धार्मिक

Today Panchang आज का पंचांग बुधवार, 08 अक्टूबर 2025

आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
जय श्री हरि
🧾 आज का पंचांग 🧾
बुधवार 08 अक्टूबर 2025
ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो बुदि्ध प्रचोदयात ।।
08 अक्टूबर 2025 दिन बुधवार को कार्तिक शुक्ल के कृष्ण पक्ष कि प्रतिपदा तिथि है। आज से कार्तिक स्नान का व्रत का नियम आरंभ हो जाता है। कार्तिक मास में दाल नहीं खाना चाहिए यथा: “कार्तिक द्विदल त्यजेत” अर्थात किसी भी प्रकार का दाल नहीं खाना चाहिए। कार्तिक मास में दिपदान का नियम भी आज से ही आरंभ होता है। लिखा है कि – तुलसीदल लक्षणे कार्तिकेयो$र्चयेद्हरिम्।पत्रे पत्रेमुनिश्रैष्टमौक्तिकं लभते परम्।। अर्थात कार्तिक मास में एक लाख तुलसीपत्र से भगवान श्रीहरि विष्णु की अर्चना की जाएं तो एक – एक मोती चढ़ाने का फल प्राप्त होता है। आज अशुन्यशयन द्वितीय व्रत भी है। आज लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु का शय्या पर शयन कराकर पूजन करने से अक्षय धन – सम्पदा की प्राप्ति एवं दाम्पत्य जीवन में मधुरता बनी रहती है। आप सभी सनातनियों को “पवित्र कार्तिक मास” की हार्दिक शुभकामनायें।।
☄️ *दिन (वार) – बुधवार के दिन तेल का मर्दन करने से अर्थात तेल लगाने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है धन लाभ मिलता है। *बुधवार का दिन विघ्नहर्ता गणेश का दिन हैं। बुधवार के दिन गणेश जी के परिवार के सदस्यों का नाम लेने से जीवन में शुभता आती है।
*बुधवार के दिन गणेश जी को रोली का तिलक लगाकर, दूर्वा अर्पित करके लड्डुओं का भोग लगाकर उनकी की पूजा अर्चना करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। 🔮 *शुभ हिन्दू नववर्ष 2025 विक्रम संवत : 2082 कालयक्त विक्रम : 1947 नल* 🌐 कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082,
👸🏻 शिवराज शक 352_

✡️ शक संवत 1947 (विश्वावसु संवत्सर), चैत्र
☮️ गुजराती सम्वत : 2081 नल
☸️ काली सम्वत् 5126
🕉️ संवत्सर (उत्तर) क्रोधी
☣️ आयन – दक्षिणायन
☂️ ऋतु – सौर शरद ऋतु
⛈️ मास – कार्तिक मास प्रारंभ
🌝 पक्ष – शुक्ल पक्ष
📅 तिथि – बुधवार कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष द्वितीया तिथि 02:22 AM तक उपरांत तृतीया
✏️ तिथि स्वामी – द्वितीया तिथि के देवता हैं ब्रह्मा। इस तिथि में ब्रह्मा की पूजा करने से मनुष्य विद्याओं में पारंगत होता है।
💫 नक्षत्र – नक्षत्र अश्विनी 10:44 PM तक उपरांत भरणी
🪐 नक्षत्र स्वामी – अश्विनी नक्षत्र का स्वामी केतु ग्रह है और इसका देवता अश्विनी कुमार (देवताओं के चिकित्सक) हैं।
⚜️ योग – हर्षण योग 01:32 AM तक, उसके बाद वज्र योग
