मध्य प्रदेशराजनीति

भोजपुर की जंग, दिग्गजों के सूखे कंड, जीतों या मरो बड़ी चुनौती काँग्रेस के लिए, भाजपा में क्षेत्रीय उम्मीदवार की मांग तेज

रिपोर्टर : विनोद साहू
बाड़ी । मध्यप्रदेश की 230 विधानसभाओं में सबसे चर्चित और दिल्ली तक अपनी पहचान रखने वाली भोजपुर विधानसभा (141)अब अपने अस्तित्व को खो चुकी। 1967 में विधानसभा बनने के बाद लगातार दो बार काँग्रेस ने जीत हासिल की 1977 के बाद 1985 तक जनसंघ फिर भाजपा के कब्जे में रही भाजपा के इस अभेद गढ़ को भेदने के लिए काँग्रेस ने ऐड़ी चोटी का जोर लगाया इसके लिए काँग्रेस ने काँग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री रहे अर्जुनसिंह की निगरानी में असलम शेर खाँ , अकबर खाँन, राजकुमार पटेल बकतरा, अजयसिंह (राहुल भैया) भूपतसिंह पटेल (देहरी) विजय धाकड़, सालिगराम श्रीवास्तव, के बाद राजेश पटेल देहरी बालों ने 2003 में इस अभेद किले को भेद कर सुरेंद्र पटवा को हराया लेकिन दूसरे चुनाव में राजेश पटेल देहरी सुरेंद्र पटवा से मात खा गये और पुनः भाजपा का अभेद किला सुरक्षित हो गया, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और मध्यप्रदेश काँग्रेस के कद्दावर नेता सुरेश पचौरी इस 2013 और 2018 में हार चुके ।
नये समीकरणों में भी काँग्रेस छत्रपों में उलझी ?
देश इस समय महँगाई बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के चुंगल में फंसकर छपटा रहा हैं मध्यप्रदेश की अठारह साल की सरकार में क्षेत्र विकास से अछूता नजर आ रहा हैं ग्रामीण क्षेत्रों में वर्तमान विधायक के विरुद्ध नाराजगी की तस्वीरे दिखाई दे रही हैं तो बहीं काँग्रेस इस सुनहरे अवसर पर भी छत्रपों के बीच झटपटा रही हैं । जन चर्चा हैं कि मंडीदीप काँग्रेस कार्यकर्ताओं की बैठक में सुरेश पचौरी ग्रुप अपने उम्मीदवार की उम्मीदवारी चाहता हैं तो बहीं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपने उम्मीदवार को भरोसा दे चुके नतीजतन आज एक अक्टूबर को भी न भाजपा ने पत्ते खोले और न ही काँग्रेस अपने उम्मीदवार को घोषित कर पा रही हैं ।
भाजपा में स्थानीय उम्मीदवार की माँग तेज।
शहर के वरिष्ठ भाजपा नेता जोधासिंह अटवाल क्षेत्र में भाजपा के संस्थापक सदस्यों में माने जाते हैं उन्होंने भी पिछलीबार अपनी दावेदारी ठोकी थी और उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार लड़ने के लिए कमर कस चुके थे, लेकिन मुख्यमंत्री शिवराजसिंह जी ने उन्हें मनाया और भाजपा के पक्ष में जिम्मेदारी सौंपी नतीजतन जो भाजपा कभी बाड़ी पोलिंग नहीं जीती बह भी दो हजार से विजय हुई और सुरेश पचौरी की हार का आँकड़ा बढ़कर उन्तीस हजार पर पहुँच गया। अगर इस बार भाजपा ने स्थानीय उम्मीदवार को वरियता नहीं दी तो यह सीट खो सकती हैं।

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