सामाजिक सरोकार से कांग्रेस नदारत, विपक्ष की नैतिक जिम्मेदारी निभाने मे भी पीछे

रिपोर्टर : कुंदनलाल चौरसिया
गौरझामर । जिस कांग्रेस को सत्ता सुख का लम्बा अनुभव रहा हो वह अब विपक्ष मे रहकर अपनी नैतिक जिम्मेदारी से भाग क्यो रही है यह यक्ष प्रश्न हर ग्रामीण तबके मे लोगो की जुबान पर है। पक्ष विपक्ष ही सत्ता संचालन मे संतुलन का काम करते है इस शाश्वत सच्चाई मे कांग्रेस खरी नही उतर रही है यदि कांग्रेस सही मायनो मे अपना सशक्त नैतिक विरोध और विपक्षी भूमिका के मिले दायित्व का निर्वाहन ठीक तरीके से करती तो वह आज विपक्ष मे रहकर भी अपने कर्तव्य परायणता मे सबसे आगे रहती लेकिन ऐसा कुछ भी दिखाई नही दे रहा है जिस प्रकार हाथी के लिए अंकुश की आवश्यकता होती है इसी प्रकार सत्ता के सफल संचालन मे नैतिक विपक्ष की भूमिका भी उतनी ही जरूरी है विपक्ष की यह भूमिका सिर्फ और सिर्फ केन्द्र तक सीमित नही विधान सभा जिला पंचायतो जनपद पंचायत ग्राम पंचायतो तक ही नही यह विपक्षी दायित्व वार्डो तक दिखाई देना चाहिए जब तक सशक्त विपक्ष ऊपर से नीचे तक सक्रिय नही होगा अराजकता भृष्टाचार अनियमितताओ मनमानी का बोलबाला बना रहेगा आज मध्यप्रदेश मे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की विधान मंडल मे विपक्ष के रुप मे अहम भूमिका है वर्तमान परिपेक्ष्य मे यदि देखा जावे तो कांग्रेस धरातल पर मृतप्राय या यू कहे की डायलेसिश पर है तो गलत नही होगा कांग्रेस ने अभी तक सारगर्भित विपक्ष की भूमिका निभाई ही नही है यदि निभाई होती तो भृष्टाचार इतने चरम पर नही होता ,यदि कहे की विपक्ष का दायित्य किसी ने कुछ हद तक निभाया है तो इसमे हम चौथे स्तम्भ का नाम लेगे कांग्रेस आज अमर बेल की तरह दिखलाई दे रही है जो पेड पर छाई तो है मगर उसकी जडे जमीन पर नही है जिस प्रकार जमीन पर सत्ता संगठन का वर्चस्व दिखाई दे रहा है उसी प्रकार विपक्षी संगठन के रुप मे कांग्रेस व अन्य राष्ट्रीय पार्टियों का संगठन भी दिखाई देना चहिये जिससे विकास कार्यो की देखरेख और होने वाले बेजां घटिया निर्माण व भृष्टाचार पर अंकुश लगता आज विपक्ष नही होने से भृष्टाचार चरम पर है नैतिक मूल्यो का लगातार ही निरंकुश तरीके हा्स हो रहा है यहां यह समझने की बात है की क्या पक्ष विपक्ष चुनाव के समय भर ही दिखाई देना चाहिए क्या बाकी समय सत्ता पक्ष को खुले बैल की तरह छोडना चाहिये जो कुछ भी कहता व करता रहे कांग्रेस संगठन ऊपर से नीचे यानी बार्ड तक मजबूती के साथ गठित नही होने से अराजकता बढी हुई है कही किसी पर कोई रोक टोक नही है सब अपनी गति से अच्छा बुरा जैसा भी हो होता जा रहा है यहां यह कहावत सटीक बैठती है की मस्त रहो मस्ती मे आग लगे चाहे बस्ती मे ।