प्रथम करण : तैतिल – 04:08 पी एम तक
द्वितीय करण – गर – 02:22 ए एम, अक्टूबर 09 तक वणिज
🔥 गुलिक काल : – बुधवार को शुभ गुलिक 11:10 से 12:35 बजे तक ।
⚜️ दिशाशूल – बुधवार को उत्तर दिशा में दिशा शूल होता है ।इस दिन कार्यों में सफलता के लिए घर से सुखा / हरा धनिया या तिल खाकर जाएँ ।
🤖 राहुकाल : – बुधवार को राहुकाल दिन 12:35 से 2:00 तक । राहु काल में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए |
🌞 सूर्योदयः- प्रातः 06:09:00
🌅 सूर्यास्तः- सायं 05:49:00
👸🏻 ब्रह्म मुहूर्त : 04:39 ए एम से 05:29 ए एम
🌆 प्रातः सन्ध्या : 05:04 ए एम से 06:18 ए एम
🌟 अभिजित मुहूर्त : कोई नहीं
✡️ विजय मुहूर्त : 02:05 पी एम से 02:52 पी एम
🐃 गोधूलि मुहूर्त : 05:59 पी एम से 06:24 पी एम
🏙️ सायाह्न सन्ध्या : 05:59 पी एम से 07:13 पी एम
💧 अमृत काल : 04:21 पी एम से 05:47 पी एम
🗣️ निशिता मुहूर्त : 11:44 पी एम से 12:33 ए एम, अक्टूबर 09
🚓 यात्रा शकुन-हरे फ़ल खाकर अथवा दूध पीकर यात्रा पर निकले।
👉🏼 आज का मंत्र-ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:।
🤷🏻‍♀️ आज का उपाय-किसी बटुक को कांस्य पात्र भेंट करें।
🪵 वनस्पति तंत्र उपाय-अपामार्ग के वृक्ष में जल चढ़ाएं।
⚛️ पर्व एवं त्यौहार – भारतीय वायु सेना स्थापना दिवस, अमेरिकन टच टैग दिवस, राष्ट्रीय फ़्लफ़र्नटर दिवस, राष्ट्रीय पियोगी दिवस, राष्ट्रीय हीरो दिवस, राष्ट्रीय नायक दिवस, भारतीय राजनीतिज्ञ पद्मनाभ बालकृष्ण आचार्य जन्म दिवस, प्रमुख नेता रामबिलास पासवान स्मृति दिवस, विश्व वयोवृद्ध दिवस, वन्यजीव सप्ताह (2 अक्टूबर से 8 अक्टूबर)
✍🏼 तिथि विशेष – द्वितीया तिथि को कटेरी फल का तथा तृतीया तिथि को नमक का दान और भक्षण दोनों ही त्याज्य बताया गया है। द्वितीया तिथि सुमंगला और कार्य सिद्धिकारी तिथि मानी जाती है। इस द्वितीया तिथि के स्वामी भगवान ब्रह्माजी को बताया गया है। यह द्वितीया तिथि भद्रा नाम से विख्यात मानी जाती है। यह द्वितीया तिथि शुक्ल पक्ष में अशुभ तथा कृष्ण पक्ष में शुभ फलदायिनी होती है।।
🌷 Vastu tips 🌸
पीपल का पेड़ कैसे उखाड़ें? यदि आपके घर में पीपल का पेड़ उग गया है तो इसे थोड़ा सा बड़ा होने दें। उसके बाद इस पौधे को मिट्टी सहित खोदकर घर के बाहर किसी साफ जगह पर लगा दें। पेड़ उखाड़ने से पहले इसकी पूजा करें। उस पर कच्चा दूध चढ़ाएं। फिर उसे उस स्थान से निकालकर कहीं ओर लगा दें। ऐसा करने से आपको वास्तु दोष नहीं लगेगा।
