आज का पंचांग बुधवार, 23 नवम्बर 2022
आचार्य श्री गोपी राम (ज्योतिषाचार्य) जिला हिसार हरियाणा मो. 9812224501
जय श्री हरि
🧾 आज का पंचांग 🧾
बुधवार 23 नवम्बर 2022
ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि तन्नो बुदि्ध प्रचोदयात ।।
🪔 23 नवम्बर 2022 दिन बुधवार को मार्गिशीर्ष कृष्ण पक्ष की अमावस्या है जिसे उड़ीसा में दीपावली के रूप में मनाया जाता है। आप सभी सनातनियों को उड़िया दीपावली की हार्दिक शुभकामनायेँ।।
☄️ दिन (वार) – बुधवार के दिन तेल का मर्दन करने से अर्थात तेल लगाने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती है धन लाभ मिलता है।बुधवार का दिन विघ्नहर्ता गणेश का दिन हैं। बुधवार के दिन गणेश जी के परिवार के सदस्यों का नाम लेने से जीवन में शुभता आती है
बुधवार के दिन गणेश जी को रोली का तिलक लगाकर, दूर्वा अर्पित करके लड्डुओं का भोग लगाकर उनकी की पूजा अर्चना करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
बुधवार को सभी ग्रहो के राजकुमार बुध देव की आराधना करने से ज्ञान मिलता है, वाकपटुता में प्रवीणता आती है, धन लाभ होता है
🔮 शुभ विक्रम संवत्-2079, शक संवत्-1944, हिजरी सन्-1443, ईस्वी सन्-2022
🌐 संवत्सर नाम-राक्षस
✡️ शक संवत 1944 (शुभकृत् संवत्सर)
☸️ काली सम्वत 5123
☣️ अयन- दक्षिणायन
🌦️ ऋतु – सौर हेमन्त ऋतु
🌤️ मास – मार्गशीर्ष मास
🌑 पक्ष – कृष्ण पक्ष
📆 तिथि – चतुर्दशी 8.49 AM तक ततपश्चात अमावस्या
🖍️ तिथि के स्वामी – चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान भोलेनाथ जी और अमावस्या तिथि के स्वामी पितृ देव जी है ।
💫 नक्षत्र – विशाखा 23.37 PM तक तत्पश्चात अनुराधा
🪐 नक्षत्र के देवता, ग्रह स्वामी- विशाखा नक्षत्र के देवता इंद्राग्नी (इंद्र और अग्नि) और स्वामी बृहस्पति देव जी है।
📢 योग – शोभन 15.40 PM तक तत्पश्चात अतिगण्ड
⚡ प्रथम करण : शकुनि – 06:53 ए एम तक
✨ द्वितीय करण : चतुष्पाद – 05:43 पी एम तक नाग – 04:26 ए एम, नवम्बर 24 तक किंस्तुघ्न
🔥 गुलिक काल : – बुधवार को शुभ गुलिक 10:30 से 12 बजे तक ।
⚜️ दिशाशूल – बुधवार को उत्तर दिशा में दिशा शूल होता है इस दिन कार्यों में सफलता के लिए घर से सुखा / हरा धनिया या तिल खाकर जाएँ ।
🤖 राहुकाल : – बुधवार को राहुकाल दिन 12:00 से 1:30 तक राहू काल में शुभ कार्य करना वर्जित माना गया हैं।
🌞 सूर्योदय – प्रातः 06:40:22
🌅 सूर्यास्त – सायं 17:20:31
👸🏻 ब्रह्म मुहूर्त : 05:03 ए एम से 05:56 ए एम
🌇 प्रातः सन्ध्या : 05:29 ए एम से 06:50 ए एम
🌟 अभिजित मुहूर्त : कोई नहीं
✡️ विजय मुहूर्त : 01:53 पी एम से 02:36 पी एम
🐃 गोधूलि मुहूर्त : 05:14 पी एम से 05:38 पी एम
🏙️ सायाह्न सन्ध्या : 05:25 पी एम से 06:45 पी एम
💧 अमृत काल : 01:24 पी एम से 02:54 पी एम
🗣️ निशिता मुहूर्त : 11:41 पी एम से 12:35 ए एम, नवम्बर 24
❄️ सर्वार्थ सिद्धि योग : 09:37 पी एम से 06:51 ए एम, नवम्बर 24
🌊 अमृत सिद्धि योग : 09:37 पी एम से 06:51 ए एम, नवम्बर 24
☀️ शोभन योग – 3 बजकर 40 मिनट तक
☄️ विशाखा नक्षत्र – रात 9 बजकर 37 मिनट तक
🏎️ यात्रा शकुन-हरे फल खाकर अथवा दूध पीकर यात्रा पर निकले।
👉🏼 आज का मंत्र-ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:।
🤷🏻♀️ आज का उपाय-पीपल के वृक्ष के नीचे मिष्ठान व जल रखकर दीप प्रज्ज्वलित करें।
