स्थानांतरण के बाद भी ढीमरखेड़ा से मोह नहीं टूटा सहायक यंत्री अजय केसरवानी का मामला बना प्रशासनिक सिस्टम पर बड़ा सवाल

रिपोर्टर : सतीश चौरसिया
उमरियापान। प्रशासनिक सेवा में स्थानांतरण एक सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है। सरकार का स्पष्ट उद्देश्य होता है कि अधिकारी-कर्मचारी लंबे समय तक एक ही स्थान पर न जमें, ताकि कार्य में पारदर्शिता बनी रहे और स्थानीय स्तर पर अनावश्यक पकड़ न बन पाए।लेकिन ढीमरखेड़ा में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने इस पूरी व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। लगभग एक वर्ष पूर्व सहायक यंत्री अजय केसरवानी का झाबुआ स्थानांतरण हो चुका है, इसके बावजूद वे आज तक ढीमरखेड़ा से पूरी तरह रिलीव नहीं हुए हैं।सूत्रों के अनुसार, अजय केसरवानी का स्थानांतरण आदेश करीब एक साल पहले जारी किया गया था। नियमानुसार उन्हें तत्काल प्रभाव से झाबुआ जाकर कार्यभार ग्रहण करना था, लेकिन आज भी उनका नाम ढीमरखेड़ा से जुड़ा हुआ है। कागजों में स्थानांतरण, लेकिन जमीनी हकीकत में ढीमरखेड़ा से मोह खत्म नहीं हो पा रहा। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक शिथिलता को उजागर करती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि कहीं न कहीं सिस्टम में जानबूझकर ढील दी जा रही है। ढीमरखेड़ा को लेकर एक आम धारणा बन चुकी है कि यहां कोई भी अधिकारी या कर्मचारी आना नहीं चाहता, लेकिन यदि किसी कारणवश आ भी गया, तो फिर यहां से जाने का मन नहीं करता । कारण साफ बताया जाता है ढीमरखेड़ा एक शांत, अपेक्षाकृत कम निगरानी वाला क्षेत्र है। कई अधिकारी यहां वर्षों तक पदस्थ रहे, नियमों को ताक पर रखकर, यही वजह है कि जब किसी का स्थानांतरण होता है, तो उसे रिलीव करने में जानबूझकर देरी की जाती है। कभी फाइल अटक जाती है, कभी चार्ज हैंडओवर का बहाना, तो कभी “नया अधिकारी नहीं आया” कहकर मामला टाल दिया जाता है।अजय केसरवानी के मामले में भी कुछ ऐसा ही दिखाई देता है।झाबुआ जैसे आदिवासी और चुनौतीपूर्ण जिले में कार्यभार संभालने के बजाय ढीमरखेड़ा में टिके रहना कई सवाल खड़े करता है। क्या झाबुआ जाना कठिन है या फिर ढीमरखेड़ा में रहना ज्यादा “सुविधाजनक” है यह सवाल अब आम जनता के बीच चर्चा का विषय बन चुका है।ढीमरखेड़ा को लेकर एक और गंभीर आरोप अक्सर लगाया जाता है यहां भ्रष्टाचार करना आसान है। स्थानीय नागरिकों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि शांत क्षेत्र होने का फायदा उठाकर कुछ अधिकारी मनमानी करते हैं। छोटे-छोटे कार्यों में भी लेन-देन, गुणवत्ता से समझौता और फाइलों में हेरफेर की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। लेकिन जांच और कार्रवाई के नाम पर अक्सर मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। ढीमरखेड़ा में यह भी चर्चा है कि कई अधिकारी यहां इसलिए टिके रहना चाहते हैं क्योंकि यहां जवाबदेही कम है। बड़े जिलों में जहां हर कार्य पर नजर रहती है, वहीं छोटे और शांत इलाकों में अधिकारी खुद को ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। यही वजह है कि ढीमरखेड़ा जैसे क्षेत्रों को कुछ लोग पोस्टिंग का स्वर्ग कहने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि अजय केसरवानी का स्थानांतरण हो चुका है, तो अब तक उन्हें रिलीव क्यों नहीं किया गया? क्या उच्च अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं है, या फिर जानबूझकर अनदेखी की जा रही है? यदि आदेश के बावजूद अधिकारी एक साल तक पुराने स्थान पर बना रह सकता है, तो फिर स्थानांतरण आदेशों की क्या विश्वसनीयता रह जाती है स्थानीय जनता का कहना है कि इस मामले में उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए। केवल अजय केसरवानी ही नहीं, बल्कि ऐसे सभी मामलों की समीक्षा की जाए, जहां अधिकारी स्थानांतरण के बाद भी लंबे समय तक पुराने स्थान पर टिके रहते हैं। साथ ही यह भी देखा जाए कि इस अवधि में उन्होंने किन-किन योजनाओं और कार्यों को मंजूरी दी, और उनमें किसी प्रकार की अनियमितता तो नहीं हुई। ढीमरखेड़ा जैसे शांत क्षेत्र प्रशासन के लिए चुनौती भी हैं और अवसर भी। यदि यहां ईमानदार और नियमों का पालन करने वाले अधिकारी तैनात हों, तो विकास तेजी से हो सकता है। लेकिन यदि ऐसे क्षेत्र आराम की पोस्टिंग बन जाएं, तो फिर यह आम जनता के साथ अन्याय है।





