मध्य प्रदेश

मप्र पशुपालन निगम का कारनामा: सीएम के गृहनगर उज्जैन में करोड़ों का कागजी नाइट्रोजन प्लांट

12 से 24 जुलाई तक विदेश यात्रा पर एमडी, 30 को हो जाएंगे रिटायर
मप्र पशुपालन निगम ने बिना प्लांट लगे ही कर दिया ठेका कंपनी को पेमेंट

ब्यूरो चीफ : शब्बीर अहमद
भोपाल। एक ओर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव प्रदेश के किसानों और पशुपालकों की खुशहाली के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं, तो दूसरी ओर मप्र पशुपालन निगम मुख्यमंत्री के ही गृहनगर में नाइट्रोजन प्लांट लगे बिना ही करोड़ों रुपए पेमेंट कर चुका है। चौंकाने वाली बात है कि निगम के प्रबंध संचालक डॉ. एचएस भदौरिया 30 जुलाई को रिटायर हो जाएंगे, लेकिन 12 से 24 जुलाई तक न्यूजीलैंड सहित तीन देशों की यात्रा पर जा रहे हैं। ताकि विदेशों से प्लांट की कार्यपद्धति को समझ सके, जबकि इसके पहले बीते साल तत्कालीन मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस इसी तरह के विदेश यात्रा के प्रपोजल को कड़ी टिप्पणी के साथ नकार चुके हैं।
दरअसल मप्र पशुपालन निगम ने न्यूजीलैंड की स्टर्लिंग कंपनी को करीब सवा पांच करोड़ रुपए में उज्जैन में तरल नत्रजन संयंत्र लगाने का ठेका दिया है। इसके लिए अभी तक उज्जैन में सेंट पाल स्कूल के पास, आगर रोड स्थित पशुपालन निगम की जमीन पर नाइट्रोजन प्लांट लगाने के लिए भवन निर्माण का काम ही चल रहा है। वहीं बाहर पालीथीन में लिपटा हुई प्लांट की मशीनरी पड़ी है। सूत्रों की माने तो इसके लिए अभी तक 3 करोड़ रुपए का पेमेंट भी स्टर्लिंग कंपनी को किया जा चुका है, जबकि ठेका की शर्तों और नियमों में साफ है कि प्लांट स्थापित होकर कार्य संचालन होने के बाद ही पेमेंट किया जाएगा।
मार्च से लंबित है शिकायत
उल्लेखनीय है कि गड़बड़ी करके ठेका देने की एक शिकायत 18 मार्च 2023 को पशुपालन निगम प्रबंधन के साथ ही ईओडब्ल्यू सहित कई भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसियों को गई थी, जोकि जांच के दायरे में है। टेंडर शर्तों का उल्लंघन शुरू से ही किया गया, जो की अभी तक जारी है। टेंडर जारी किया गया था दिनांक 10 अगस्त 2022 को, जिसकी शर्तों के अनुसार टेंडर जारी होने से 6 माह के अंदर काम हो जाना चाहिए था, जोकि अभी तक नहीं हो सका है। इसके अलावा यह तरल नत्रजन संयंत्र केवल फ्रीजिंग के लिए था, लेकिन पशुपालन निगम प्रबंधन ने इसमें भी शुद्धता का पैमाना बताकर अडंगा लगाया। जबकि फ्रीजिंग प्लांट में शुद्धता का पैमाना नहीं लगता, बल्कि फ्रीजिंग यानी टेंपरेचर देखा जाता है। इसमें कंपनी स्टर्लिंग क्रायोजेनिक न्यूजीलैंड को उज्जैन में प्लांट लगाने का ठेका देने में नियमों के उल्लंघन का विवरण दिया गया है। इसमें भी 75% का भुगतान अभी तक ठेका शर्त नंबर 7 का उल्लंघन करके किया जा चुका है। हालांकि मौके पर अभी तक कोई प्लांट लगा ही नहीं है, बल्कि उसके लिए कमरों का निर्माण किया जा रहा है और प्लांट की मशीनरी बाहर पड़ी है।
पहले से बने 5 में से 4 प्लांट हैं बंद
चौंकाने वाला तथ्य यह है भी है कि करोड़ों रुपए की लागत से स्थापित करवाए गए पशुपालन निगम के पांच नाइट्रोजन प्लांट इंदौर, भोपाल, सागर, जबलपुर और ग्वालियर में हैं, जिनमें से 4 प्लांट सालों से बंद पडेÞ हैं। सूत्रों के अनुसार निगम के प्लांटों से नाइट्रोजन करीब 50 रुपए किलो पड़ती है, जबकि खुले मार्केट में 10 से 15 रुपए किलों में बिकती है। इसके बाद भी छठवां प्लांट सवा पांच करोड़ रुपए से मुख्यमंत्री मोहन यादव के गृहनगर उज्जैन में लगवाया जा रहा है।
सवालों के घेरे में विदेश यात्रा
पशुपालन निगम के प्रबंध संचालक डॉ. एचबीएस भदौरिया के साथ पशुपालन मंत्री लखन पटेल और पशुपालन प्रमुख सचिव गुलशन बामरा 12 से 24 जुलाई तक सिंगापुर, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की यात्रा पर जा रहे हैं। इसके लिए पशुपालन निगम से 22 लाख रुपए जारी किए जा चुके हैं, जिसमें टिकट बुकिंग खर्च शामिल हैं। पूर्व में तत्कालीन मुख्य सचिव इकबाल सिंह बेस इसी तरह का विदेश भ्रमण का प्रपोजल कड़ी टिप्पणी के साथ निरस्त कर चुके है। यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि पशुपालन निगम के एमडी भदौरिया 30 जुलाई को रिटायर हो जाएंगे, यानि विदेश यात्रा से लौटने के बाद महज हफ्तेभर तक ही नौकरी पर रहेंगे। विदेश यात्रा का उद्देश्य नाइट्रोजन प्लांट की कार्यपद्धति को देखना, समझना और लौटकर निगम को इसका लाभ प्रदान करना बताया जा रहा है।
जर्मनी का भ्रमण, जर्मनी के प्लांट कबाड़
यह संयोग है या प्रयोग कि जैसे अभी उज्जैन में न्यूजीलैंड की कंपनी प्लांट लगा रही है और पशुपालन निगम के एमडी भदौरिया सहित पीएस बामरा और मंत्री लखन पटेल न्यूजीलैंड सहित सिंगापुर और आस्ट्रेलिया की यात्रा पर जा रहे हैं। ठीक इसी तरह इसके पूर्व जर्मनी की कंपनी ने भी भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर और सागर में लगे हैं। तब भी एमडी भदौरिया और उनकी पत्नी सहित अधिकारियों का दल जर्मनी भ्रमण पर नाइट्रोजन प्लांटों की कार्यपद्धति समझने और तकनीक जानने गया था। हालांकि जर्मनी के चार में से दो प्लांट कबाड़ हो चुके हैं तो बाकी अपनी आधी क्षमता से काम कर पा रहे हैं। बावजूद उच्चस्तर से किसी ने यह पूछने की जहमत नहीं की कि जब अधिकारियों का दल जर्मनी जाकर प्लांटों की तकनीक समझकर आ चुका है तो जर्मनी के करोड़ों के प्लांट कबाड़ कैसे हो रहे हैं?

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