छोटी नदियों को पुनर्जीवित करने संत और समुदाय आगे आये : भारतलाल नामदेव

रिपोर्टर : सतीश चौरसिया
उमरियापान। नदी के प्रवाह को बनाये रखने दोड़ते पानी को रेंगने,रेंगते पानी को रोकने सर्वोत्तम समय अभीजल एक महत्वपूर्ण तत्व है । जिसके बिना पृथ्वी पर जीवन सम्भव नहीं है । वर्ष 2050 तक जल की मांग 50 प्रतिशत बढ़ जायेगी। इसीलिए भविष्य की जल आवश्यकता के अनुरूप सभी को सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से विभिन्न प्रकार के छोटे-छोट़े जल स्रोतों का संवर्धन व संरक्षण प्राथमिकता से करना होगा।पर्वतीय भाग जल स्रोतों के पुनर्जीवन, संरक्षण, स्वच्छता तथा संवर्द्धन के लिए सामाजिक सहभागिता के साथ कार्य करना होगा तथा जल संरक्षण की स्थानीय परम्परागत विधियों को अपनाना होगा । जल संरक्षण तथा वर्षाजल संचयन का कार्य अपने-अपने घर खेत मोहल्ला टोला एवं गांवों से ही शुरवात करनी होगी । तभी समाज में सभी की सहभागिता से बढ़ती हुई जल की मांग को पूरा किया जा सकेगा ।पीएम मोदी ने अपने मन की बात पर नदियों को लेकर बड़ी बात की उन्होंने कहा 26 सितंबर को जब मन की बात होगा उस दिन एक और महत्वपूर्ण दिन होता है । वैसे तो हमें बहुत दिन याद रहते हैं और कुछ दिन तो तरह-तरह के त्यौहार भी मनाते हैं अगर आपके घर में नौजवान बेटा बेटी है तो उनसे पूछेंगे कि साल भर में कितने दिन आते है । तो वह आपको पूरी सूची दे देंगे । लेकिन एक दिन ऐसा भी आता है जिसे हम सबको याद रखना होगा । यह डे ऐसा है जो भारत की परंपराओं से बहुत सुसंगत है सदियों से जिस परंपराओं से हम जुड़े हैं उस से जोड़ने वाला है ‘ये है वर्ल्ड रिवर डे’ । यानी विश्व नदी दिवस हमारे यहां कहा गया है “पिबन्ति नाद्ध स्वयमेय नाम्भ:” अर्थात नदियां अपना पानी खुद नहीं पीती बल्कि परोपकार के लिए देती है हमारे लिए नदियां एक भौतिक वस्तु नहीं है। हमारे लिए नदी एक जीवंत इकाई है ।और तभी तो हम नदियों को मां कहते हैं हमारे कितनी भी पर्व हो त्योहार हो , उत्सव हो, उमंग हो यह सभी हमारी इन नदी माताओं के गोद में ही तो होते हैं।पानी का संकट आज सबसे बड़ा है । लेकिन अगर हम दृढ़ संकल्प लेते हैं तो हम इससे पार पा सकते हैं । सरकार ने भी इस समस्या के प्रति अपनी गम्भीरता स्पष्ट कर दी है। ऐसे में अब बारी समाज की है । यदि इस गम्भीर समस्या को सरलता के साथ समझना चाहे तो इसे समझे भारत में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 140 लीटर है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एक दिन में प्रति व्यक्ति को 200 लीटर पानी उपलब्ध होना चाहिए । अधिकांस गावो में दो से तीन दिन में एक दिन पीने का पानी मिल रहा हे देश के 85- 90 प्रतिशत गांव भूजल से अपनी आपूर्ति करते हैं।पानी का संरक्षण व उसकी बचत दोनों स्तरों पर जल संकट के स्थाई समाधान हेतु जहां छोटी नदियों छोटे बड़े ग्रामीण तालाबों का पुनर्जीवित होना आवश्यक है जगह जहग छोटे तालाबो को समाप्त करने उसका मद बदलने एवं बड़े तालाबो को छोटा करने उसकी सीमाओ को दबाने का पुरे ताकत के साथ असम्वेदनशील लोग सक्रीय हे वहां अति आवश्यक है कि वर्षा के प्रत्येक बूंद का हम संचयन किया जाये एवं अनुशासित हो कर जल के उपयोग के प्रति लोगों को जागरुक करने के लिए संकल्प लेने की आवश्यकता है ।