29 जून 2023: देवशयनी एकादशी कल, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि
Astologar Gopi Ram : आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
◈〣• जय श्री हरि •❥〣◈
👣 29 जून 2023: देवशयनी एकादशी कल, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि
🧾 हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। साल भर में पड़ने वाली 24 एकादशियों में से देवशयनी एकादशी काफी खास होती है, क्योंकि इस एकादशी से ही भगवान विष्णु अगले चार माह के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं और सृष्टि के संचार का काम भगवान शिव को सौंप जाते हैं। भगवान विष्णु के शयन के कारण इसे देवशयनी एकादश कहते हैं। इसके अलावा इसे पद्मा एकादशी, आषाढ़ी एकादशी, हरिशयनी एकादशी के नाम से जानते हैं। इस एकादशी के साथ ही चातुर्मास आरंभ हो जाएगा, जो प्रबोधिनी एकादशी के साथ समाप्त होगा। जानिए आचार्य श्री गोपी राम से देवशयनी एकादशी का शुभ मुहूर्त, पारण का समय, पूजा विधि
🐚 देवशयनी एकादशी 2023 शुभ मुहूर्त
🔹 एकादशी तिथि प्रारंभ – जून 29, 2023 को 03:18 ए एम बजे
🔹 एकादशी तिथि समाप्त – जून 30, 2023 को 02:42 ए एम बजे।
💧 देवशयनी एकादशी व्रत का पारण
🔹 व्रत पारण का समय- 30 जून को दोपहर 1 बजकर 48 मिनट से 4 बजकर 36 मिनट तक
🤷🏻♀️ देवशयनी एकादशी 2023 महत्व
हिंदू धर्म में देवशयनी एकादशी का विशेष महत्व है, क्योंकि इस दिन से अगले चार मास के लिए भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं। इसके साथ ही मांगलिक और शुभ कार्यों में पाबंदी लग जाती है। हालांकि, पूजा-अनुष्ठान के अलावा गृह प्रवेश, वाहन-ज्वैलरी खरीदने की मनाही नहीं होती है। देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से हर संकट दूर हो जाते हैं और पापों का नाश हो जाता है। इसके साथ ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, इस व्रत को करने से सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है।
देवशयनी एकादशी सबसे महत्वपूर्ण एकादशी व्रतों में से एक है जिसे पहली एकादशी के रूप में भी मनाया जाता है। इस एकादशी को पूरी श्रद्धा भाव के साथ जो व्यक्ति रखता है, तो उसे सुखी, समृद्ध और शांतिपूर्ण जीवन का आशीर्वाद मिलता है। सांसारिक सुखों को भोगने के बाद वे अंत में मोक्ष प्राप्त करता है।
📡 देवशयनी सभी तरह के शुभ कार्य बंद
पुराणों में वर्णन है कि भगवान विष्णु इस दिन से चार महीने (चातुर्मास) पाताल में राजा बलि के द्वार पर रहते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को लौटते हैं। इस उद्देश्य से, इस दिन को देवशयनी कहा जाता है। इस काल में, यज्ञोपवीत संस्कार, विवाह, दीक्षा, यज्ञ, गृहप्रवेश और किसी भी प्रकार के शुभ कार्य त्याज्य हैं। भविष्य पुराण, पद्म पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, हरिशयन को योगनिद्रा कहा गया है।
शास्त्रो के अनुसार, हरि शब्द का कई अर्थों में किया जाता है जैसे सूर्य, चंद्रमा, वायु, विष्णु आदि। हरिशयन का अर्थ है कि इन चार महीनों में बादल और बारिश के कारण, सूर्य और चंद्रमा की कमी के कारण, यह उनके शयन का संकेत है। इस समय, पित्त स्वरूप आग गति की शांति के कारण, शरीर की ऊर्जा कमजोर हो जाती है या सो जाती है।
⚛️ देवशयनी एकादशी पूजा-विधि
🪙 सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।
🪙 घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें।
🪙 भगवान विष्णु का गंगा जल से अभिषेक करें।
🪙 भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें।
🪙 अगर संभव हो तो इस दिन व्रत भी रखें।
🪙 भगवान की आरती करें।
🪙 भगवान को भोग लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है। भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें।ऐसा माना जाता है कि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग ग्रहण नहीं करते हैं।
🪙 इस पावन दिन भगवान विष्णु के साथ ही माता लक्ष्मी की पूजा भी करें।
🪙 इस दिन भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करें।
💎 देवशयनी व्रत का फल
ब्रह्मवैवर्त पुराण में देवशयनी एकादशी की विशेष महिमा बताई गई है। इस व्रत से प्राणी की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। व्रती के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यदि आप व्रती चातुर्मास का पालन करते हैं, तो एक महाफल प्राप्त होता है।
🗣️ देवशयनी एकादशी कथा
पौराणिक कथा के मुताबिक, बहुत समय पहले मान्धाता नाम का एक राजा था. राजा काफी अच्छा और नेक दिल था जिस कारण उसकी प्रजा हमेशा उससे काफी खुश और सुखी रहती थी. एक बार, राज्य में 3 साल तक बारिश नहीं पड़ी. इससे राज्य में अकाल की स्थिति उत्पन्न हो गयी. जो प्रजा पहले खुश रहा करती थी वो अब निराश और दुखी रहने लग गई. अपनी प्रजा का ये हाल देखकर राजा ने अपनी प्रजा को इस दुःख से निकालने का उपाय निकालने के लिए जंगल में जाना उचित समझा. जंगल में जाते-जाते राजा अंगिरा ऋषि के आश्रम पहुँच गया!
ऋषि ने राजा से उनकी परेशानी की वजह पूछी तो राजा से सारा दुःख ऋषि के सामने जाहिर कर दिया. तब ऋषि ने राजा को आषाढ़ी एकादशी का व्रत रखने की सलाह दी. ऋषि की बात मानकर राजा वापिस अपने राज्य लौट आया और अपनी प्रजा से इस व्रत को निष्ठापूर्ण करने की सलाह दी. व्रत और पूजा के प्रभाव का असर कुछ ऐसा हुआ कि राज्य में एक बार फिर से वर्षा हुई जिससे पूरा राज्य एक बार फिर धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया।


