धार्मिकमध्य प्रदेश

बरेदी नृत्य, सजी धजी गायों की पूजा, दशहरा मैदान में हुआ आयोजन

ब्यूरो चीफ : शब्बीर अहमद
बेगमगंज । दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा और सजी-धजी गायों को एक जगह एकत्रित करके बरेदी नृत्य के बाद पूजा अर्चना का कार्यक्रम परंपरागत अनुसार दशहरा मैदान में आयोजित किया गया, जहां पर विभिन्न इलाकों से गायों को सजा धजा कर बाजे गाजे के साथ नृत्य करते हुए टोलियां दशहरा मैदान पहुंचे और वहां पर सभी ने अपनी नृत्य कला का प्रदर्शन कर वाहवाही लूटी। यहां पर सामूहिक रूप से गाय की पूजा की गई और दरोई बब्बा के चबूतरे पर बरेदियों एवं पशु पालकों द्वारा पूजा अर्चना की गई।
क्षेत्र के विभिन्न इलाकों में अहीर यानि ग्वाले जाति के लोगों ने दिवाली के तीसरे दिन पारंपरिक वेशभूषा में लोकगीत गाकर लोगों को त्योहार की शुभकामनाएं दी। कहा जाता है कि इस नृत्य की परंपरा द्वापर युग में शुरू हुई, जब भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया और गोकुल- वृंदावन के लोगों की रक्षा की। इसी दौरान वहां ग्वालों ने इस खुशी में नृत्य किया और तब से बदस्तूर बरेदी नृत्य की परंपरा चली आ रही है। क्षेत्र में भी यह परंपरा प्राचीन है जो अब धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है कम ही लोग बचे हैं जो बरेदी नृत्य की कला में पारंगत हैं वे प्रत्येक वर्ष दीपावली के अवसर पर इस कला का प्रदर्शन कर इसे जीवंत बनाए हुए हैं।
दीपावली के बाद मवेशी चराने वाले अथवा ग्वाले उन घरों में गए, जहां के पशुओं को वह दुहने या चराने ले जाते हैं. इस दौरान उन्होने नृत्य करते हुए बुंदेलखंडी भाषा में दिवारी गाकर सबको शुभकामनाएं दी। जिन घरों में वे गए, वहां से उन्हें उपहार और मिठाईयां प्रदान की गई । यह लोकनृत्य बरेदी प्राचीन परंपरा के रूप में जीवित है, हालांकि समय के साथ इस नृत्य को करने वाले धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं।
दशहरा मैदान में आयोजित कार्यक्रम के अलावा बीना नदी किनारे सुरई घाट पर भी यह कार्यक्रम आयोजित किया गया, ग्रामीण क्षेत्रों में भी कार्यक्रम आयोजित किए गए। विभिन्न मोहल्लों में भी छोटे स्तर पर कार्यक्रम किए गए ।सभी जगह बरेदी नृत्य में नर्तक भगवान श्रीकृष्ण की बाल्य अवस्था से लेकर युवा अवस्था तक की लीलाओं को प्रस्तुत किया देखने वालों ने उनकी कलाओं को सराहते हुए उत्साह वर्धन किया। विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के जनप्रतिनिधि भी कार्यक्रम में पहुंचे और कलाकारों का हौसला बढ़ाया।

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