*शनिवार को जरूर करनी चाहिए पीपल की पूजा पीपल के पेड़ की पूजा शनिवार के दिन करना बेहद शुभ माना जाता है। कहते हैं इससे शनि दोष से मुक्ति मिलती है साथ ही पितरों का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है। 🔰 *जीवनोपयोगी कुंजियां* ⚜️ कुलंजन (गैलंगन) – एक अद्भुत औषधीय जड़ी-बूटी कुलंजन अदरक जैसी दिखने वाली औषधि है, जो पाचन, श्वसन, त्वचा और बालों के लिए अत्यंत लाभकारी है। यह कफ, खांसी, दमा, जुकाम, बुखार और पेट की सूजन जैसी समस्याओं में रामबाण मानी जाती है। *इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट व सूजनरोधी गुण शरीर से विषैले तत्व निकालते हैं, रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाते हैं और शरीर को स्वस्थ रखते हैं। कुलंजन का सेवन गले की जलन, सांसों की बदबू, और आवाज संबंधी समस्याओं में भी लाभदायक है।
*बालों व त्वचा के लिए फायदे:*
*यह बालों का झड़ना कम करता है, डैंड्रफ हटाता है, और बालों को घना व मजबूत बनाता है। इसके एंटीबैक्टीरियल गुण त्वचा की सफाई करते हैं, पिंपल्स व दाग-धब्बे मिटाते हैं और प्राकृतिक नमी व चमक बनाए रखते हैं। *उपयोग: कुलंजन पाउडर व मिश्री समान मात्रा में लेकर आधा चम्मच दूध या गुनगुने पानी के साथ लेने से खांसी, बुखार व मतली में राहत मिलती है। यह गठिया, पेट के अल्सर और सूजन में भी उपयोगी है
🍃 आरोग्य संजीवनी ☘️
महिलाओं को भी लाभदायक
*डिलीवरी के बाद के दर्द से राहत दिलाने में भी हड़जोड़ अत्यंत लाभदायक है। हड़जोड़ के तना एवं पत्तों को पीसकर लेप करने से डिलीवरी के दर्द से आराम मिलता है। महिलाओं के रोग प्रदर या ल्यूकोरिया में भी हड़जोड़ फायदेमंद है। महिलाओं को अक्सर सफेद पानी निकलने की समस्या होती है। सफेद पानी का स्राव अत्यधिक होने पर कमजोरी भी हो जाती है। इससे राहत पाने में हड़जोड़ का सेवन फायदेमंद होता है। *_5-10 मिली हड़जोड़ काण्ड रस का सेवन करने से अनियमित अर्न्तस्त्राव तथा श्वेतप्रदर या सफेद पानी में लाभ होता है। अगर कटने या छिलने पर ब्लीडिंग कम नहीं हो रहा है तो हड़जोड़ का प्रयोग लाभकारी होता है। हड़जोड़ स्वरस को लगाने से क्षतजन्य रक्तस्राव का स्तम्भन होता है। इसके अलावा 2-4 मिली तने और जड़ के रस को पीने से शीताद, दंत से रक्तस्राव, नासिका से रक्तस्राव तथा रक्तार्श या बवासीर में खून आना आदि में लाभ होता है। 📚 गुरु भक्ति योग 🕯️
जब ब्राह्मणों को सब कुछ मिल चुका, तब राजा ने उन लोगों से आज्ञा लेकर व्रत का पारण करने की तैयारी की। उसी समय शाप और वरदान देने में समर्थ स्वयं दुर्वासा जी भी उनके यहाँ अतिथि के रूप में पधारे॥
*
राजा अम्बरीष उन्हें देखते ही उठकर खड़े हो गये, आसन देकर बैठाया और विविध सामग्रियों से अतिथि के रूप में आये हुए दुर्वासाजी की पूजा की। उनके चरणों में प्रणाम करके अम्बरीष ने भोजन के लिये प्रार्थना की॥
दुर्वासाजी ने अम्बरीष की प्रार्थना स्वीकार कर ली और इसके बाद आवश्यक कर्मों से निवृत्त होने के लिये वे नदीतट पर चले गये। वे ब्रह्म का ध्यान करते हुए यमुना के पवित्र जल में स्नान करने लगे॥
