श्रीमद् भागवत कथा के समापन दिवस पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
गुरुदेव बोले – “सनातनी हिंदुओं का अलग-अलग संप्रदायों में बँटना अत्यंत दुखद”
रिपोर्टर : विपिन शर्मा
बम्होरी। कस्बा बम्होरी में आयोजित श्रीमद् भागवत पुराण कथा के समापन दिवस पर श्रद्धा, भक्ति और भावनाओं का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा पंडाल श्रद्धालुओं से खचाखच भरा रहा, वहीं कथा स्थल के बाहर, बस स्टैंड से लेकर आसपास के मार्गों तक केवल भक्त ही भक्त नजर आए।
मालवा माटी के परम पूज्य संत एवं सुप्रसिद्ध कथावाचक पंडित प्रभु जी नागर ने अपने ओजस्वी, भावपूर्ण एवं जीवन को सही दिशा देने वाले प्रवचनों से उपस्थित श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। समापन दिवस की कथा में गुरुदेव ने समाज, राष्ट्र, भक्ति और परिवार से जुड़े गूढ़ विषयों पर सारगर्भित संदेश दिए।
गुरुदेव ने कहा कि आज सनातनी हिंदुओं का अलग अलग मत और संप्रदायों में बँटना अत्यंत दुखद है। यह पीड़ा केवल समाज को ही नहीं, बल्कि भगवान को भी होती है। उन्होंने कहा कि जीवन में जब कष्ट आते हैं तो समझ लेना चाहिए कि ईश्वर की छाया हम पर पड़ चुकी है, क्योंकि कष्ट सहने वाला ही महान बनता है।
देश के सैनिकों का उदाहरण देते हुए गुरुदेव ने कहा कि हमारे सैनिक जान हथेली पर रखकर सीमाओं पर खड़े रहते हैं, चाहे सर्दी हो, गर्मी हो या युद्ध की स्थिति। अन्य देशों की अपेक्षा भारतीय सैनिक अद्वितीय और महान हैं। उन्होंने कहा कि भारत अनादिकाल से कष्ट सहता आया है, फिर भी भारत महान है, क्योंकि जिसने कष्ट सहे वही महान होता है — जैसे भक्त और भारत दोनों।
गुरुदेव ने कहा कि सत्य, भजन और सिद्धांत के बिना जीवन अधूरा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि चाहे सब कुछ महँगा हो जाए, लेकिन कथा और विद्या महँगी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यदि विद्या महँगी हो गई तो ज्ञान कहाँ से मिलेगा।
समापन कथा में गुरुदेव ने सफल जीवन के लिए छह सूत्र बताए—
भक्तिमय परिवार – कथा, माला और जप से जुड़ा परिवार।
सेवामय परिवार – माता-पिता की सेवा करने वाला परिवार।
प्रकृतिमय परिवार – जैसे भगवान ने द्वारका में पारिजात का वृक्ष लगाया, वैसे ही हमें भी वृक्ष लगाने चाहिए।
क्लेशमुक्त परिवार – जहाँ कलह होता है वहाँ मटके का पानी भी गरम हो जाता है; मूर्ख के सामने मौन रहना क्लेश मुक्ति का मार्ग है।
पाखंडमुक्त परिवार – सीधे परम पिता परमेश्वर से जुड़ो, पाखंडियों के नहीं, केवल भगवान के चित्र लगाओ।
व्यसनमुक्त परिवार – गुटखा, शराब, जुआ आदि से दूर रहो।
गुरुदेव ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति इन छह बातों को जीवन में उतार ले, तो उसका जीवन निश्चित ही सफल हो जाएगा। भक्ति का रंग दिखावटी नहीं, बल्कि हृदय से होना चाहिए।
“गोविंद तूने बहुत ही प्रीत निभाई” भजन के दौरान पूरा पंडाल भावनाओं से भर उठा और कई श्रद्धालुओं की आँखें नम हो गईं। गुरुदेव ने कहा कि मनुष्य के शरीर में दो ऐसे अंग हैं जो यश भी दिलाते हैं और अपमान भी — दिल और जुबान।
कथा के दौरान गुरुदेव ने स्पष्ट कहा कि कथा में कोई विधायक, मंत्री या पदाधिकारी समय पर आए तो ठीक, अन्यथा यहाँ सभी भक्त समान हैं। जहाँ स्थान मिले, वहीं बैठकर कथा श्रवण करें — यही सच्ची भक्ति है।
कथा विश्राम के अवसर पर हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने यह सिद्ध कर दिया कि बम्होरी की यह भागवत कथा न केवल धार्मिक आयोजन थी, बल्कि समाज को दिशा देने वाला एक महापर्व भी बन गई।


