सोचते हैं कि बेकार ह ये जीवन अगर ये चीज ना रहे तो। अगर घर नही रहा परिवार नही रहा, ये सुख सुविधाएं नही रही तो सब बेकार है जीवन मे। और वही उन सुख सुविधाओं को छोड़कर एकांत मे बैठकर हरि का भजन करते हैं। आप बाजार, मेले, सिनेमा आदि सब देखने जाते हैं वो इन सबसे मुह मोड़कर अलग बैठे हैं अलग ही आनंद में बैठे हैं। इसका मतलब क्या है! उन्होंने वास्तविक आनंद को जान लिया है। ये जो सुख हैं ये आपको कुछ देर खुश कर सकते हैं। हो सकता है घण्टा, डेढ़ घण्टा, चार घण्टे। लेकिन आपके जीवन को नही बदल सकते। आपके जीवन को प्रसन्न नही कर सकते। लेकिन प्रभु का नाम, प्रभु की भक्ति ऐसी है जो करता है चौबीसो घण्टे आनंद में रहता है। उसे दुख दुख नही लगते। दुख तो यहाँ भक्त तो छोड़ो, साधारण इंसान तो छोड़ो, परमात्मा को भी इस दुखालयं शाश्वतम में दुःखों का सामना करना पड़ा है। क्यों करना पड़ा, जिससे भक्त जाने कि जब मैं कर सकता हूँ तो तुम क्यों नहीं कर सकते । क्योंकि कर्म को भोगने के लिए ही ये संसार है।
श्री दादा दरबार परमार्थ ट्रस्ट के द्वारा सभी धर्मप्रेमी बंधु भगनियो से कथा रसपान कर धर्म लाभ उठाने का निवेदन किया गया है।

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