महिला आरक्षण विधेयक में उप-कोटा की आवश्यकता क्यों है : ऋचा पटेल
ओबीसी महिलाओं का दोहरा नुकसान
ब्यूरो चीफ : भगवत सिंह लोधी
हटा। मेरे बचपन में मैं अपनी मां के सबसे नजदीक थी, मेरी मां स्कूल नहीं गई, न ही उनके अभिभावक, जब अब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं तो पाती हूं की उस पूरे कृषक परिवार में कल्चरल कैपिटल थी ही नहीं जिसकी एक परिवार के समग्र विकास में जरूरत होती है। मैं अपने पूरे बचपन में सात आठ साल की उम्र तक अपनी मां के ही आगे पीछे घूमती रहती, हर सवाल उससे पूछती मेरे बहुत सारे सवाल हुआ करते थे, मां अपने हिसाब से मेरे सवालों के जवाब देती।
उक्ताशय के विचार ओबीसी महासभा महिला मोर्चा प्रदेश अध्यक्ष ऋचा पटेल ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि एक परिवार में एक मां ही सब कुछ होती है,वह जैसी होगी उसका पूरा परिवार वैसा ही होगा उसके बच्चे वैसे होंगे। मेरी मां दिन भर मेहनत करती,गाय को पानी पिलाना, सानी चलाना, गोबर फेंकना, फिर घर का काम करना, मैं अपनी मां के पीछे-पीछे घूमती रहती। जो कल्चरल कैपिटल मेरी मां के पास थी वही कमोबेश मुझे भी ट्रांसमिट हुई और वह मेरे ज्ञान के विकास में नाकाफी थी। एक उच्च जाति की पीएचडी महिला का बेटी और एक किसान अनपढ़ महिला के बेटी में जमीन आसमान का फर्क होता है, मेरी मां दिन भर मेहनत करती, मेरी मां जैसी ओबीसी की महिलाये कभी उच्च जाति की महिलाओं के साथ कंपटीशन नहीं कर सकती हैं, जब तक कि उनको बराबरी का प्लेटफार्म न उपलब्ध कराया जाए। महिला आरक्षण विधेयक, जिसका लक्ष्य संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करना है, 1996 में पहली बार पेश किए जाने के बाद से लगभग 27 वर्षों से लंबित है। इस विधेयक को विभिन्न हलकों से विरोध का सामना करना पड़ा है, खासकर उन पार्टियों से जो महिलाओं के लिए समग्र आरक्षण के भीतर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए उप-कोटा की मांग करती हैं। उनका तर्क है कि उप-कोटा के बिना, विधेयक केवल उच्च जाति की महिलाओं को लाभ पहुंचाएगा और ओबीसी महिलाओं को हाशिए पर धकेल देगा, जिनका पहले से ही राजनीति और समाज में कम प्रतिनिधित्व है और उनके साथ भेदभाव और उनकी वंचना और बढ़ जाएगी। ओबीसी महिलाओं के लिए उप-कोटा की मांग अनुचित नहीं है, यह देखते हुए कि उन्हें अपनी जाति और लिंग के कारण कई नुकसानों का सामना करना पड़ता है। 2011 की जनगणना के अनुसार, ओबीसी भारत की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा हैं, लेकिन संसद और राज्य विधान सभाओं में उनका प्रतिनिधित्व उनके अनुपात से बहुत कम है। इसके अलावा, ओबीसी महिलाओं को दोहरे भेदभाव का सामना करना पड़ता है क्योंकि वे उच्च-जाति, पितृसत्ता और अंतर-जातीय पितृसत्ता दोनों द्वारा उत्पीड़ित होती हैं। वे कम साक्षरता, उच्च गरीबी, खराब स्वास्थ्य, हिंसा और संसाधनों और अवसरों तक पहुंच की कमी से पीड़ित हैं। उन्हें ऊंची जाति और अपने वर्ग की दूसरी जातियों व दोनों समुदायों से सामाजिक कलंक और बहिष्कार का सामना करना पड़ता है।इसलिए, ओबीसी महिलाओं को राजनीतिक क्षेत्र में उनका उचित और पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए महिला आरक्षण विधेयक के भीतर एक उप-कोटा की आवश्यकता है। एक उप-कोटा न केवल उन्हें अपनी चिंताओं और हितों के बारे में आवाज उठाने के लिए सशक्त बनाएगा, बल्कि उन्हें उन प्रमुख आख्यानों और संरचनाओं को चुनौती देने में भी सक्षम बनाएगा जो उन पर अत्याचार करते हैं उन्हें सम्मान से वंचित करते हैं। उप-कोटा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विविधता और समावेशन के लिए भी जगह बनाएगा, क्योंकि ओबीसी महिलाएं अपने अद्वितीय दृष्टिकोण और अनुभवों को सामने ला सकती हैं। एक उप-कोटा अधिक ओबीसी महिलाओं को राजनीति में भाग लेने और नेतृत्व की भूमिकाओं की आकांक्षा करने के लिए प्रेरित करेगा।महिला आरक्षण विधेयक भारतीय राजनीति और समाज की लिंग और जातिगत गतिशीलता को बदलने का एक ऐतिहासिक अवसर है। हालाँकि, इसे महिलाओं के विभिन्न समूहों के बीच एक बनावटी सशक्तिकरण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि सभी महिलाओं के लिए समानता और न्याय प्राप्त करने के सामूहिक प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए। महिला आरक्षण विधेयक के भीतर ओबीसी महिलाओं के लिए उप-कोटा कोई विभाजनकारी या भेदभावपूर्ण मांग नहीं है, बल्कि एक वैध और आवश्यक मांग है। अब समय आ गया है कि सरकार ओबीसी महिलाओं की आवाज सुने और उप-कोटा प्रावधान वाला विधेयक पारित करे!