जरुरी हे नदी पुनर्जीवित करने की तकनीक आम आदमी भी जाने मानव जीवन का आधार पानी रहा है जहाँ पानी था मानव बसाहट वही थी | विगत वर्षों में जलवायु परिवर्तन एवं जल के अनियंत्रित दोहन तथा उसके संरक्षण के प्रति उदासीनता के कारण हमारी नदियों एवं जल स्रोतों में पानी नहीं रह गया है प्रक्रतिक वनस्पति प्रभावित हो रही है, पीने के पानी के आभाव में मूक पशु, पक्षी प्राण त्याग रहे हैं | किसानो के मित्र पालतू पशुओं का अस्तित्व संकट में आ चुके है और शीघ्र ही मानव व जीव संकट में आ जायेगा | इसलिए आज और अभी से हमें केवल चिता नही उन्हें संरक्षण के भागीदार बनना होगानर्मदा नदी मध्यप्रदेश और गुजरात की जीवन रेखा मानी जाती हे नर्मदा नदी अमरकंटक से निकलकर गुजरात तक सतत बहती रही हे पूरा क्षेत्र आबाद रहा हे विगत के वर्षो में नर्मदा का प्रवाह गर्मी के दिनों में जबलपुर के भेडाघाट में सिमट कर एक नाले के जेसे हो जाता हे इसका कारण यह रहा हे की नर्मदा की सहायक नदियां सूख जाती हे नर्मदा के प्रवाह को बनांये रखने में जबलपुर जिले के कुण्डम से निकलने वाली हिरण नदी बहुत सहायक रही हे इस नदी के तेज बहाव के कारण हिरन के नाम से जानी जाती हे इसकी लम्बाई 136 किलो मीटर हे यह नरसिंहपुर पहुंचकर नर्मदा को पोषित करती हे अब लगभग चार माहो के लिए पूरी तरह सूख जाती हे इस विषय पर मेरे कुछ जागरूक साथियों ने अध्यन किया और निश्चित किया की क्यों न हम लोग नर्मदा की सहायक हिरण नदी को आम नागरिको के सहयोग से सदा नीरा बनाने के लिए प्रयास करे किन्तु अर्थ के आभाव में 136 पर काम करना मुस्किल लगा और तब तय किया गया की क्यों न हिरण नदी की सहायक छोटी 23 किलोमीटर की दतला नदी जो केवल चार पांच माह में सूख जाती, बहुत कम समय ही जीवित रहती थी को सदा नीरा बनाया जाये और उसका भ्रमण कर अध्ययन चालू किया ।भारत लाल नामदेव द्वारा दतला नदी पुनर्जीवन का कार्य विगत 5 वर्षों (2020) से किया जा रहा हे जिसमें सामाजिक सक्रियता के लिए नदी एवं भूमि संरक्षण समिति गठित की गई 10 महिलाये 10 पुरुष में से अध्यक्ष महिलाएं चुनी गई थी किंतु महिलाओ की सहभागिता कम रही है किन्तु नियंत्रण में महिलाये ही आगे रही इन्ही पांच सालों में देखने में आया है कि महिलाएं ग्राम की रेत और पानी पर नियंत्रण को बनाने में सफल रही है पानी और रेत का अनियंत्रित दोहन रोका गया है नदी पर ग्रामसभा का नियंत्रण बना रहे और नियंत्रण सक्रियता के साथ लागू हो इस हेतु नदी को पुनर्जीवित करने की विभिन्न पहलुओं में निपुणता को समझाने के लिए हम स्थानीय लोगो का प्रशिक्षण की आवश्यकता हे ताकि लोग तकनिकी रूप से सक्षम हो सके जैसे नदी की गाद निकालना, नदी की सफाई करना, बोरी बंधान बनाना, अर्दन बंड, बोल्डर बंड, कंटूर ट्रेंच, गेबियन स्ट्रक्चर, और चेक डेम मिट्टी लकड़ी बोल्डर के साथ बनाना, घर का पानी घर में, गांव का पानी गांव में, खेत का पानी खेत में, गांव का गंदा पानी साफ करके ही नदी में छोडा जाए ऐसे छोटे-छोटे प्रयास की आवश्यकता है इन तकनीकों के साथ में अच्छा प्रशासन साबित हो ऐसा प्रयास किया जाने की आवश्यकता हे।प्रकृति के जलचक्र और उसमे आ रहे परिवर्तन, जल संसाधनों के सतत प्रबंधन में सामुदायिक उदासीनता और सम्बंधित चुनौतियां, वर्षा की कमी तथा उसका असमान वितरण, वर्षा जल से भूजल रिचार्ज में गभीरता, एक्वीफर्स के द्वारा भूजल रिचार्ज, भूजल स्रोतों के भूविज्ञान आदि बहुत कठिन विषय नहीं हे पर जन सामन्य को समझाने के लिए विषय के जानकारों को अपनी गठरी खोल देने की मानसिकता से विस्तारपूर्वक चिंतन मनन कर सरल विधियों से जन सामान्य तक पहुँचाने की आवश्यकता हे।