*इधर द्वादशी केवल घड़ी भर शेष रह गयी थी। धर्मज्ञ अम्बरीष ने धर्म-संकट में पड़कर ब्राह्मणों के साथ परामर्श किया॥ *उन्होंने कहा— ‘ब्राह्मण-देवताओ! ब्राह्मण को बिना भोजन कराये स्वयं खा लेना और द्वादशी रहते पारण न करना—दोनों ही दोष हैं। इसलिये इस समय जैसा करने से मेरी भलाई हो और मुझे पाप न लगे, वैसा काम करना चाहिये॥
*तब ब्राह्मणों के साथ विचार करके उन्होंने कहा—‘ब्राह्मणो! श्रुतियों में ऐसा कहा गया है कि जल पी लेना भोजन करना भी है, नहीं भी करना है। इसलिये इस समय केवल जल से पारण किये लेता हूँ॥ *ऐसा निश्चय करके मन-ही-मन भगवान्‌ का चिन्तन करते हुए राजर्षि अम्बरीष ने जल पी लिया और परीक्षित्! वे केवल दुर्वासाजीके आने की बाट देखने लगे॥
*दुर्वासाजी आवश्यक कर्मों से निवृत्त होकर यमुना तट से लौट आये। जब राजा ने आगे बढ़कर उनका अभिनन्दन किया तब उन्होंने अनुमान से ही समझ लिया कि राजा ने पारण कर लिया है॥ *उस समय दुर्वासाजी बहुत भूखे थे। इसलिये यह जानकर कि राजा ने पारण कर लिया है, वे क्रोध से थर-थर काँपने लगे। भौंहों के चढ़ जाने से उनका मुँह विकट हो गया। उन्होंने हाथ जोड़कर खड़े अम्बरीष से डाँटकर कहा॥
*‘अहो! देखो तो सही, यह कितना क्रूर है! यह धन के मद में मतवाला हो रहा है। भगवान्‌ की भक्ति तो इसे छूतक नहीं गयी और यह अपने को बड़ा समर्थ मानता है। आज इसने धर्म का उल्लंघन करके बड़ा अन्याय किया है॥ *देखो, मैं इसका अतिथि होकर आया हूँ। इसने अतिथि-सत्कार करने के लिये मुझे निमन्त्रण भी दिया है, किन्तु फिर भी मुझे खिलाये बिना ही खा लिया है। अच्छा देख, ‘तुझे अभी इसका फल चखाता हूँ’॥
*यों कहते-कहते वे क्रोध से जल उठे। उन्होंने अपनी एक जटा उखाड़ी और उससे अम्बरीष को मार डालने के लिये एक कृत्या उत्पन्न की। वह प्रलयकाल की आग के समान दहक रही थी॥ *वह आग के समान जलती हुई, हाथ में तलवार लेकर राजा अम्बरीष पर टूट पड़ी। उस समय उसके पैरों की धमक से पृथ्वी काँप रही थी। परन्तु राजा अम्बरीष उसे देखकर उससे तनिक भी विचलित नहीं हुए। वे एक पग भी नहीं हटे, ज्यों-के-त्यों खड़े रहे॥
*परमपुरुष परमात्मा ने अपने सेवक की रक्षाके लिये पहले से ही सुदर्शन चक्र को नियुक्त कर रखा था। जैसे आग क्रोध से गुर्राते हुए साँप को भस्म कर देती है, वैसे ही चक्र ने दुर्वासाजी की कृत्या को जलाकर राख का ढेर कर दिया॥ *जब दुर्वासाजी ने देखा कि मेरी बनायी हुई कृत्या तो जल रही है और चक्र मेरी ओर आ रहा है, तब वे भयभीत हो अपने प्राण बचाने के लिये जी छोड़कर एकाएक भाग निकले॥
