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28 फरवरी 2026 नरसिंह द्वादशी? जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

Astologar Gopi Ram : आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
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🐚 28 फरवरी 2026 कब है नरसिंह द्वादशी? जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व……
🔘 HEADLINES
▫️ सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें* ▫️ पूजा के दौरान ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ या ‘नरसिंह स्तोत्र’ का पाठ करें ▫️ भगवान को पीली मिठाई या सात्विक भोग लगाएं 👉🏼 भगवान विष्णु के अवतारों में भगवान नरसिंह का स्वरूप अत्यंत अद्भुत और प्रेरणादायक माना जाता है। नरसिंह द्वादशी उसी दिव्य अवतार की स्मृति में मनाई जाने वाली पावन तिथि है, जो धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश का संदेश देती है। यह पर्व न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह विश्वास भी जगाता है कि जब-जब भक्त पर संकट आता है, तब-तब ईश्वर किसी न किसी रूप में उसकी रक्षा के लिए अवश्य प्रकट होते हैं। नरसिंह द्वादशी का व्रत और पूजन श्रद्धा, साहस और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने वाला माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक उपवास और पूजा करने से भय, बाधाएं और नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं तथा जीवन में आत्मविश्वास और सुरक्षा की भावना बढ़ती है। वर्ष 2026 में नरसिंह द्वादशी कब मनाई जाएगी, इसका शुभ मुहूर्त क्या रहेगा और पूजा की सही विधि क्या है। आचार्य श्री गोपी राम से इन सभी महत्वपूर्ण बातों को जानना श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत आवश्यक है। ⚛️ नरसिंह द्वादशी 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त
📅 साल 2026 में नरसिंह द्वादशी फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को पड़ रही है। पंचांग के अनुसार, यह पावन तिथि 27 फरवरी 2026 की रात्रि 10 बजकर 32 मिनट पर प्रारंभ होगी और अगले दिन 28 फरवरी 2026 की रात 08 बजकर 43 मिनट पर समाप्त होगी। इसका अर्थ यह है कि इस अवधि में यह व्रत और पूजा विधिपूर्वक की जा सकती है।
🤷🏻‍♀️ धार्मिक दृष्टि से मुख्य व्रत का पालन 28 फरवरी 2026 को किया जाएगा। इस दिन श्रद्धालु पूरे विधि-व्यवस्थित तरीके से उपवास रखते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं। व्रत समाप्त करने के लिए पारण का समय 1 मार्च 2026 की सुबह निर्धारित किया गया है। द्वादशी पारण का शुभ समय प्रातः 06 बजकर 21 मिनट से 08 बजकर 41 मिनट तक रहेगा। इस दौरान व्रत खोलने से व्यक्ति को स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और ईश्वर की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है।
📖 नरसिम्हा द्वादशी की पूजा विधि
सुबह सूर्योदय से पहले उठें और स्नान करें। साफ, पीले रंग के कपड़े पहनें।
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अपने घर में स्थित मंदिर को साफ करें और भगवान नरसिम्हा की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें।* यदि यह उपलब्ध न हो तो भगवान विष्णु की तस्वीर रखकर भी पूजा की जा सकती है।*
पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पंचामृत से अभिषेकमृत करें। इसके बाद पीले फूल, साबुत चावल, फल, मिठाई और धूप अर्पित करें।* पूजा के दौरान विष्णु सहस्रनाम या नरसिम्हा स्तोत्र का पाठ करना शुभ माना जाता है। अंत में, देवता को सात्विक भोग अर्पित करें, आरती करें और प्रसाद वितरित करें। 🤷🏻‍♀️ नरसिंह द्वादशी का महत्व
*पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब असुरराज हिरण्यकश्यप के अत्याचार बहुत बढ़ गए और उसने अपने ही बेटे प्रहलाद को मारने की कोशिश की, तब भगवान विष्णु ने एक खंभे को चीरकर ‘नरसिंह’ (आधा सिंह और आधा मनुष्य) रूप में अवतार लिया था। *यह दिन हमें सिखाता है कि ईश्वर अपने सच्चे भक्तों की रक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। मान्यता है कि नरसिंह द्वादशी का व्रत रखने और सच्चे मन से प्रार्थना करने से व्यक्ति के अंदर गजब का साहस पैदा होता है। उसके जीवन से हर तरह का डर, दुख-दर्द और नकारात्मकता हमेशा के लिए दूर हो जाती है।
📑 पौराणिक कथा
*प्राचीन समय में महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी दिति के दो पुत्र हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप (हिरण्यकशिपु) थे। हालांकि, वे ऋषि पुत्र थे, लेकिन उनकी प्रवृत्ति अत्यंत क्रूर और असुरों जैसी हो गई थी। दोनों भाइयों ने अपने अत्याचारों से पृथ्वी और स्वर्ग लोक में भय का वातावरण बना दिया। *हिरण्यकश्यप का अहंकार*
*प्रतिशोध की अग्नि में जलते हुए हिरण्यकश्यप ने कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे वरदान दिया कि वह न किसी मनुष्य से मरेगा, न किसी पशु से, न तो दिन में मरेगा और न ही रात में, न घर के भीतर उसकी मृत्यु होगी और न ही बाहर, न किसी अस्त्र से मर सकेगा न ही शस्त्र से। *इस वरदान के प्रभाव से वह अत्यंत शक्तिशाली हो गया। उसने देवताओं को पराजित कर तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। शक्ति के मद में चूर होकर वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा और प्रजा को भी अपनी पूजा करने का आदेश देने लगा।
भक्त प्रह्लाद
*कुछ समय बाद उसकी पत्नी कयाधु ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम प्रह्लाद रखा गया। प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु के अनन्य भक्त थे। जब हिरण्यकश्यप को यह ज्ञात हुआ कि उसका पुत्र उसके स्थान पर विष्णु की भक्ति करता है, तो वह अत्यंत क्रोधित हुआ। *उसने प्रह्लाद को समझाने, डराने और अनेक यातनाएं देने का प्रयास किया, किंतु बालक प्रह्लाद का विश्वास अटल रहा। अंततः हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की सहायता से प्रह्लाद को अग्नि में जलाने की योजना बनाई। होलिका को वरदान था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती। परंतु भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका अग्नि में भस्म हो गई।
स्तंभ से प्रकट हुए भगवान नरसिंह
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जब सभी उपाय विफल हो गए, तब हिरण्यकश्यप ने सभा में प्रह्लाद को एक स्तंभ से बांध दिया और उपहास करते हुए कहा, “यदि तुम्हारा भगवान सर्वत्र है, तो क्या वह इस स्तंभ में भी है?”
*प्रह्लाद ने निडर होकर उत्तर दिया, “हां, भगवान कण-कण में विद्यमान हैं।” *क्रोध में आकर हिरण्यकश्यप ने गदा से स्तंभ पर प्रहार किया। तभी उस स्तंभ से आधा-मनुष्य और आधा-सिंह रूप में भगवान नरसिंह प्रकट हुए। संध्या समय (जो न दिन था न रात), राजमहल की देहरी पर (जो न भीतर थी न बाहर), उन्होंने हिरण्यकश्यप को अपनी जांघों पर रखकर अपने नाखूनों से उसका पेट चीरकर हिरण्यकश्यप का वध कर दिया। इस प्रकार ब्रह्मा जी के वरदान की प्रत्येक शर्त पूर्ण हुई और धर्म की विजय हुई।

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