🪵 वनस्पति तंत्र उपाय- अपामार्ग के वृक्ष में जल चढ़ाएं।
⚛️ पर्व एवं त्यौहार – देवपितृकार्य अमावस्या/सर्वार्थसिद्धि योग/अमृतयोग/शुक्रोदय पश्चिमे (मतांतर), नीरद सी। चौधरी, ब्रिटिश-भारतीय इतिहासकार, लेखक जन्मोत्सव, सत्य साईं बाबा, भारतीय गुरु और दार्शनिक जन्मोत्सव, जगदीश चंद्र बोस, बांग्लादेशी-भारतीय भौतिक विज्ञानी, पुण्यतिथि, पुलिस झंडा दिवस यानि प्रति वर्ष 23 नवंबर को पुलिस मुख्यालयों व कार्यालयों, पीएसी वाहिनियों, क्वार्टर गार्द, थानों, भवनों व कैम्पों पर पुलिस ध्वज फहराए जाते हैं, राष्ट्रीय औषधि दिवस
✍🏽 विशेष – अमावस्या को मैथुन एवं प्रतिपदा को कद्दू और कूष्माण्ड के फल का दान तथा भक्षण दोनों ही त्याज्य होता है। शास्त्रों में अमावस्या तिथि को सम्भोग वर्जित तिथि बताया गया है। अमावस्या तिथि एक पीड़ाकारक और अशुभ तिथि मानी जाती है। अमावस्या तिथि पितृगणों को समर्पित तिथि है अर्थात इसके स्वामी पितृगण हैं। यह केवल कृष्ण पक्ष में ही होती है तथा अशुभ फलदायिनी मानी जाती है।
🗣️ श्लोक : १.१.२(1.1.2) सूक्त
अ॒ग्निः पूर्वे॑भि॒रृषि॑भि॒रीड्यो॒ नूत॑नैरु॒त । स दे॒वाँ एह व॑क्षति ॥
प्राचीन ऋषियों ने अग्नि की स्तुति की थी. वर्तमान ऋषि भी उनकी स्तुति करते हैं. वे अग्नि इस यज्ञ में देवों को बुलावें.
☝🏼 महत्वपूर्ण सूचना
मार्गशीर्ष, कृष्ण अमावस्या बुधवार, 23 नवंबर 2022
अमावस्या प्रारंभ : 23 नवंबर 2022 को सुबह 06:53 बजे
अमावस्या समाप्त : 24 नवंबर 2022 को सुबह 04 बजकर 27 मिनट पर
🗼 Vastu tips 🗽
वास्तु के अनुसार, अगर आपको कोई दिमागी परेशानी तो उत्तर पश्चिम, पेट की तो दक्षिण पश्चिम, पैरों में तो पूर्व दिशा, कान में तो उत्तर दिशा और अगर हाथों में दिक्कत है तो ईशान कोण को ठीक करें। वहीं अगर कमर में परेशानी है तो दक्षिण पूर्व, आंखें ठीक रखनीहै तो दक्षिण और अगर मुख यानि चेहरे को निरोगी और तरोताजा रखना चाहते हैं तो पश्चिम दिशा के वास्तु को सही कीजिए।
वास्तु शास्त्र का महत्व वास्तु शास्त्र हमारे जीवन के लिए काफी महत्वपूर्ण होता है। इससे हमारा जीवन काफी प्रभावित होता है। वास्तु दोष से हमारी कामयाबी से लेकर घर की सुख समृद्धि तक पर प्रभाव पड़ता है। ऐसे में घर और वहां मौजूद चीजों को सही दिशा में रखना बेहद ही जरूरी है। वास्तु शास्त्र में कई तरह की सावधानी और उपाय को बताया गया है, जिसे अपनाकर व्यक्ति संपन्न, प्रसन्न और निरोगी रह सकता है। ऐसे में वास्तु नियम का पालन करना काफी जरूरी हो जाता है।
▶️ जीवनोपयोगी कुंजियां ⚜️
आखिर क्यों मूली सिरहाने रखें
लाल किताब में बताया गया है कि जब जन्मपत्री में राहु कुण्डली के पांचवें घर में हो और संतान सुख में कठिनाई आ रही है। ऐसी स्थिति में राहु दोष को दूर करने के लिए घर के मुख्य दरवाजे के नीचे चांदी का पत्तर रखना चाहिए।
अगर आप यह काम नहीं कर पाते हैं 40 दिनों तक पांच मूली पत्नी के सिरहाने रखें और सुबह मूली को शिव मंदिर में रख आएं। इससे संतान प्राप्ति की संभावना बढ़ेगी।
गर्भधारण कैसे
अगर आपको किसी कारणवश गर्भ धारण नहीं हो रहा हो तो मंगलवार के दिन कुम्हार के घर आएं और उसमें प्रार्थना कर मिट्टी के बर्तन वाला डोरा ले आएं। उसे किसी गिलास में जल भरकर दाल दें। कुछ समय पश्चात डोरे को निकाल लें और वह पानी पति-पत्नी दोनों पी लें। यह क्रिया केवल मंगलवार को ही करनी है अगर संभव हो तो उस दिन पति-पत्नी अवश्य ही रमण करें। गर्भ की स्थिति बनते ही उस डोरे को हनुमानजी के चरणों में रख दें।