*जैसे ऊँची-ऊँची लपटों वाला दावानल साँप के पीछे दौड़ता है, वैसे ही भगवान्‌ का चक्र उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगा। जब दुर्वासाजी ने देखा कि चक्र तो मेरे पीछे लग गया है, तब सुमेरु पर्वत की गुफा में प्रवेश करनेके लिये वे उसी ओर दौड़ पड़े॥ *दुर्वासाजी दिशा, आकाश, पृथ्वी, अतल-वितल आदि नीचे के लोक, समुद्र, लोकपाल और उनके द्वारा सुरक्षित लोक एवं स्वर्ग तक में गए परन्तु जहाँ-जहाँ वे गये, वहाँ-वहाँ उन्होंने असह्य तेज-वाले सुदर्शन चक्र को अपने पीछे लगा देखा॥
*जब उन्हें कहीं भी कोई रक्षक न मिला तब तो वे और भी डर गये। अपने लिये त्राण ढूँढ़ते हुए वे देवशिरोमणि ब्रह्माजी के पास गये और बोले— ‘ब्रह्माजी! आप स्वयम्भू हैं। भगवान्के इस तेजोमय चक्र से मेरी रक्षा कीजिये’॥ *ब्रह्माजीने कहा—‘जब मेरी दो परार्ध की आयु समाप्त होगी और कालस्वरूप भगवान् अपनी यह सृष्टलीला समेटने लगेंगे और इस जगत्‌ को जलाना चाहेंगे, उस समय उनके भ्रभंग मात्र से यह सारा संसार और मेरा यह लोक भी लीन हो जायगा॥
*मैं, शंकरजी, दक्ष-भृगु आदि प्रजा-पति, भूतेश्वर, देवेश्वर आदि सब जिनके बनाये नियमों में बँधे हैं तथा जिनकी आज्ञा शिरोधार्य करके हमलोग संसार का हित करते हैं, (उनके भक्तके द्रोही को बचाने के लिये हम समर्थ नहीं हैं)’॥ *जब ब्रह्माजी ने इस प्रकार दुर्वासाको निराश कर दिया, तब भगवान्‌ के चक्र से संतप्त होकर वे कैलासवासी भगवान् शंकरकी शरणमें गये॥
*श्रीमहादेवजीने कहा—‘दुर्वासाजी! जिन अनन्त परमेश्वरमें ब्रह्मा-जैसे जीव और उनके उपाधिभूत कोश, इस ब्रह्माण्ड के समान ही अनेकों ब्रह्माण्ड समय पर पैदा होते हैं और समय आने पर फिर उनका पता भी नहीं चलता, जिनमें हमारे-जैसे हजारों चक्कर काटते रहते हैं—उन प्रभु के सम्बन्ध में हम कुछ भी करने की सामर्थ्य नहीं रखते॥ *मैं, सनत्कुमार, नारद, भगवान् ब्रह्मा, कपिलदेव, अपान्तरतम, देवल, धर्म, आसुरि तथा मरीचि आदि दूसरे सर्वज्ञ सिद्धेश्वर—ये हम सभी भगवान्‌ की माया को नहीं जान सकते। क्योंकि हम उसी माया के घेरे में हैं॥
*यह चक्र उन विश्वेश्वर का शस्त्र है। यह हम लोगों के लिये असह्य है। तुम उन्हीं की शरण में जाओ। वे भगवान् ही तुम्हारा मंगल करेंगे’॥ *वहाँ से भी निराश होकर दुर्वासा भगवान्‌ के परमधाम वैकुण्ठ में गये। लक्ष्मीपति भगवान् लक्ष्मी के साथ वहीं निवास करते हैं॥
*_दुर्वासाजी भगवान्‌ के चक्र की आग से जल रहे थे। वे काँपते हुए भगवान्‌के चरणों में गिर पड़े। उन्होंने कहा—‘हे अच्युत! हे अनन्त! आप संतोंके एकमात्र वाञ्छनीय हैं। प्रभो! विश्व के जीवनदाता! मैं अपराधी हूँ। आप मेरी रक्षा कीजिये॥
आपका परम प्रभाव न जानने के कारण ही मैंने आपके प्यारे भक्त का अपराध किया है। प्रभो! आप मुझे उससे बचाइये। आपके तो नाम का ही उच्चारण करने से नारकी जीव भी मुक्त हो जाता है’॥
