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दमोह निवासी भूवैज्ञानिक प्रीतेश प्यासी और डॉ. रितेश आर्य को मिला 20 मिलियन वर्ष पुराना ताड़ का जीवाश्म: कसौली में महत्वपूर्ण खोज

नवोदय विद्यालय हटा के पूर्व छात्र और पूर्व नपा अध्यक्ष मनु मिश्रा के दामाद है प्रीतेश प्यासी
ब्यूरो चीफ : भगवत सिंह लोधी
दमोह । कसौली हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक डॉ.रितेश आर्य और ओएनजीसी के भूवैज्ञानिक प्रीतेश प्यासी ने कसौली क्लब के पास 20 मिलियन वर्ष पुराने ताड़ के पत्ते के जीवाश्म की एक महत्वपूर्ण खोज की है। यह खोज एसोसिएशन ऑफ पेट्रोलियम जियोलॉजिस्ट (एपीजी), देहरादून द्वारा 9-11 जून के बीच आयोजित क्षेत्रीय कार्यशाला के तीसरे दिन हुई। इस कार्यशाला में ओएनजीसी के 14 भूवैज्ञानिकों की एक टीम डॉ. आर्य और डॉ. जगमोहन सिंह के मार्गदर्शन में कसौली, दगशाई, सुबाथू, शिमला, क्रोल और शिवालिक संरचनाओं के स्तरीकृत अनुक्रम का विश्लेषण कर रही थी। एपीजी, देहरादून के टीम लीडर प्रीतेश प्यासी ने इस खोज पर अपनी खुशी व्यक्त करते हुए कहा, “यह खोज न केवल कसौली क्षेत्र के भूवैज्ञानिक इतिहास को समझने में एक महत्वपूर्ण योगदान है, बल्कि यह हमारे भूवैज्ञानिक ज्ञान को भी समृद्ध करती है। डॉ. रितेश आर्य का दशकों का अथक परिश्रम और समर्पण प्रेरणादायक है और यह खोज हमारे संगठन के लिए भी गर्व का विषय है।” प्रीतेश प्यासी ने जीवाश्म स्थलों के संरक्षण के प्रयासों के महत्व पर भी जोर दिया, ताकि आम जनता पृथ्वी के अतीत और मानवता को समझने के लिए जीवाश्मों के महत्व को जान और समझ सके। उन्होंने कहा कि इससे क्षेत्र में भू-पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।11 जून, 2025 को मिला यह जीवाश्म (ताड़ का पत्ता), क्षेत्र की पुरावनस्पति और भूवैज्ञानिक समझ में एक बड़ा योगदान माना जा रहा है। खोज स्थल का ऐतिहासिक महत्व विशेष है, क्योंकि यह उस स्थान के करीब है जहाँ ब्रिटिश भूवैज्ञानिक मेडलिकॉट ने 1864 में इसी तरह के जीवाश्मों की खोज की थी, जिनकी पहचान वनस्पति शास्त्री ओ. फीस्टमंटेल के कार्य के माध्यम से सबल मेजर हीर के रूप में की गई थी। डॉ. रितेश आर्य ने कहा, “यह खोज न केवल कसौली फॉर्मेशन के जीवाश्म रिकॉर्ड को समृद्ध करती है, बल्कि मेडलिकॉट के अग्रणी काम को भी जीवंत करती है, जिनके निष्कर्ष लंबे समय से सार्वजनिक स्मृति से लुप्त हो गए थे।” उन्होंने आगे कहा, “यह ताड़ का जीवाश्म मेडलिकॉट की 165 साल पहले की मूल खोज के संदर्भ और स्थान में सबसे करीब है। यह ऐसा है जैसे इतिहास खुद को दोहरा रहा हो। यह खोज उस भूवैज्ञानिक अवधारणा को पुख्ता करती है जिसके अनुसार कसौली (हिमाचल प्रदेश) करोड़ों वर्ष पूर्व समुद्र तल के नजदीक था। पाम लीव जैसे पौधे केवल निचले, आर्द्र व तटीय क्षेत्रों में ही पनपते हैं। आज का कसौली जो 2000 मीटर की ऊंचाई पर है, वहां पर इस जीवाश्म का पाया जाना यह दर्शाता है कि दो करोड़ वर्ष पहले कसौली समुद्र तल से केवल 200-500 मीटर की ऊंचाई और तटीय जलवायु में स्थित था। इतना ही नहीं, कसौली में की गई डॉ. रितेश आर्य की पहली खोजों में ग्लूट, गार्सीनिया, सिजीगियम और करंब्रेटम जैसे पौधों के जीवाश्म पाए गए हैं, जो कि आज केवल अंडमान निकोबार, मलेशिया और इंडोनेशिया में पाए जाते हैं। इससे स्पष्ट है कि तब कसौली भूमध्य रेखा के निकट स्थित था।प्रीतेश प्यासी मध्य प्रदेश के दमोह जिले के हटा शहर के चंडी जी वार्ड के रहने वाले हैं और नवोदय विद्यालय, हटा के पूर्व छात्र हैं। वह भारत सरकार के तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अधीन महारत्न राष्ट्रीय कंपनी के 2012 बैच के भूवैज्ञानिक अधिकारी हैं और वर्तमान में देहरादून कार्यालय में संगठन की भूवैज्ञानिक गतिविधियों की देखरेख कर रहे हैंI प्रीतेश प्यासी सागर विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध भूविज्ञान विभाग के एम. टेक के छात्र रहे हैं और उनके माता-पिता जे.पी. प्यासी और उमा प्यासी सागर के सनराइज मेगासिटी में रहते हैं। प्रीतेश प्यासी, दमोह शहर के पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष मनु मिश्रा के दामाद हैं। प्रीतेश प्यासी साहित्य प्रेमी और साहसिक खेल प्रेमी हैं, उन्होंने विभिन्न पर्वतीय क्षेत्रों में ट्रेकिंग की है और भू-पर्यटन में उनकी विशेष रुचि है। वह लोगों में भूविज्ञान के बारे में जागरूकता बढ़ाने और उन्हें इसके संरक्षण के लिए प्रेरित करने के लिए लगातार काम कर रहे हैं।

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