🫖 आरोग्य संजीवनी 🍶
स्वप्न दोष और धातुपतन चिकित्सा यह रोग आज प्रत्येक नवयुवक को परेशान किये रहता है । वे जाने कहा – कहा जाकर अपना स्वास्थ नष्ट कर लेते है। यह 100 % दूर हो जाने वाला रोग है।
🍱 औषधि – गिलोय का सत्त 25 ग्राम , सफ़ेद मूसली 100 ग्राम, ताल मखाना 100 ग्राम, मखाने की ठुर्री – 100 ग्राम, मूलेठी – 100 ग्राम, गोखरू 100 ग्राम, शतावरी 100 ग्राम। इन सब को अलग-अलग चूर्ण करके छानकर इसमें गिलोय का सत्त मिला दें। इसमें शहद डालकर चासनी बना लें।
इसे 10 ग्राम प्रातः , 10 ग्राम शाम मिश्री मिले दूध के साथ लेने पर सभी प्रकार के धातु दोष , स्वप्न दोष , मूत्र रोग , शीघ्रपतन दूर हो जाते है।
👉🏼 सामान्य चिकित्सा – पांच गुलाब के फूल गर्म भात और घी में मिलाकर खाए या तीन-तीन गुलाब के फूल खाकर प्रात:-सांय मिश्री मिला दूध पिए।
🪔 गुरु भक्ति योग 🕯️
किन्नरों के देवता कौन हैं : देशभर में जितने भी किन्नर है उन सभी के देवता इरावन है।
क्यों होती है एक दिन की शादी : वर्ष में एक दिन ऐसा भी आता जब किन्नर रंग-बिरंगी साड़ियां पहनकर और अपने जूड़े को चमेली के फूलों से सजाकर इरावन से शादी करती है। हालांकि यह विवाह मात्र एक दिन के लिए होता है। अगले दिन इरावन देवता की मौत के साथ ही उनका वैवाहिक जीवन खत्म हो जाता है। मान्यता है कि इसी दिन इरावन की महाभारत के युद्ध में मौत हो गई थी।
इसकी याद में हजारों किन्नर तमिलनाडु के कूवागम गांव में एकत्रित होते हैं। जहां वे अपनी जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण दिन वार्षिक ‘शादी’ समारोह में शिरकत करते हैं। पौराणिक मान्यता अनुसार भगवान कृष्ण ने औरत का रूप धारण कर नाग राजकुमार इरावन से शादी की थी। विल्लूपुरम जिले के इस गांव में इरावन की पूजा कूथांदवार के रूप में होती है। हजारों किन्नर इरावन की दुल्हन के रूप में शादी समारोह में शिरकत करती हैं और मंदिर के पुजारी ने उनकी गर्दन में कलावा बांधवाती हैं।
महाभारत के अर्जुन से क्या है कनेक्शन? मान्यता अनुसार महाभारत युद्ध में एक समय ऐसा आता है जब पांडवों को अपनी जीत के लिए मां काली के चरणों में स्वेच्छिकरूप से किसी पुरुष की बलि हेतु एक राजकुमार की जरूरत पड़ती है। जब कोई भी राजकुमार आगे नहीं आता है तो इरावन खुद को इसके लिए प्रस्तुत कर देता है, लेकिन वह इसके साथ ही एक शर्त भी रख देता है कि वह अविवाहित नहीं मरेगा। इस शर्त के कारण यह संकट उत्पन्न हो जाता है कि यदि किसी राजा की बेटी या सामान्य स्त्री से उसका विवाह किया जाता है कि वह तुरंत ही विधवा हो जाएगा। ऐसे में कोई भी पिता इरावन से अपनी बेटी के विवाह के लिए तैयार नहीं होता है। तब भगवान कृष्ण स्वयं मोहिनी रूप में इरावन से विवाह करते हैं। इसके बाद इरावन अपने हाथों से अपना शीश मां काली के चरणों में अर्पित कर देता है। इरावन की मृत्यु के पश्चात कृष्ण उसी मोहिनी रूप में काफी देर तक उसकी मृत्यु का विलाप भी करते हैं। अब चुकी कृष्ण पुरुष होते हुए स्त्री रूप में इरावन से शादी रचाते हैं इसलिए किन्नर, जोकि स्त्री रूप में पुरुष माने जाते हैं, वह भी इरावन से एक रात की शादी रचाते हैं और उन्हें अपना आराध्य देव मानते हैं। लेकिन यह कथा कितनी सच है यह कोई नहीं जानता, क्योंकि महाभारत में तो इरावन की मौत के राज कुछ और ही है।