श्रीभगवान्ने कहा—दुर्वासाजी! मैं सर्वथा भक्तों के अधीन हूँ। मुझ में तनिक भी स्वतन्त्रता नहीं है। मेरे सीधे-सादे सरल भक्तों नें मेरे हृदय को अपने हाथ में कर रखा है। भक्तजन मुझ से प्यार करते हैं और मैं उनसे॥
ब्रह्मन्! अपने भक्तोंका एकमात्र आश्रय मैं ही हूँ। इसलिये अपने साधु स्वभाव भक्तों को छोड़कर मैं न तो अपने-आपको चाहता हूँ और न अपनी अर्द्धांगिनी विनाश रहित लक्ष्मी को॥
जो भक्त स्त्री, पुत्र, गृह, गुरुजन, प्राण, धन, इहलोक और परलोक—सबको छोड़कर केवल मेरी शरण में आ गये हैं, उन्हें छोड़ने का संकल्प भी मैं कैसे कर सकता हूँ?॥
जैसे सती स्त्री अपने पातिव्रत्य से सदाचारि पति को वश में कर लेती है, वैसे ही मेरे साथ अपने हृदय को प्रेम-बन्धन से बाँध रखने वाले समदर्शी साधु भक्ति के द्वारा मुझे अपने वश में कर लेते हैं ॥
मेरे अनन्य प्रेमी भक्त सेवा के ही अपने को परिपूर्ण–कृतकृत्य मानते हैं। मेरी सेवा के फलस्वरूप जब उन्हें सालोक्य, सार्ष्टि आदि मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं तब वे उन्हें भी स्वीकार करना नहीं चाहते फिर सम्पत्ति, ऐश्वर्य और नष्ट हो जाने वाली वस्तुओं की तो बात ही क्या है ॥
दुर्वासाजी! मैं आपसे और क्या कहूँ, मेरे प्रेमी भक्तों का मेरे हृदय में और प्रेमी भक्तों के हृदय स्वयं मुझ में है। मैं उनसे अलग और वे मुझसे अलग नहीं हैं। उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं जानता ॥
दुर्वासाजी! सुनिये, मैं आपको एक उपाय बताता हूँ। जिसका अधिक करने से आपको इस विपत्ति में पड़ना पड़ा है, आप उसी के पास जाइये। निरपराध साधुओं के अपराध की चेष्टा भी निश्चित करने वालों का ही अमंगल होता है ॥
इसमें सन्देह नहीं कि ब्राह्मणों के लिये तपस्या और विद्या कल्याण के साधन हैं। परन्तु यदि ब्राह्मण उदण्ड आचरण करने लग जाय तो वे ही दोनों उलटा फल देने लगते हैं ॥
दुर्वासाजी! आपका कल्याण हो। आप नाभाग–नन्दन परम भाग्यशाली राजा अम्बरीष के पास जाइये और उनसे क्षमा माँगिये। तब आपको शान्ति मिलेगी ॥
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⚜️ प्रजापति व्रत दूज को ही किया जाता है तथा किसी भी नये कार्य की शुरुआत से पहले एवं ज्ञान प्राप्ति हेतु ब्रह्माजी का पूजन अवश्य करना चाहिये। वैसे तो मुहूर्त चिंतामणि आदि ग्रन्थों के अनुसार द्वितीया तिथि अत्यन्त शुभ फलदायिनी तिथि मानी जाती है। परन्तु श्रावण और भाद्रपद मास में इस द्वितीया तिथि का प्रभाव शून्य हो जाता है। इसलिये श्रावण और भाद्रपद मास कि द्वितीया तिथि को कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिये।

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