इरावन अर्जुन का पुत्र था। इसका जन्म विशेषकाल परिस्थिति में हुआ था। दरअसल, एक बार अर्जुन ने युधिष्ठिर और द्रौपदी को एकांत में देखकर वैवाहिक नियम भंग कर दिया था जिसके चलते उन्होंने स्वेच्छापूर्वक एक वर्ष के लिए तीर्थ भ्रमण स्वीकार कर इंद्रप्रस्थ छोड़ दिया। एक दिन वे हरिद्वार में स्नान कर रहे थे कि तभी नागराज कौरव्य की पुत्री नागकन्या उलूपी ने उन्हें देखा और वह उन पर मोहित हो गई। ऐसे में वह उन्हें खींचकर अपने नागलोक में ले गई और उसके अनुरोध करने पर अर्जुन को उससे विवाह करना पड़ा।
अर्जुन ने नागराज के घर में ही वह रात्रि व्यतीत की। फिर सूर्योदय होने पर उलूपी के साथ अर्जुन नागलोक से ऊपर को उठे और फिर से हरिद्वार (गंगाद्वार) में गंगा के तट पर आ पहुंचे। उलूपी उन्हे वहां छोड़कर पुन: अपने घर को लौट गई। जाते समय उसने अर्जुन को यह वर दिया कि आप जल में सर्वत्र अजेय होंगे और सभी जलचर आपके वश में रहेंगे।
अर्जुन और नागकन्या उलूपी के मिलन से अर्जुन को एक वीरवार पुत्र मिला जिसका नाम इरावान रखा गया। भीष्म पर्व के 90वें अध्याय में संजय धृतराष्ट्र को इरावान का परिचय देते हुए बताते हैं कि इरावान नागराज कौरव्य की पुत्री उलूपी के गर्भ से अर्जुन द्वारा उत्पन्न किया गया था। नागराज की वह पुत्री उलूपी संतानहीन थी। उसके मनोनीत पति को गरूड़ ने मार डाला था, जिससे वह अत्यंत दीन एवं दयनीय हो रही थी। ऐरावतवंशी कौरव्य नाग ने उसे अर्जुन को अर्पित किया और अर्जुन ने उस नागकन्या को भार्या रूप में ग्रहण किया था। इस प्रकार अर्जुन पुत्र उत्पन्न हुआ था। इरावान सदा मातृकुल में रहा। वह नागलोक में ही माता उलूपी द्वारा पाल-पोसकर बड़ा किया गया और सब प्रकार से वहीं उसकी रक्षा की गयी थी। इरावान भी अपने पिता अर्जुन की भांति रूपवान, बलवान, गुणवान और सत्य पराक्रमी था।
●●●●●★᭄ॐ नमः श्री हरि नम: ★᭄●●●●●
⚜️ चतुर्दशी को चौदस भी कहते हैं। चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान शिव हैं। प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि मासिक शिवरात्रि कहलाती है।
अतः प्रत्येक मास की कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के दिन शिव जी की पूजा, अर्चना एवं रुद्राभिषेक करने से भगवान शिव समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं, भक्तो के सभी संकट दूर होते है ।
चतुर्दशी तिथि में रात्रि में शिव मंत्र या जागरण करना बहुत उत्तम रहता है।
किसी भी पक्ष की चतुर्दशी में शुभ कार्य करना वर्जित हैं क्योंकि इसे क्रूरा कहा जाता है, चतुर्दशी तिथि रिक्ता तिथियों की श्रेणी में आती है।
चतुर्दशी तिथि में जन्मा जातक समान्यता धर्मात्मा, धनवान, यशस्वी, साहसी, परिश्रमी तथा बड़ो का आदर सत्कार करने वाला होता है।
चतुर्दशी तिथि में जन्मे लोगों को क्रोध बहुत आता है। इस तिथि में जन्मे जातक साहसी और परिश्रमी होते हैं। इन लोगों को जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ता है तभी इन्हे सफलता हाथ लगती है।
चतुर्दशी तिथि में जन्मे जातकों को नित्य भगवान शंकर की पूजा अवश्य करनी चाहिए।
चतुर्दशी तिथि को समस्त संकटो से मुक्ति के लिए महामृत्युंजय मंत्र – ‘ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्” का जाप करना अत्यंत फलदाई रहता है ।


